माँ-बाप
काव्य साहित्य | कविता सुनीता मंजू1 Sep 2026 (अंक: 301, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
जो जीवित माँ-बाप वृद्धाश्रम में भेजे जाते हैं,
मरणोपरांत
उनकी तस्वीर, घड़ी, चश्मा, छड़ी
सोने के फ़्रेम में जड़ें जाते हैं
तस्वीर
नहीं माँगती खाना, चाय, पानी
बार-बार
नहीं थूकती यहाँ-वहाँ
तस्वीर का
नहीं होता पेट ख़राब
नहीं लगते दस्त
नहीं होती उल्टी
नहीं आता ग़ुस्सा
चीखती चिल्लाती नहीं
तस्वीर
सौम्य मुस्कान लिए
टँगी रहती है दीवार पर
आप अपनी सुविधानुसार
धूप दीप अगरबत्ती जलाएँ
माला पहनाएँ
चाहे बंद कर दें
कमरे के भीतर
कई दिनों के लिए
वह शिकायत नहीं करती
रहती है होंठों पर हमेशा
एक सौम्य व्यंग्यात्मक
मुस्कान!!!
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