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इन्तज़ार

 बीती रात, 
झकझोर दिया इक ख़्याल ने 
उठ बैठी
अँधेरी काली रात में 
चहुँ ओर सिर्फ अन्धकार, 
बुझ गये सारे दीये, 
अरे, कोई टिमटिमा भी नहीं रहा, 
ये बेबुनियाद लम्हें 
ये सरकती सी ज़िन्दगी 
पूछती सिर्फ इक सवाल 
अब किसका इन्तज़ार 
सलाम होता कुर्सी, जवानी व 
पैसे को, 
विदाई ले चुके यह सब 
रह गई सिमटी सी देह, 
खुश्क आँखें, कँपकँपाते हाथ, 
टपकती छतें व सिलवटों 
से भरे बिस्तर, 
नाहक़ जीने की चाह,
ख़्याल जीत गया, 
पूछ ही बैठा दोबारा, 
बता अब किसका इन्तज़ार।

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