रीढ़
काव्य साहित्य | कविता सुनीता मंजू1 Feb 2026 (अंक: 293, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
झुकती है कभी तनती है
अच्छी लगती है जब तनती है
गर्व से, आत्मसम्मान से,
स्वाभिमान से।
अच्छी लगती है, जब झुकती है
शर्म से, हया से,
आदर से, प्रेम से।
सुहाती नहीं जब झुकती है
चापलूसी में, ठकुरसुहाती में,
जी हुज़ूरी में।
सुहाती नहीं जब तनती है
घमण्ड से, शक्ति के मद से,
दमन में, दलन में, शोषण में।
झुकने और तनने की
मुश्किल से निजात पायी उन्होंने
बन गये केंचुआ।
अन्य संबंधित लेख/रचनाएं