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बुर्ज ख़लीफा के सामने

मिरेकल गार्डन में

मिरेकल गार्डन में

म्यूज़ियम ऑफ़ फ़्यूचर के सामने

दुबई फ़्रेम

ऊँचाइयों, रेत और रोशनी का रोमांच है दुबई की यात्रा

 

गतिशीलता जीवन का पहला नियम है। जब जीवन गतिमान होता है, तभी संसार हमें जीवंत, आकर्षक और संभावनाओं से भरा प्रतीत होता है। प्रकृति, मौसम, नदियाँ, पर्वत, इमारतें और तकनीकी संसार, सब मानो हमें आमंत्रित करते हैं। ऐसे में पाँवों को बाँध पाना कठिन हो जाता है और हम निकल पड़ते हैं दुनिया को देखने, सभ्यताओं को समझने और मानव-क्षमताओं की सीमाएँ परखने। 

मेरे लिए यात्रा कभी केवल स्थान-परिवर्तन नहीं रही। वह आत्मबोध और सीख की प्रक्रिया रही है। इस यायावरी का आनंद तब और बढ़ जाता है, जब साथ हों वे चेहरे जिनसे जीवन की पहली स्मृतियाँ जुड़ी हों। कुछ ऐसा ही इस बार हुआ, जब मेरे इंजीनियरिंग के दिनों के सहपाठियों ने सपरिवार दुबई-अबू धाबी यात्रा का प्रस्ताव रखा। 1972 बैच के ये मित्र इससे पहले थाईलैंड की यात्रा कर चुके थे, किन्तु तब मैं अमेरिका में होने के कारण साथ नहीं जा पाया था। इस बार वह अवसर हाथ से जाने देने का प्रश्न ही नहीं था। जनवरी के प्रथम सप्ताह में हम छह सहपाठी अपने-अपने परिवारों के साथ मुंबई पहुँचे और केसरी ट्रैवल्स की व्यवस्था में दुबई के लिए उड़ान भरी। यह केवल यात्रा नहीं, वर्षों पुराने रिश्तों को फिर से जीवित करने का अवसर भी था। 

हमारी उड़ान रात्रि में रास अल-ख़ैमा एयरपोर्ट पर उतरी। औपचारिकताओं के बाद जब बस होटल की ओर बढ़ी, तो रोशनी से नहाई सड़कें और सुव्यवस्थित इमारतें यह एहसास करा रही थीं कि हम ऐसे देश में प्रवेश कर चुके हैं, जहाँ आधुनिकता केवल दिखावा नहीं, बल्कि जीवन-पद्धति है। 

अगली सुबह से दुबई भ्रमण प्रारंभ हुआ। हमारी टूर गाइड सोनिया ने संयुक्त अरब अमीरात के गठन, उसके आर्थिक विकास और शासकों की दूरदर्शी सोच पर विस्तार से जानकारी दी। सात अमीरातों—अबू धाबी, दुबई, शारजाह, अजमान, उम्म अल-क़ैवैन, फ़ुजैराह और रास अल-ख़ैमा से मिलकर बने इस राष्ट्र ने 1971 के बाद जिस तीव्र गति से विकास किया, वह वास्तव में चकित करने वाला है। 

रास अल-ख़ैमा अपनी प्राकृतिक विविधता और ऐतिहासिक धरोहरों के लिए जाना जाता है। वहीं दुबई व्यापार, पर्यटन और आधुनिक शहरी नियोजन का वैश्विक केंद्र बन चुका है। सोनिया ने यह भी बताया कि दुबई ने शिक्षा को अपने विकास का आधार बनाया है। यहाँ विश्व के कई प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के अंतरराष्ट्रीय कैंपस संचालित हैं। व्यक्तिगत आय पर कर न लगना भी इसे वैश्विक पेशेवरों के लिए आकर्षक बनाता है। 

जैसे-जैसे बस दुबई की ओर बढ़ती गई, खिड़की के बाहर बदलता दृश्य हमारी आँखों को बाँधे रहा। चौड़ी सड़कें, सटीक यातायात, गगनचुंबी इमारतें और अनुशासन, सब कुछ योजनाबद्ध था। दुबई केवल देखने का शहर नहीं है, वह देखने वाले की सोच को भी चुनौती देता है। जबल अली क्षेत्र से गुज़रते हुए हमें विश्व के सबसे बड़े मानवनिर्मित बंदरगाहों में से एक देखने का अवसर मिला। इसी क्षेत्र में स्थित भव्य हिंदू मंदिर यूएई की बहुधार्मिक सहिष्णुता और आधुनिक दृष्टिकोण का सशक्त उदाहरण है। 

इसके बाद हम ‘पाम जुमैरा’ पहुँचे, यानी कि ताड़ के पेड़ के आकार में विकसित मानव-निर्मित द्वीप। समुद्र में ऐसा प्रयोग आधुनिक इंजीनियरिंग का अद्भुत उदाहरण है। यहाँ तक पहुँचने के लिए लगभग 1.4 किलोमीटर लंबी अंडरवॉटर टनल से होकर गुज़रना पड़ता है। लग्ज़री होटल, विश्वस्तरीय रिसॉर्ट, आवासीय अपार्टमेंट, सुसज्जित समुद्र तट, वाटर-स्पोर्ट्स जैसी अनेक मनोरंजन गतिविधियाँ, मोनोरेल और ‘एटलांटिस द पाम’ जैसे प्रतिष्ठान इस द्वीप को विशिष्ट बनाते हैं। 

यहीं से कुछ दूरी पर स्थित ‘बुर्ज अल अरब’ होटल समुद्र में खड़े पाल के समान दिखाई देता है। 321 मीटर ऊँचा यह होटल केवल विलासिता नहीं, बल्कि स्थापत्य साहस का प्रतीक है। इसकी सजावट में 24 कैरेट सोने की परत, संगमरमर और दुर्लभ सामग्री का प्रयोग हुआ है। होटल के शीर्ष पर स्थित हेलिपैड इसे और विशिष्ट बनाता है। यहीं पर 2005 में आंद्रे आगासी और रोजर फ़ेडरर के बीच ऐतिहासिक प्रदर्शनी टेनिस मैच खेला गया था। 

यहाँ से हमारी बस शेख़ ज़ायद रोड की ओर चल पड़ी। कुछ ही समय में एमिरेट्स टॉवर्स दिखाई देने लगे। उन्हीं के समीप, सड़क के मध्य भाग में, म्यूज़ियम ऑफ़ फ़्यूचर स्थित है—एक ऐसी संरचना, जो पहली ही दृष्टि में विस्मित कर देती है। यह निस्संदेह आधुनिक इंजीनियरिंग का एक अद्भुत और अतुलनीय करिश्मा है। संग्रहालय का बाहरी आकार वलयाकार (टोरस) है, एक ऐसा ज्यामितीय रूप, जिसे स्थिरता, भार-वितरण और निर्माण-योग्यता के स्तर पर साकार करना अत्यंत चुनौतीपूर्ण रहा होगा। संग्रहालय की अलग-अलग मंज़िलें अंतरिक्ष, भविष्य की तकनीक, विज्ञान, पर्यावरण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मानव जीवन के नवाचारों और सस्टेनेबिलिटी जैसे विषयों को ऐसे अनुभवात्मक संसार में प्रस्तुत करती हैं, जो दर्शक को चेतना के स्तर पर पूरी तरह डुबो देने वाला अनुभव होता है। यह संग्रहालय ज्ञान, कल्पना और विज्ञान का अद्भुत संगम है, जो आने वाले कल की झलक दिखाता है। सूर्यास्त के बाद यह पूरी संरचना एक जीवंत प्रतीक में परिवर्तित हो जाती है। रोशनी और वलयाकार संरचना के ऊपर अरबी में उकेरे गए सुलेख मिलकर इसकी भव्यता को और भी प्रभावशाली बना देते हैं। 

पेशवा रेस्टोरेंट में सुरुचिपूर्ण भारतीय भोजन का आनंद लेने के बाद हम लहबाब के लाल रेगिस्तान की ओर निकले। दूर-दूर तक फैली लाल रेत को देखना ही अपने आप में एक रोमांचकारी अनुभव था। कुछ देर रुककर हम रेत पर दौड़ते 4×4 वाहनों को देखते रहे। रेत पर इन वाहनों को चलाना बिल्कुल भी आसान नहीं था, वे कभी भी नियंत्रण से बाहर हो जाते थे और उन्हें सँभालना कठिन हो जाता था। हमारे साथियों में से कोई भी इस रोमांचक सवारी की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। हालाँकि मेरी इच्छा थी कि इस रोमांच को कम से कम एक बार स्वयं महसूस करूँ। मेरे अनुरोध पर सूर्या नायडू आगे आए और हमने टिकट ले लिया। हमने बहुत सावधानी से वाहन चलाया और अत्यधिक ऊँचाई पर ले जाने से बचते रहे। लगभग आधे घंटे के इस रोमांचकारी सफ़र ने हमें आत्मविश्वास और एक अविस्मरणीय अनुभव से भर दिया। 

इसके बाद हमारा कार्यक्रम रेगिस्तान में ही स्थित एक सांस्कृतिक स्थल पर रात्रि भोज का था। लैंड क्रूज़र से रेत पर दौड़ना रोमांचक था। डिनर स्थल के प्रवेश द्वार पर अरबी क़हवा (चाय) और खजूर से हमारा पारंपरिक स्वागत किया गया। इसके बाद तानूरा और बेली डांस जैसे लोकनृत्यों का आनंद लेते हुए हमने रात्रि भोजन किया। 

अगला दिन बुर्ज ख़लीफ़ा के नाम रहा। विश्व के सबसे भव्य और विशाल ‘दुबई मॉल’ में एक घंटा घूम कर हम मॉल के भीतर लगे ‘बुर्ज ख़लीफ़ा। एट द टॉप’ संकेत-पट्टों का अनुसरण करते आगे बढ़े। कुछ ही दूरी पर एक एयर-कंडीशन्ड वॉकवे आ गया, जो सीधे बुर्ज ख़लीफ़ा की ओर ले जाता है। थोड़ी ही देर में हम “एट द’ टॉप” ऑब्ज़र्वेशन डेक के प्रवेश द्वार पर थे, जहाँ से ऊपर जाने के लिए लिफ़्ट उपलब्ध थी। लगभग पंद्रह–बीस मिनट की प्रतीक्षा के बाद हम दुनिया की सबसे तेज़ लिफ़्ट में सवार थे। ग्राउंड फ़्लोर से 124वीं मंज़िल तक हम पलक झपकते ही पहुँच गए। इस दूरी को तय करने में मात्र 61 सेकंड लगे। ऊपर से दुबई शहर का दृश्य अत्यंत मनोहारी था—चमचमाती इमारतें, दूर तक फैला रेगिस्तान और नीला समुद्र एक साथ दिखाई दे रहे थे। इससे पहले हम एफ़िल टॉवर से पेरिस और वर्ल्ड ट्रेड सेंटर से न्यूयॉर्क का दृश्य देख चुके थे। ऊँचाई से धरती को देखना हमेशा रोमांचक लगता है और इस बार भी रोमांच कम नहीं था। लगभग दस मिनट वहाँ बिताने के बाद हम नीचे लौट आए। जैसा कि सर्वविदित है, वर्तमान में ‘बुर्ज ख़लीफ़ा’ दुनिया की सबसे ऊँची इमारत है। यह 2010 में बनकर तैयार हुई। 160 से अधिक मंज़िलों वाली इस इमारत की कुल ऊँचाई लगभग 828 मीटर है और इसका एक बड़ा भाग आवासीय उपयोग में है। तत्पश्चात् बुर्ज ख़लीफ़ा के बाह्य प्रांगण से हमें, इस भव्य इमारत को निहारने और फ़ोटोग्राफ़ी करने का अवसर मिला। विभिन्न कोणों से ली गई तस्वीरें स्मृतियों में बस गईं। इसके बाद हमने दुबई मॉल में स्थित एक्वेरियम भी देखा। 

वापसी में हम जाबील पार्क स्थित दुबई फ़्रेम के सामने फोटोग्राफी के लिए रुके। दुबई फ़्रेम शहर का एक अन्य प्रमुख आकर्षण है। यह एक विशाल चित्र-फ़्रेम है जिसकी ऊँचाई लगभग 150 मीटर और चौड़ाई लगभग 95 मीटर है। इसके एक ओर से देखने पर पुराना दुबई-डेरा, करामा आदि तथा दूसरी ओर से देखने पर आधुनिक दुबई-शेख़ ज़ाइद रोड, गगनचुंबी इमारतें आदि नज़र आती हैं। इस फ़्रेम पर चढ़ी सुनहरी परत इसे अतिरिक्त भव्यता प्रदान करती है। यहाँ से हम डेरा क्षेत्र में स्थित विश्व-प्रसिद्ध स्वर्ण बाज़ार ‘गोल्ड सूक’ पहुँचे। इस बाज़ार की सबसे बड़ी विशेषता उसकी विश्वसनीयता है। दुबई सरकार की सख़्त निगरानी के कारण सोने की शुद्धता सुनिश्चित रहती है और वज़न व कैरेट के मामले में किसी गड़बड़ी की आशंका नहीं होती। इसी कारण दुनिया भर के पर्यटक यहाँ निश्चिंत होकर ख़रीदारी करते हैं। 

शाम को दुबई क्रीक पर डाऊ क्रूज़ में रात्रि भोज से पहले हमने विश्व की सबसे लंबी कार लिमोजिन में सफ़र किया। इसके बाद कृत्रिम रूप से विकसित दुबई क्रीक में मरीना डाऊ क्रूज़़ पर सवार हुए। ये क्रूज़ लकड़ी की बनी पारंपरिक अरबी नौकाएँ, ‘डाऊ’ होती हैं जिन्हें आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित किया गया है। क्रूज़़ पर शानदार ‘बुफ़े डिनर’ के साथ, पारंपरिक लोकनृत्य ‘तानूरा’ और संगीत का आनंद लिया। जगमगाती रोशनी में डूबी गगनचुंबी इमारतों और लग्ज़री अपार्टमेंट्स के बीच लेजर एवं ड्रोन द्वारा निर्मित नयनाभिराम आकृतियों को देखना हैरतअंगेज़कारी था। 

यात्रा के अंतिम चरण में दुबई मिरेकल गार्डन पहुँचना किसी स्वप्न में प्रवेश करने जैसा था। हमें बताया गया कि रेगिस्तान के बीच विकसित इस उद्यान में 150 मिलियन से अधिक फूलों का उपयोग कर महल, सुरंगें, दिलाकार गलियारे और विशाल कलात्मक संरचनाएँ निर्मित की गई हैं। इनमें सबसे अधिक आकर्षण का केंद्र ‘एमिरेट्स ए 380’ विमान का फूलों से बना विशाल मॉडल है, जो अपनी भव्यता और तकनीकी उत्कृष्टता के कारण गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज है। 

दुबई से विदा लेते समय हम केवल नयनाभिराम तस्वीरें और स्मृति-चिह्न ही नहीं, बल्कि अनुभव, आत्मविश्वास और प्रेरणा भी साथ लेकर लौटे। यह यात्रा निरंतर यह एहसास कराती रही कि यदि दृष्टि स्पष्ट हो, योजना सुदृढ़ हो और उसे साकार करने की इच्छाशक्ति दृढ़ हो, तो असम्भव प्रतीत होने वाले कार्य भी सम्भव बनाए जा सकते हैं। यहाँ इस्लामी सांस्कृतिक मूल्यों की जड़ें अत्यंत गहरी हैं, किन्तु उनके ऊपर आधुनिक विज्ञान, तकनीक और वैश्विक समरसता की मज़बूत इमारत खड़ी करने का जज़्बा दुबई ने दिखाया है। शायद यही दुबई की सबसे बड़ी सीख है और यही इस यात्रा की सबसे मूल्यवान उपलब्धि भी। 
 

ऊँचाइयों, रेत और रोशनी का रोमांच है दुबई की यात्रा

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