जोंक
काव्य साहित्य | कविता सुनीता मंजू1 Sep 2026 (अंक: 301, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
न हटती है
न काटती है
बस चिपक गयी कहीं, मौक़ा पाकर
अब मेरे ख़ून से
लाल टहटह
मोटी मस्त
चूसने में व्यस्त
अब पड़ी नज़र
मेरी मेहनत, उसकी ख़िदमत!!
बहुत हुआ
अब तो नमक डालना ही होगा
इस परजीवी पर
नहीं लागू हर जगह
अहिंसा परमो धर्मः
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