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पत्थर पूजै हरि मिले . . . 

 

आज सुबह पाँच बजे ही पुष्पा की नींद खुल गई। बालकनी में जाकर देखा, बाहर अभी अँधेरा था। अच्छी लोकेशन पर फ़्लैट मिला था। बालकनी से नीचे पार्क दिखता था। कल तो शाम हो गई सामान शिफ़्ट करके रखवाने में। जगह बदलने पर रात में ठीक से नींद भी नहीं आई। एक कप कॉफ़ी की तलब लगी। किचन में गई। लखनऊ वाले फ़्लैट का किचन बहुत बड़ा था। यहाँ तो इतना छोटा है, कि दो व्यक्ति मुश्किल से समायें। ख़ैर मुझे करना भी क्या है, बड़े किचन का। समान बेतरतीब पड़ा था। ढूँढ़-ढाँढ़ कर कॉफ़ी बनाई। मग लेकर बालकनी में आ गई। हाँ, बालकनी शानदार है। एक सोफ़ा और आर्म चेयर इसमें डाल दूँगी। अब थोड़ा-थोड़ा साफ़ होने लगा था। जॉगिंग करने, योगा करने लोग आने लगे थे। पुष्पा का भी मन हुआ जाकर पार्क में टहल आए। लखनऊ में तो नीचे गली में ही टहलना हो पाता था, या फिर छत पर। फ़्रेश होकर स्लीपर डालकर नीचे पार्क में गई। भोर की सुहानी हवा चल रही थी। वह ओस से भीगी घास पर नंगे पैर चलने लगी। वाह! क्या सुकून मिला। सूरज का लाल गोला अब दिखने लगा था। हवा से फूल पते हौले-हौले डोल रहे थे। पुष्पा को लगा यहीं बेंच पर थोड़ी देर बैठकर समय बिताया जाए। आज की छु‌ट्टी तो है ही, दिनभर घर व्यवस्थित करना है। अभी थोड़ा चैन की साँस ले ले। उसने याद करने की कोशिश की, पिछली बार ऐसे चैन से कब बैठी थी? वह बेंच पर ही पालथी मारकर बैठ गई। और आँखें मूँद ली। लंबी और गहरी साँसें लेने लगी। अचानक कंधे पर किसी ने हाथ रखा।

“पुष्पा! तू यहाँ कैसे?” पुष्पा ने आँखें खोली। उसके सामने एक महिला ट्रैकसूट में खड़ी थी। जाना-पहचाना चेहरा लगा। थोड़ा ज़ोर डाला तो याद आया।

“नैना! ओ नैना, तू इतने दिनों बाद! कैसी है? दिल्ली में कब से है? और अंकल आँटी ठीक हैं? शादी की तूने? तू तो बिल्कुल ही बदल गई। पहचान में ही नहीं आई!”

“अरे बस कर! बस! एक बार में इतने प्रश्न!” हँसते हुए नैना बोली। “हाँ तो तेरे एक-एक सवाल का जवाब देती हूँ।

“कैसी हूँ—ठीक हूँ।

“दिल्ली में कब से हूँ—पाँच साल हो गए।

“अंकल आँटी ठीक हैं—हाँ ठीक हैं। कल ही बात हुई थी।

“शादी की मैंने—नहीं। कोई मिला ही नहीं!”

हा . . . हा . . . हा . . . दोनों सहेलियाँ हँसने लगीं।

पुष्पा ने कहा, “चल वह ऊपर मेरा फ़्लैट है। चाय पीते हैं। वह कॉलेज की नुक्कड़ वाली कड़क मसाला चाय बनाकर पिलाती हूँ तुझे, चल।”

नैना ने कहा, “नहीं यार! अभी स्नान नहीं किया है। बिना स्नान किये मैं मुँह जूठा नहीं करती। मिलते हैं, शाम को। वह सामने वाला मेरा फ़्लैट है।”

पुष्पा, “अरे वाह! स्नान! क्या बात है! तेरी हिंदी तो सुधर गई। आज रेखा मैम तुझे सुनती तो ख़ुश हो जाती।”

नैना, “हाँ यार! वह बेचारी पूरे तीन साल लगी रहीं मुझे शुद्ध हिंदी बोलना सिखाने में। पर मैं हिंग्लिश ही बोलती रही। चल अब देर हो रही है। मैं चलती हूँ, वरना भोजन में देर होगी। राधे राधे!”

नैना चली गई। पुष्पा उसे एकटक देखती रह गई। वो स्लिम ट्रिम, मेकअप से लदी-फदी लड़की, सादे रूप में कितनी सौम्य और सुंदर लग रही है। चेहरा कितना चमक रहा है। मेरी हम उम्र है। लेकिन चेहरे पर एक फ़ाईन लाइन तक नहीं है। उसने अपना मोबाइल निकाल कर कैमरा ऑन करके चेहरा देखा। मैं इसकी बड़ी दीदी लग रही हूँ। पुष्पा वापस अपने घर आ गई। नहा-धोकर नाश्ता किया। फिर सामान सेट करने लगी। आज छु‌ट्टी ली थी, और ऑफ़िस की मदद से ही एक हाउस-हेल्प को बुलाया था। बालकनी की तरफ़ गई, तो सामने नैना वाले फ़्लैट के बालकनी पर नैना दिखाई दी। वह छोटे-छोटे झबले, टोपी, मोज़े सुखा रही थी। पुष्पा ने सोचा नैना ने शादी नहीं की। फिर यह छोटे बच्चों के कपड़े? अच्छा शाम को मिलते हैं, तो पूछती हूँ।

सामान व्यवस्थित हो गया। हाउस-हेल्प सुमन ने अच्छे से झाड़-पोंछ कर फ़्लैट चमका दिया था। वह पूछने लगी दीदी खाना बना दूँ। पुष्पा ने मना कर दिया।

“नहीं, आज हल्का खाने का मन है। मैं खिचड़ी बना लूँगी, तुम कल से बनाना। आज जाओ।”

सुमन के जाने के बाद पुष्पा ने खिचड़ी चढ़ा दी। वह एक पत्रिका लेकर बालकनी में बैठ गई। कितने सुंदर फूल खिले हैं। पार्क के कोने में एक अमलतास का पेड़ खड़ा था। उस पर धूप पड़ रही थी। ठंड में धूप पाकर पेड़ निहाल था। ऐसा लग रहा था, मानो धूप ने उसे प्रेम से गले लगा रखा हो। ऐसा ही अमलतास कॉलेज कैम्पस में भी था। पुष्पा को याद आया, अमलतास के नीचे बेंच पर बैठा एक प्रेमी जोड़ा। हथेली पर एक दूसरे के हाथों की गर्माहट महसूस करते हुए। लड़की ने पूछा, “तुम्हें हाथ देखना आता है? बताओ तो हमारी शादी कब होगी?”

लड़के ने उसकी आँखों में डूबते हुए कहा, “मुझे हाथ देखना नहीं आता। साथ देना आता है। उम्र भर, सात जन्म तक।”

पुष्पा की आँखें भर आईं। यह प्रेमी इतनी बढ़-चढ़कर क्यों बाते करते हैं। सात जन्म तो क्या सात साल भी नहीं निभा पाए हम लोग। अतीत की गलियों से पुष्पा बाहर आई। लंच किया। थोड़ा आराम करने लगी। शाम को चार बजे सोचा चलो नैना से मिलकर आती हूँ। जल्दी-जल्दी में नंबर भी नहीं ले पाई। वह सामने वाला फ़्लैट तो है। बेबी पिंक कुर्ती और जींस पहनकर पुष्पा तैयार हुई। बाल सँवारते समय ध्यान से देखा। नहीं! एक भी बाल सफ़ेद नहीं है। पर चेहरा इतना बेजान क्यों लगता है? हल्का सा फ़ॉउंडेशन लगाया। काजल और लिपस्टिक। जूते पहने, और निकल गई। डोर बेल बजाने के क़रीब पाँच मिनट बाद दरवाज़ा खुला।

“अरे पुष्पा! आजा बैठ। मैं ज़रा कान्हा को भोग लगाकर आती हूँ।” नैना चली गई। थोड़ी देर बाद चाय और भुने मेवे लेकर आई। “आ चाय पी। और बता कैसी है तू? मुझसे तो सब पूछ लिया। अपना बता। शादी के बाद तो तुम और समर यूरोप जाने वाले थे, फिर क्या हुआ? बहुत ग़ज़ब की केमिस्ट्री थी तुम दोनों की।”

पुष्पा थोड़ी देर चुप रही। फिर ठंडी आह भरकर बोली, “नैना हम दोनों की केमिस्ट्री तो बहुत अच्छी थी। पर सोशियोलॉजी ने केमिस्ट्री को हरा दिया। यूरोप तो गए, पर कुछ दिनों के बाद मैं वापस आ गई। समर चाहता था, कि मैं यूरोप में यूरोपियंस की तरह रहूँ। अरे यार! गोरखपुर के गाँव की लड़की, आख़िर कितने हद तक फिरंगी बन सकती है। फ़ैशनेबुल कपड़े पहनना, घूमना-फिरना, पार्टी करना, ड्रिंक लेना, यहाँ तक तो ठीक था। पर उन्मुक्त सेक्स, पार्टनर स्वाइप, फ़्लर्टिंग, इन सब में मैं फ़िट नहीं बैठी। वापस माँ के पास चली आई। गर्भ में तीन महीने के मयंक को लेकर। आज अकेले ही उसे पाल रही हूँ। माँ-पापा चले गए। भैया-भाभी से बात होती रहती है। मयंक हॉस्टल में है। मैंने अपना ट्रांसफ़र यहाँ करवा लिया। बस यूँ ही चल रहा है जीवन। तू बता! तेरे पीछे तो पूरा कॉलेज दीवाना था! तूने शादी क्यों नहीं की?”

नैना बोली, “मुझे तो मेरे कान्हा ने बचा लिया। आ तुझे मिलवाती हूँ। दो साल हो गए। अब यह है, और मैं हूँ और हम दोनों बहुत ख़ुश हैं।”

नैना और पुष्पा अन्दर गई, तो देखा मंदिर पर छोटे से कृष्ण की मूर्ति है। छोटे से गिलास में दूध और एक छोटी सी प्लेट में भूने मेवे रखे हैं। नैना ने मूर्ति को गोद में ले लिया।

“अरे बाप रे! मुँह फुला लिया। मैया छोड़ कर चली गई, अपनी सखी से बतियाने! ओहो! सॉरी कान्हा! देख पुष्पा सारी अटेंशन इन्हें मिलनी चाहिएँ। हमारे कान्हा बाबू को।”

पुष्पा एकटक नैना का चेहरा निहार रही थी। वह मूर्ति से ऐसे व्यवहार कर रही थी, जैसे वह कोई छोटा बच्चा हो। पुष्पा ने उसे ज़ोर से हिलाया और ज़ोर से चिल्लाई “नैना!!!”

नैना हँसने लगी। “अरे यार! मैं ठीक हूँ। तुझे क्या लगा कि मैं . . .

“देख पुष्पा, हम मनुष्यों ने अपनी दुनिया को इतना ज़हरीला बना दिया है, कि रहने को जी नहीं चाहता। हर तरफ़ छल-कपट, धोखा, षड्यंत्र, भौतिक सुख-सुविधाओं के पीछे भागना। शान्ति कहाँ है? चैन कहाँ है? दो साल पहले में डिप्रेशन में चली गई थी। लगातार असफलता ने मुझे तोड़ दिया था। जीवन निरर्थक लगने लगा था। सावन भादों में यमुना बढ़ी हुई थी। मैं पुल पर पैदल चली जा रही थी। मन में लहरें तूफ़ान मचा रही थीं। मन कर रहा था इन्हीं यमुना की लहरों में जाकर शांत हो जाऊँ। तभी कानों में आवाज आई—हरे रामा, हरे कृष्णा, कृष्णा कृष्णा हरे हरे . . . इस्कॉन का श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का जुलूस था। नाचते-गाते पुल पर से गुज़र रहा था। विदेशी युवा लड़के-लड़कियाँ धोती, साड़ी, पहनकर नाच गा रहे थे। उनके चेहरे पर ग़ज़ब की शान्ति थी। मैंने सोचा क्या इन्हें कोई दुःख, निराशा नहीं होगी जीवन में? आख़िर कैसे? मैं भी उसी जत्थे में शामिल हो गई। नाचने लगी, गाने लगी। मेरे सामने एक लक्ष्य दिखने लगा। मेरा कान्हा मुझे देखकर मुस्कुरा रहा था। बस तब से कान्हा ने मुझे सँभाल रखा है। मैंने अपनी भक्ति को ही अपना जीवन बना लिया है। अब किसी से कोई शिकायत नहीं। कोई गिला-शिकवा नहीं। किसी की कोई बात बुरी नहीं लगती। मन शांत रहता है। कान्हा को उठाना, नहलाना, धुलाना, भोग लगाना, लोरी सुनाकर सुलाना, घूमाना इसी में समय कट जाता है। एक समय में एक ही प्रोजेक्ट लेती हूँ। रिकॉर्डिंग में कान्हा को साथ ले जाती हूँ। ज़रूरतें कम हैं, तो कभी पैसे की कमी नहीं महसूस होती। ईश्वर सब सँभाल लेते हैं। इससे ज़्यादा की चाह नहीं। जीवन आनंद में है। सुबह-शाम नाम जपती हूँ। सेवा करती हूँ। ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर।”

पुष्पा चुपचाप सारी बातें सुन रही थीं। क्या आँखें बंद कर लेने से दुनिया की सारी समस्याएँ ठीक हो जाएँगी। नैना तो बिल्कुल बदल गई है।

बोली, “अच्छा चलती हूँ नैना। ऑफ़िस से कल के लिए अपडेट्स आए होंगे। आज भर चैन है। कल से फिर वहीं भागम-भाग शुरू।”

नैना बोली, “क्यों भाग रही है पुष्पा? कब तक भागेगी? यह जीवन यूँ ही नष्ट करने के लिए नहीं मिला है!”

पुष्पा ने कहा, “अरे यार! बच्चे की स्कूल, हॉस्टल की फ़ीस। रोज़मर्रा के ख़र्चे। नहीं काम करूँगी, तो सब कैसे पूरा होगा। मैं तो एक फ़्लैट लेने के लिए सेविंग्स कर रही हूँ। कल को बच्चा बड़ा होगा। उसके लिए कुछ तो करना चाहिए। चल ठीक है। फिर मिलते हैं। नंबर दे अपना, मैं कॉल करूँगी।”

अगली सुबह पुष्पा तैयार होकर ऑफ़िस चली गई। नया ऑफ़िस बहुत अच्छा था। दिन भर व्यस्त रही। दो बजे लंच करने कैंटीन में गई। सार्थक मिल गया। ऑफ़िस ज्वाइन करने से पहले, ऑफ़िस की तरफ़ से, सार्थक से ही फोन के द्वारा संपर्क हुआ था। देखते ही बोला, “नमस्ते मैम! चलिए आज लिट्टी-चोखा खाया जाए।”

पुष्पा ने कहा, “नहीं, मैंने आर्डर कर दिया है। डोसा।”

सार्थक कहने लगा, “ठीक है मैम। हम तो समोसे की तीखी चटनी के लिए यहाँ आए थे। लिट्टी के साथ हरी धनिया की चटनी गजबे कमाल लगती है। आप बैठिए हम ऑर्डर लेकर आते हैं।”

पुष्पा सोचने लगी आप आओ, आप बैठो, आप खाओ, की भीड़ में आप खाइए, आप लीजिए, आप बैठिए, हम लाते है, कितना अच्छा लगता है। सार्थक बिहार से था, और अभी चार साल ही हुए थे बिहार छोड़े। पर बिहारीपन नहीं छूटा था। शार्प एंड स्मार्ट, डार्क, टाल, हैंडसम!

तब तक सार्थक आ गया। बोला, “लीजिए मैम खाइए। मेरी माँ के हाथ की बनी लिट्टी, और भगवान भइया के हाथ की बनी तीखी चटनी। मज़ा आ जाएगा।”

पुष्पा ने फोन देखा। बेटे के स्कूल से मैसेज था। ‘कल से एक सप्ताह की छुट्टियाँ हैं। आप चाहें तो बच्चे को ले जा सकते हैं।’ पुष्पा सोच में पड़ गई। शनिवार रविवार तो छुट्टी है। बाक़ी चार दिन बच्चे को कहाँ रखूँगी। बेटे से मिले बहुत दिन हो गए थे। उसके कारण ही तो दिल्ली में ट्रांसफ़र की कोशिश कर रही थी। लखनऊ से तो आने और जाने में ही दो दिनों की छुट्टियाँ बेकार हो जाती थीं। चलो कल शनिवार है, जाकर मंकू को ले आती हूँ। बाद की बाद में देखेंगे।

शाम को सात बजे घर पहुँची। थकी-हारी, पस्त-सी। काश कोई चाय बनाकर पिला देता। सुमन तो आठ बजे आएगी खाना बनाने। मुँह-हाथ धोकर फ़्रेश हुई। किचन में जाकर चाय बनाई। कप लेकर बालकनी में आ गयी। सामने नैना की बालकनी दिख रही थीं। आरती का थाल चारों तरफ़ घुमा रही थी। तब तक सुमन आ गई।

पूछने लगी, “क्या बनाऊँ दीदी?”

पुष्पा बोली, “पनीर लाई हूँ। फ़्रिज में मटर होंगे। मटर-पनीर बना दो। थोड़े से चावल चढ़ा देना।”

नैना टीवी के सामने बैठ गई। न्यूज़ चैनल लगाया। हर तरफ़ महाकुंभ में हुई भगदड़, और कुचले गए लोगों की ख़बर थी। योगी जी रो रहे थे। अमृत स्नान के स्थगित होने की भी ख़बर थी। मन रुआँसा हो गया। पुष्पा ने टीवी बंद कर दिया। सोचने लगी, यह पाखंड कितनों के प्राण लेगा। बेचारे भोले-भाले लोग, ढोंगियों के बहकावे में आ जाते हैं। सोचते हैं, तीर्थ यात्रा से, हज करने से, गुरुद्वारे में मत्था टेकने से, चर्च में कैंडल जलाने से, उनके जीवन की समस्याएँ दूर होंगी। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार, न्याय इस पर कोई बात नहीं करना चाहता। मन नहीं लगा तो सुमन से ही बात करने लगी।

“अच्छा सुमन तुम नहीं गई कुंभ नहाने?”

“अरे कहाँ दीदी! अपने घर की गृहस्थी जान नहीं छोड़ती। क्या जाऊँ?”

“तुम्हें लगता है तीर्थ करने से जीवन सुधरता है?”

“हाँ दीदी। भगवान दुःख इसलिए ही देते हैं, ताकि कोई उन्हें याद करे। वरना तो इंसान ख़ुद को भगवान से भी बड़ा मान ले।”

“अच्छा“

“और क्या! अब मेरा ही देखो, हर सावन सोमवार करती थी। पिछले सावन मन में आलस आ गया। मैंने कहा छोड़ो इस बार जल चढ़ाकर भोजन कर लूँगी। और देखो सितंबर के यूनिट टेस्ट में गोलू फ़ेल हो गया। डी ग्रेड लाया। भगवान ने तुरंत दंड दे दिया। जाकर मंदिर में प्रसाद चढ़ाया, साष्टांग होकर माफ़ी माँगी, और कहा कि आगे से कभी नहीं भूलूँगी, सावन के सोमवार करना।”

“अरे सुमन! वह तो काँवरिया की भीड़ के मारे स्कूल बंद थे। ऑनलाइन क्लास थी। बच्चे ने ध्यान से पढ़ा नहीं होगा।”

“नहीं दीदी! इसी मारे तो मोबाइल उसे ही दिये रहती थी, कि अच्छे से पढ़े।”

“अच्छा, ये बताओ कितने साल का है?”

“सातवीं में है दीदी। 13 साल का।”

“तो उसे ज़्यादा फोन मत दो। यह उम्र बहुत नाज़ुक होती है। उसके पापा को बोलो उससे बाते किया करें। उसे दोस्त बनायें।”

“अरे दीदी! उन्हें तो चार साल पहले ही कोरोना ले गया,” आँखें पोंछते हुए सुमन बोली। “वह थे तो मुझे घर से बाहर क़दम भी नहीं निकालने देते थे। यह सब काम तो मैंने मजबूरी में शुरू किया दीदी।”

पुष्पा आश्चर्यचकित रह गई। यह भी सिंगल मदर।

सुमन बोली, “खाना खा लो दीदी। मैं बरतन साफ़ करके जाऊँ।”

पुष्पा ने खाना खाया। बोली, “मटर पनीर ज़्यादा है सुमन। मुझे थोड़ा-सा सुबह नाश्ते के लिए चाहिए। सुबह सिर्फ़ पराँठे बना देना। कल लंच मयंक के साथ बाहर ही करूँगी। रात को उसकी पसंद का खाना बनेगा। मटर पनीर तुम ले जाओ।”

“ठीक है दीदी।”

सुमन किचन साफ़ करके चली गई। पुष्पा खाना खाकर बालकनी में टहलने आई, तो नैना की बालकनी पर नज़र पड़ी। वह छोटे से पालने को लेकर बालकनी में टहल रही थी। अच्छा, लगता है कान्हा को लोरी देकर सुला रही है। पुष्पा के होंठों पर मुस्कान आ गई। धातु की छोटी सी मूर्ति ने कैसे नैना का जीवन बदल दिया है। कोई मानेगा, कि यह वही बिंदास और लड़ाकू लड़की है। चिड़चिड़ी रहने वाली नैना, कितनी सौम्य हो गई है। ठीक 9:30 बजे बालकनी की लाइट बंद हुई, नैना अन्दर चली गई। पाँच मिनट बाद पूरे फ़्लैट की लाइट बंद हो गई। केवल म‌द्धिम-सा नाइट लैंप जलता रहा। पुष्पा भी अन्दर चली आई। फोन चलाते-चलाते समर के फ़ेसबुक पोस्ट पर नज़र गयी।

“हॉलीडे इन थाईलैंड”—मस्ती मूड से भरी तस्वीरें लगी थीं। पुष्पा को बहुत देर तक नींद नहीं आई। सुबह सुमन ने डोर बेल बजाई तब ही नींद खुली। अरे आज आठ बज गए। सुमन के आने तक पुष्पा नहा-धोकर तैयार रहती थी। सुमन पहले चाय-नाश्ता बनाती, बाद में बाक़ी काम करती। तब तक पुष्पा के ऑफ़िस जाने का वक़्त हो जाता। दोनों नौ बजे साथ ही निकलतीं। पर आज तो छुट्टी थी, और मयंक को लेने जाना था। सुमन काम करके चली गई। पुष्पा दस बजे निकली। हॉस्टल में सॉरी फ़ॉर्मेलिटी पूरी करते-करते एक बज गए। पुष्पा को देखते ही मयंक आकर लिपट गया।

“आप आ गये मम्मा! चलिए हम लोग आज मैकडॉनल्ड में चलते हैं।”

“ठीक है बेटा। चलो वहीं लंच करेंगे।”

खा-पीकर, घूमते-फिरते, घर आते-आते शाम हो गई। पुष्पा ने कहा, “बेटा फ़्रेश होकर थोड़ा रेस्ट कर लो। फिर नीचे पार्क में चलते हैं।”

“नहीं मम्मा, अभी चलिए ना प्लीज़। हॉस्टल में तो पार्क में टहलने का टाइम ही नहीं मिलता। चलिए ना।”

“अच्छा ठीक है। पहले अच्छे बच्चे जैसे मुँह-हाथ धोकर आओ। दूध पियो। फल खा लो। मैं भी चाय पी लूँ। फिर चलते हैं।”

“ओके मम्मा,” मयंक बोला।

इस बार पूरे दस साल का हो जाएगा। मेरी गर्दन तक लंबा हो गया है। मयंक को प्यार से निहारते हुए पुष्पा ने सोचा। दोनों माँ-बेटे नीचे पार्क में आए। मयंक को तो जैसे पंख लग गए थे। कभी झूला झूलना। कभी पेड़ पर चढ़ना। कभी घास पर कलाबाज़ियाँ दिखाना। पुष्पा बेंच पर आराम से बैठ गई। अब पेड़ों के पत्ते पीले हो गए हैं। धीरे-धीरे सारे पत्ते झड़ जाएँँगे। फिर नये पत्ते इन पेड़ों का शृंगार करेंगे। हम अपने अतीत के पीले पत्तों को, इन पेड़ों की तरह क्यों नहीं उतार कर फेंक पाते। सामने नैना बालकनी में आरती के थाल को चारों तरफ़ घुमाती दिखाई दी। पुष्पा का मन किया, नैना से मयंक को मिलवाया जाए। सम्भव है मेरी समस्या हल हो जाए। सोमवार को नैना के पास ही मयंक को छोड़ दूँगी। शाम को ऑफ़िस से आकर ले जाऊँगी। उसने मयंक को आवाज लगाई, “मयंक! ओ मयंक! आ जाओ चलो, आज तुम्हें अपनी फ़्रेंड से मिलवाती हूँ।” नैना के घर जाकर डोर बेल बजाई। तुरंत दरवाज़ा खुला। पुष्पा और मयंक को देखकर नैना चौंक गई।

”अरे यह तुम्हारा बेटा है ना! बिल्कुल समर की पर्सनालिटी है। बिना पूछे कोई बता दे, कि उसीका बेटा है। आ जाओ अन्दर बैठो।”

“नमस्ते आण्टी!” मयंक अन्दर आकर बैठ गया।

“बैठो पुष्पा! मैं कुछ नाश्ता लेकर आती हूँ।”

अन्दर से चाय-नाश्ते की ट्रे रखकर नैना गई, और एक छोटा-सा पालना लेकर आई। उसमें वही कान्हा की छोटी-सी मूर्ति थी। एक हाथ में लड्डू लिए हुए। नैना बोलते हुए आ रही थी, “अले बाप ले! रूठ गए कान्हा बाबू! एक मिनट के लिए भी इन्हें ध्यान नहीं दिया, बस हो गए नाराज़। यह देखो कौन मिलने आया है। मयंक भैया है, दोस्ती करोगे इनसे।”

मयंक मूर्ति देखकर चहक उठा, “अरे लिटिल कृष्णा! मुझे दो ना आण्टी! मैं इसे अपने साथ घुमाता हूँ। कितना सुंदर पालना है! कितना स्वीट लिटिल कृष्णा है! मुझे दो ना प्लीज़। पता है, हमारे स्कूल में जन्माष्टमी मनाते हैं ना, तो सब बच्चे, लिटिल कृष्णा को पालने में झूलाते हैं।” ज़ोर से पालने को हिलाते ही, मूर्ति एक ओर को लुढ़क गई, और पालने से गिरकर सीधे मयंक के पैर पर जा लगी। मयंक पैर पकड़कर रोने-चिल्लाने लगा, “ओह! मम्मा!” पुष्पा ने जल्दी से चोट को दबाया, ख़ून बहने लगा था। बोली, “नैना, जल्दी से बर्फ़ ले आओ।” पुष्पा ने देखा, तो नैना स्तब्ध खड़ी थी। उसने अपराध बोध से मूर्ति को उठाया। उसे नल पर ले जाकर धोया। पोंछकर मंदिर में रखा। और हाथ जोड़कर आँखें मूँद कर खड़ी हो गई। आँखों से लगातार आँसू गिर रहे थे। “क्षमा! क्षमा करो प्रभु! क्षमा! मुझे माफ़ करो! मुझ पर कृपा करो!”

पुष्पा फटी आँखों से नैना को देखे जा रही थी। मयंक रो रहा था। पुष्पा ने हाथ हटाकर, चोट वाली जगह पर, अपना स्टॉल कसकर बाँधा और मयंक को गोद में उठाकर ले चली। नैना के पास जाकर बोली, “नहीं नैना! अगर कहीं ईश्वर है, तो वह तुझे क्षमा नहीं करेगा।” वह मयंक को लेकर तेज़ी से चली डॉक्टर के पास। सड़क पर बने छोटे से मंदिर में लाउडस्पीकर पर कबीर के दोहे बज रहे थे:

“पत्थर पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूँ पहाड़।
तासे तो चक्की भली, पीस खाय संसार॥"

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