यही तो समाज है!
काव्य साहित्य | कविता सिया लेखनी1 Feb 2026 (अंक: 293, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
ये जातिवादियों का समाज है—
यहाँ प्रेम और सच्चाई का
कोई मूल्य नहीं!
ये पुरुषों का समाज है—
यहाँ स्त्रियाँ, देवी तो कहलाती हैं
पर अधिकार, समतुल्य नहीं!
ये दहेज़-लोभियों का समाज है—
डरती है दुनिया, इन भूखे-नंगों से
रँगी है थाली इनकी, अपनों के ख़ून से!
ये भक्तों का समाज है—
सच कोई पाता नहीं
जय-हो, जय-हो के शोर से
माहौल ग़मगीन हैं
कितनों का दर्द मैं समेटूॅं . . . हाय!!
बेईमानियाँ रंगीन हैं!
ये नराधम अंधविश्वासियों का समाज है—
तर्क-वितर्क से पाला नहीं
और थकते, जपते माला नहीं!
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