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जब भगवान ने भारत से चुनाव लड़ा

स्वर्ग लोक में लक्ष्मीजी सुबह सुबह हाथों में गर्म गर्म चाय की प्याली लिए विष्णु जी पास पँहुचीं। उस समय विष्णु जी शेषनाग की शैय्या में लेटे लेटे नींद का लुत्फ़ उठा रहे थे। निकट जाकर धीरे से बोलीं- "नाथ! उठिये, भोर हो गई है। तनिक आँखें खोलिए और ताज़ी ताज़ी ताजमहल चाय का आनंद उठायें।"

भगवान उठे। चाय की चुस्की लेते हुए उन्होंने लक्ष्मी जी से कहा- "क्या बात है इस चाय की! बाई दी वे कहाँ से है?"

"दार्जलिंग इंडिया से।" लक्ष्मी ने उत्तर दिया।

घूँट मारते मारते उन्होंने कहा- "कुछ भी कहो प्रिये, बड़ी उम्दा है।" पास में पड़े टी वी कंट्रोल को उठाकर ज्योंही किल्कि किया टेलीविज़न पर हिन्दोस्तान का भारत दूरदर्शन चैनल खुला, जिसमें "ब्रेकिंग न्यूज़" आ रही थी।

"ये आकाशवाणी का दूरदर्शन केन्द्र है। अब आप हेमवंतीनन्दन से समाचार सुनिये।"

भगवान जी लक्षमी जी से मुख़ातिब होकर बोले- "प्रिये! बोलता बहुत सुन्दर है ये बच्चा। बड़ा दम है इसकी आवाज़ में। या तो अमिताभ बच्चन की आवाज़ में है या फिर इसकी! क्यों?"

लक्ष्मी जी ने सिर हिलाकर उनका समर्थन किया। न्यूज़ चालू थी...

"संसद में प्रश्नकाल के दौरान प्रधान मंत्री घासीराम ने कहा लोकसभा के अगले चुनाव 3 महीने के बाद किये जायेंगे। जिसे सुनकर विपक्ष की नींदें उड़ गईं, क्योंकि वे इसके लिए तैयार नहीं थे।

जैसे ही टी वी पर लक्ष्मीजी ने चुनाव का ऐलान सुना, दौड़ कर टेलीविज़न का स्विच ऑफ़ कर के भगवान जी के पास आकर बोलीं- "नाथ आप इस शेषनाग रूपी सोफे पर लेटे लेटे थकते नहीं? आठों पहर टी वी देखते देखते बोर नहीं होते?"

विष्णु जी उनका अभिप्राय को नहीं समझे, बोले- "आपने टी वी क्यों बन्द किया? प्रिये! ख़्‍ाबरें आ रहीं थी, वो भी चुनाव की।"

"इसीलिए किया बन्द।" लक्ष्मी जी बोलीं-"अब ध्यान से सुनिए, हमारी मानिये तो आप कुछ दिनों के लिए भारत भ्रमण पर जाकर इस बार वहाँ चुनाव में खड़े होकर अपने भक्तों यानि मतदाताओं का उम्मीदवार बन कर उनका कल्याण करें।"

"मैं और चुनाव....! लक्ष्मी तुम सठिया तो नहीं गई!! ये कैसी बात कर रही हो?" कहते कहते फिर टी वी चालू कर दिया।

"क्यों क्या हुआ?" लक्ष्मी ने टोकते हुए कहा- "बन्द कीजिए टी वी को। हम आपसे कुछ कह रहे हैं..., आप यहाँ भी हर पल उठक-पटक, उसकी समस्या, इसकी समस्या को सुलझाते रहते हैं। ये भी किसी चुनाव से कम थोड़ा है? फिर वहाँ के चुनाव लड़ने से क्यों कतरा रहे हैं आप? यूँ भी हज़ारों करोड़ों लोग आपकी मूर्ती के आगे हाथ जोड़े आपसे कुछ न कुछ माँगते ही रहते हैं। अगर उन्हें पता चलेगा कि आप स्वयं धरती में उनका प्रतिनिधि बनकर उनके कल्याण के लिए चुनाव लड़ने आये हैं और चुनाव लड़कर उनकी सारी समस्याओं को दूर कर देंगे। उनके दुखों के संताप को हर कर जीवन में खुशहाली भर देंगे, तो मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि सारे के सारे वोट आपको ही पड़ेंगे।"

भगवान तनिक गंभीर होकर बोले-"प्रिये! कहीं तुमने सचमुच मन तो नहीं बना लिया है कि हम भारत में जाकर चुनाव लड़ें?"

लक्ष्मी ने अपने दोनों ाथों को जोड़कर भगवान जी को पास जाकर विनम्र भाव से कहा- "हे दीनानाथ! आपने हमारे हृदय की बात को बिन कहे ही समझ लिया। तभी तो संसार आपको अंतरयामी कह कर पुकारता है प्रभो! मेरी हाiर्दक इच्छा भी यही है कि आप वहाँ जाकर अवश्य चुनाव लड़ें।"

भगवान जी को काटो तो खून नहीं! धर्म संकट में फंस गये संकट मोचन! सोचने लग गये लक्ष्मी की बुद्धि को क्या हो गया?...

समझाते हुए कहने लगे- "देखो जिसे आप चुनाव समझ रही हो वो चुनाव नहीं महज़ एक धोखा है, छल है, फरेब है। मतदाताओं की भावनाओं से खेलकर अपना उल्लू सीधा करना है। उन्हें सब्ज़ बाग दिखाकर पाँच साल तक उनकी आशाओं को अपने पास गिरवी रखना है। समझ गई हैं आप...?" विष्णु जी जैसे पलटे तो देखा लक्ष्मी जी कान को फ़ोन लगाये किसी को नंबर मिलाने पर लगी हुई थीं।

 ’ये किसको मिला रही हैं आप....?"

 "नारद जी को..." लक्ष्मी ने कहा और कहकर आसमान की ओर देखने लगी।

"लो कर लो बात। ये तो हमको भारत भेजकर ही दम लेगी, ऐसा लगता है।" कहते हुए धम्म से सोफे में धंस गये। इतने में लक्ष्मी जी ने फोन को एक कान से हटाकर दूसरे पे लगाते हुए कहा- "गुरुदेव प्रणाम...। आप शीघ्र ही यहाँ चले आयें...नहीं...नहीं... हमें कुछ नहीं सुनना है। आप तुरंत चले आयें।" बिना कुछ सुने फोन को खट से रख कर भगवान जी से कहने लगी-  "हाँ, आप कुछ कह रहे थे, फरेब है धोखा है...।"

भगवान जी बोले- "मैं यह कह रहा था जो खेल आप खेलने की सोच रही हैं न... वो बड़ा कष्टदाय है। उसमें हमारे साथ-साथ आपके खानदान का भी कच्चा चिट्ठा खोला जायेगा। हमारे, आपके नाम व चरित्र पर उँगलियाँ उठा उठा कर लांछन लगाये जायेंगे।"

कौन लगायेगा लांछन? कौन उठायेगा उँगलियाँ। किसकी हिम्मत है जो ऐसा करेगा।" गुस्से में तपकर लक्ष्मी जी बोलीं।

"आदमी...प्रिये! आदमी!!। इस जंतु को आप नहीं जानती और न ही समझ पाओगी। बहुत ऊँची रकम है।"

वार्ता चल ही रही थी कि नारद जी ने प्रवेश किया- "नारायण! नारायण!! भगवन... कहिए कैसे याद किया।" भगवान जी ने लक्ष्मी की ओर इशारा करते हुए कहा- "इनसे पूछिए।"

"कहिए माते क्या आज्ञा है?" नारद जी ने कहा।

"हमने निर्णय लिया है कि त्रिलोकीनाथ इस बार भारत में होने वाले चुनाव में खड़े होकर चुनाव लड़ेंगे। आपको उनके चुनाव का सारा कार्य भार संभालना होगा। एक सलाहकार के रूप में आपको इनकी चुनाव रणनीति से लेकर पोस्टरबाज़ी तक सब देखना होगा।" लक्ष्मी जी ने समझाते हुए कहा।

"नारायण..., नारायण प्रभो... लगता है आपकी फ़जीयत होने वाली है। क्यों हमारी मिट्टी खराब करवाने में तुली हैं आप। वहाँ हमारी हार निश्चित है माते।"

"हार... कैसी हार। ये क्या कह रहे हैं ऋषीवर आप! हार.. वो भी तीनों लोक के अधिपति की! जिनके इशारों के बिना पत्ता तक नहीं हिलता उनकी हार।"

"आप सत्य कह रही हैं माते।" नारद बोले, "पत्ते तो नहीं हिलते मगर वोट जरूर रातों-रात इधर से उधर और उधर से इधर अवश्य गिर जाते हैं। जो सुबह तक अच्छा खासा जीतता रहता है दोपहर होते होते मुँह के बल औंधा होकर जमीन चाटता दिखाई देता है। वहाँ गiणत तो दो मिनट में गड़बड़ा जाता है माते।"

भगवान विष्णु ने नारद जी की बात का समर्थन करते हुए कहा- "लक्ष्मी नारद जी सत्य कह रहे हैं। पत्ते हमारे बस में ज़रूर हैं लेकिन वोट... वो हमारे बस से बाहर है। भारत में कुछ भी होना असंभव नहीं। वहाँ मतदाताओं का भेद पाना बहुत कठिन काम है। राकेट साइन्स जैसा है प्रिये राकेट साइन्स जैसा।"

"तभी तो नारद जी को आपके साथ भेज रहे हैं। भेद लगाने और लेने में संसार में इनसे बढ़कर है कोई?"

यह सुनकर भगवान तथा नारद एक दूसरे का चेहरा देखने लगे। मायूस होकर भगवान नारद से बोले- "हे सखे!..एक बार और ट्राई करो। क्या पता मान जाए।"

नारद जी बड़े विनम्र भाव से लक्ष्मी जी से कहने लगे- "माते! मनुष्य एक रहस्यमयी प्राणी है। इसका भेद ना तो उसके माता-पिता, ना भाई-बन्धु, ना सगे-सम्बन्धियों और ना ही उसकी स्वयं अर्धांगिनी को ही होता है। तो ऐसे में फिर भला हम कैसे उसका भेद मालूम करेंगे?"

लक्ष्मी जी तुनक कर विष्णु जी से कहने लगी- "देखिये! अगर आप इस चुनाव में भाग नहीं लेंगे तो हम अपने मायके चले जायेंगे फिर आप ेखते रहियो.. हाँ...।"

भगवान ने उनके इस रूप को देख कर कहा- "डार्लिंग! ये आप कैसी बात कर रहे हैं..., आप जो चाहेंगी वैसा ही होगा।" नारद की ओर देखते हुए बोले- "सखे! प्रस्थान की तैय्यारियाँ आरम्भ कीजिए।"

भगवान और नारद जी अपने अपने सूटकेस पैक करने में व्यस्त थे। इतने में लक्ष्मी हाथों में बाँसुरी लेकर वहाँ दाखिल होते हुए बोलीं-"नाथ! अपने साथ इसे भी रखना न भूलियेगा। मायूसी में आपका साथ देगी।" बाँसुरी को देते हुए ये कह कर वह चल दीं।

 पुष्प विमान भगवान तथा नारद जी को लेकर स्वर्ग से सीधे मृत्युलोक की ओर चल पड़ा। भगवान नारद से बोले- "अब क्या होगा? मैंने महाभारत लड़ा। 18 औक्षणी सेना का सामना किया। उन्हें परास्त किया, तब भी मैं इतना विचलित व घबराया नहीं था जितना आज हूँ। नारद.. न जाने क्यों  मेरा मन किसी अज्ञात मात के भय से काँप रहा है।"

नारद बोले- "भगवान! वो लड़ाई ..वो लड़ाई तो धर्म और अधर्म की थी। ये लड़ाई...ये लड़ाई तो वोट व नोट की है। झूठ की है, फरेब की है। बेइमानी की है, चाटुकारिता की है। लड़ाई तो लड़ाई है प्रभो!.. चाहे वो ईराक की हो या फिiल्स्तान की, जहाँ एक ओर आधुनिक तकनीकी हथियार-राकेट, मिसाईल, बाईलौजिक्ल वैपन, शिक्षित सैनिक और दूसरी ओर ना तो गोली ना बंदूक, केवल पत्थर के टुकड़े! फिर भी आपस में लड़े जा रहे हैं।"

भगवान ने नारद की बात को बीच में ही काटते हुए कहा- "इराक पर ये कह कर हमला करना कि उसके पास बाईलौजिक्ल हथियार हैं, ये सरासर झूठ था। हमला करने के लिए दुनिया से झूठ बुलवाया। झूठ का सहारा लेकर हमला करना कहाँ का औचित्य है?"

नारद बोले- "भगवन्‌! अगर आप मुझे क्षमादान दें तो झूठ तो आपने भी बुलवाया था धर्मराज युधिष्ठर  से महाभारत के युद्ध में।"

यह कहते-कहते धरती दिखाई दी। दोनों ने मनुष्य रूप धारण किया और चल दिये अपने लक्ष्य की ओर......।

जैसे धरती पर पाँव रखा ही था कि सामने से दो पुलिसवाले आते दिखाई दिये। वो विष्णु और नारद जी को रोक कर सवाल पर सवाल करने लगे..कहाँ से आ रहे हो?...कहाँ जा रहो हो?...क्या करते हो?...आदि आदि। नारद ने उत्तर दिया- "घर से आ रहे हैं और चुनाव कार्यालय की ओर जा रहे हैं।

पुलसिया बोला- "चुनाव लड़ोगे बेटा...?"

नारद जी बोले- "इरादा तो यही है।"

"इधर आ बे नेता के बच्चे। ये थैले में क्या है?" तलाशी लेते लेते उसने भगवान जी की ओर इशारा करते हुए कहा - "इसका क्या नाम है?"

नारद जी न उत्तर दिया - "भगवान...।"

"अब्बै बिष्णु भी बोलना साथ में!" खी..खी करके हँसने के साथ ही उसने दूसरे पुलसिए की तरफ देखा।

"आप सही कह रहे हैं। इनका नाम विष्णु भगवान ही है।" नारद ने कहा।

"बड़ा आया बिष्णु भगवान का बच्चा। चल है भी तो हमें क्या लेना-देना। ये बताओ पैसे-वैसे हैं जेब में कि नहीं।"

"पैसे कैसे पैसे...?" नारद जी ने कहा।

"पैसे नहीं समझते...डालर समझता होगा साला!" पहला दूसरे को देखकर बोला -"अब्बै.. ये कहीं.. अरे नहीं यार शक्ल से तो नहीं लगते।"

"बेटा ..शहर में पोटा लगा हुआ है। एक बार अंदर हो गए तो.. मरकर ही बाहर आओगे नेता जी। बताये देते हैं हम।" नारद जी को धक्का देकर वो बोला -"भग जा यहाँ से सुबह-सुबह बोहनी खराब कर दी। पता नहीं किस मनहूस का मुँह देखकर उठा हूँगा सुबह-सुबह।"

दूसरे ने तपाक से उत्तर दिया -"अपनी बीवी का..और किसका!" सुनकर दोनों हँसने लगे।

विष्णु और नारद जी आये दिन ये ही सोचते रहे कि चुनाव कैसे और कहाँ से लड़ा जाए? चुनाव का मुद्दा क्या हो? जैसे जैसे चुनाव की तारीख नज़दीक आती रही उन्हें बस यही संकोच सताने लगा। एकाएक नारद जी ने कहा -"क्यों न मुद्दा.. गरीबी, दु:ख-तकलीफ़ को रखें? जो यहाँ है, थी और रहेगी भी। ये तो नहीं हटेगी और नहीं समाप्त होगी और न ही इसका कोई हल है।"

भगवान बोले -"ये कोई नयी बात नहीं। इसके बारे में तो यहाँ का बच्चा-बच्चा जानता है। सदियों से वो यही देखता आ रहा है। माना हमने मुद्दा उठाया भी तो कौन करेगा हम पर यकीन? चलो माना थोड़ी देर के लिए माना वे मान लें कि हम गरीबी को हटा देंगे, अगर किसीने यह सवाल कर दिया कि कब और कितना समय लगेगा गरीबी को हटने में.. तो है हमारे पास इसका कोई  जवाब?"

"है भगवन्‌..है..जवाब है। क्यों  न आप ब्रह्मा जी से पूछें। उनके पास इसका जवाब है। क्योंकि वे अजर अमर हैं। उन्हें अवश्य पता होगा कि कब हटेगी।" नारद जी ने आशापूर्व कहा.."बस यही होगा हमारा चुनाव जीतने का ब्रह्मशस्त्र! हम लोगों को बता देंगे कि कब हटेगी गरीबी। वो भी खुश और हम भी खुश.. क्यों?"

"आपकी बात में दम तो है नारद जी।" भगवान बोले -"चलो ब्रह्मा जी का ध्यान लगाते हैं।" आसन लगाकर प्रभो ध्यान लीन हो गए। कुछ देर बाद ब्रह्मा जी प्रकट हुए और बोले -"वत्स कहो कैसे याद किया?"

भगवान बोले - "हे पितामह! हम धर्म संकट में फँसे हैं। लक्ष्मी जी ने हमें ज़िद करके इस मृत्युलोक में चुनाव लड़ने भेज रखा है। हमने अपना चुनाव का मुद्दा गरीबी रखा है.. जो यहाँ है भी। हमें किसी भी कीमत पर चुनाव जीतना है। ये स्वर्ग लोक की इज़्ज़त का प्रश्न भी है। लेकिन हम ये नहीं जानते कि यहाँ से गरीबी कब दूर होगी? अगर वो दिन, वो वार और समय हमें पता लग जाये तो हम जनता को यकीन दिलाने में कामयाब हो जायेंगे। जनता खुश होकर हमें वोट देगी और हम चुनाव जीत जायेंगे।"

"इसमें मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूँ?" ब्रह्मा जी बोले।

भगवान ने कहा -"आप अजर अमर हैं.. हैं ना।"

ब्रह्माजी ने कहा -"हाँ हूँ..।"

"तो शीघ्र बतायें कि कब यहाँ से गरीबी दूर होगी।"

पता नहीं वत्स, तब तक तो मैं भी मर जाऊँगा।" कहकर ब्रह्मा जी अंतरधान हो गए। भगवान मायूस होकर अपना मुँह लटका कर बैठ गए।

नारद जी  ढाँढंस बँधाते हुए कहने लगे -"प्रभो! मायूस न  होइये। ये मृत्युलोक है। यहाँ हर बात का तोड़ मिलता है। कोई न कोई हल मिल जायेगा। आप बस गरीबी पर अपना फ़ोक्स रखें.. बस।" कहते हुए नारद जी उठे - "मैं अभी मार्केट से दो चार टेप लेकर आता हूँ, अमिताभ की, दलीप कुमार की, राजकुमार की.. उनको देख देख कर आपने उनकी आवाज़, अदा, स्टाइल की नकल करनी है। अपने आने वाले भाषणों के लिए कि कब आवाज़ उठानी है, कब गिरानी है किस अदा से और कब हाथ व उँगली उठानी है। ये सारी अदाएँ सीखनी होंगी। आपको मतदाताओं को लुभाने के लिए"

"तो अब ये नौटंकी भी करनी पड़ेगी हमें।" - भगवान जी ने नारद को घूरते हुए कहा।

"करोगे नहीं तो तमाशा कैसे लगेगा? जनता कैसे जुटेगी? वोट कैसे मिलेंगे। और हाँ फ़ोकस याने गरीबी पर ध्यान रहे बस्स..!" नारद ने फिर से ध्यान दिलाया।

"गरीबी के पीछे क्यों लठ्ठ लेके पड़े हो। यहाँ का मतदाता इसके बारे में सब जानता है। पहले राजाओं न खाल खेंची फिर 150 से अधिक सालों तक अंग्रेज़ों ने चूसा। जब से आजादी मिली पिछले 56 सालों से अपने ही लूट खसोट मचा रहे हैं, ये बात वे सब जानते हैं।"

नारद बोले -"जानते हैं..जानते हैं। वे भी जानते हैं। हम भी जानते है और दुनिया वाले भी जानते हैं। आपको उनके सेन्टीमेन्ट से खेलना है। उनको रोटी कपड़ा और मकान के सब्ज़बाग दिखाने हैं। अपने भाषणों में आपने उन्हें खुशहाली के सपने बेचने हैं। पर भर के लिए उन्हें ये अहसास दिलाना है कि वे भी अमीर बन सकते हैं। सिर्फ़ वोट देकर। उनसे बार बार कहना होगा कि हम तो इतना कर रहे हैं, दे रहे हैं। आपने तो केवल वोट देना है.. सिर्फ़ एक वोट।"

"चलिए मुद्दा तो हो गया। चुनाव चिन्ह के बारे में सोचा है कुछ आपने?" - भगवान जी बोले।

नारद जी ने तपाक से उत्तर दिया -"डालर" कैसा रहेगा? सारी की सारी दुनिया पागल हुई पड़ी है इसके पीछे। डालर को देखकर तो आम आदमी व गरीब तो छलाँगें लगायेंगे, छलाँगें.. भगवन!! पागल होके दौड़ेंगे हमारे पीछे।"

भगवान जी ने कहा -"दादा देनी पड़ेगी आपकी खोपड़ी की। क्या चुनाव चिन्ह ढूँढा है आपने। मुद्दा हो गया। चुनाव चिन्ह हो गया। अब पार्टी का क्या नाम रखा जाए?"

"पार्टी...। पार्टी के नाम के बारे में थोड़ा सोचना पड़ेगा भगवन। सारा दारोमदार इसी पर निर्भर करता है। मेरे ख्याल से पार्टी का नाम आम आदमी से जुड़ा होना बहुत ज़रूरी है। जिसे सुनकर वो ये महसूस करे कि यह उसी की पार्टी है।"

"तो बतायें ना जल्दी जल्दी!" भगवान व्याकुल हो गए थे नाम सुनने को।

" ’गरीब दल’ कैसा रहेगा भगवन?" नारद जी बोले।

"अहऽम...इससे तो लगता है कि हमारे छोले बिक जायेंगे।" भगवान जी ने नारद को देखते हुए कहा- "क्यों न बजरंग दल रखें?"

"नहीं.. नहीं भगवन वो क्या है कि बजरंगदल से पालिटिक्स की बू आ रही है। अलगाव वाद का आभास हो रहा है। इसमें तो किसी एक ख़ास समुदाय की बात आ रही है जबकि हमें तो आम आदमी से जुड़ा रहना बहुत ही ज़रूरी है। आप ये क्यों भूल जाते हैं प्रभो? गरीब शब्द गरीबों का प्रतिनिधित्व करता है। भारत के आम आदमी की छबि उभरती है उसमें। ये आदमी मर जायेगा लेकिन अपने से.. गरीब व गरीबी को कभी भी अलग नहीं होने देगा। बड़ा स्वाभिमानी है यह प्राणी भगवन। यही इसकी कमजोरी भी है। मन मे एक बात बिठा लें- आपने तो बस इसकी इस कामज़ोरी को भुनाना है। इसको लपेट लपेट कर चुनाव जीतना है।" कहकर नारद चुप हो गए।

"समझ गए, समझ गए भली भान्ति समझ गए।" भगवान जी बोले -"अब समस्या खड़ी होती है कि कहाँ से चुनाव लड़ा जाए। बिहार से तो शालू भई हमें जीतने नहीं देंगे। महाराष्ट्र  तो पहले ही कह चुका है ये तो आपणी चै। पंजाब में अकाली हमें घुसने नहीं देंगे। हरियाणा से मन करता है लेकिन वहाँ भी खतरा ही है।" नारद जी को देखकर विष्णु जी बोले -"आप चुप क्यों हैं मुनिवर, कुछ तो सोचिये..।"

"घुमा रहा हूँ खोपड़ी को, देख रहा हूँ कि कहाँ से लड़ा जाए।" नारद जी ने सर पे हाथ फेरते हुए कहा - "मेरे ख़्‍याल से देवभूमि कैसी रहेगी?"

"आपका तात्पर्य पहाड़ यानि भारतखण्ड से तो नहीं है नारद जी?" भगवान जी ने जिज्ञासा बस पूछा।

नारद जी ने कहा -"हाँ प्रभो! अभी अभी तो बना है वो नया राज्य।"

"आपके मुँह में घी-शक्कर! क्या बात है आपकी! नारद जी एक काम कर दें प्लीज़, लक्ष्मी जी को फ़ैक्स कर दें कि चुनाव की सारी तैय्यारियाँ लगभग पूरी हो चुकी हैं..सिवाय नामीनेशन के। वो भी शीघ्र ही पूरी कर लेंगे।"

नामीनेशन का समय नज़दीक आता गया। नारद एवं भगवान जी की चिंतायें भी बढ़ने लगीं। नारद जी ने एक आइडिया दिया कि भगवन क्यों न मतदाताओं के करीब जाकर उनकी नब्ज टटोली जाए। उन्हें सुने कि वो क्या चाहते हैं।

"आइडिया बुरा नहीं है।" कह कर चल दिए दोनों कांस्टिचुएंसी की ओर। जाकर देखा कुछ लोग पंचायत चौंक में बैठे आपस में बतिया रहे थे। एक कह रहा था- "क्या बात है भाइयो जो अब तक ना तो कोई नेता ना कोई पार्टियों के कार्यकत्र्ता और ना ही चुनाव लड़ रही पार्टियाँ ही हमारे पास आई हैं। पिछले चुनाव में तो अब तक पोस्टर बाजी, गाड़ियों की भीड़, नेताओं के लम्बे लम्बे भाषणों से कान फट गए थे। साथ में हम लोगों की भी खूब चाँदी कुटी थी। हरएक को दस-पन्द्रह हज़ार रुपयों के साथ-साथ रोज़ दारू की बोतल और मुगŒ मिलती थी। याद है न सबको।"

सब एक साथ बोले.."हाँ, हाँ अच्छी तरह याद है।"

तो दूसरा बोला -"ठीक है, जितनी देर से आयेंगे हम भी अपने भाव उतने ही ऊँचे बढ़ायेंगे।" बीच में कोई बोला -"लेकिन हम अभी तक ये तय नहीं कर पाये हैं कि वोट किसे देना है?"

तभी कोई नेतानुमा आदमी खड़ा होकर बोला -"सब्र कीजिए भाइयो! हमें एकजुट होकर रहना है। अपनी अन्दरूनी बात का भेद किसी भी पार्टी वालों को न तो देना है और न ही देंगे कि हम किस के साथ हैं। बस यही होगा हमारा हथियार सब पार्टियों के साथ नैगोशियेशन करने के लिए। अगर आप लोगों को एतराज़ न हो तो मुझे अच्छी तरह आता है कि किस मुर्गी को कब और कैसे हलाल करना है। याद है ना.. पिछले चुनाव में मैंने ही आप सब लोगों को दस-पन्द्रह हज़ार रुपये दिलवाये थे.. याद है कि नहीं?" सबने सर हिला कर अपनी अपनी स्वीकृति दी, "याद है, याद है।"-- "तो बस्सऽदेऽऽऽऽऽऽऽ....आने वाली मुर्गियों का इन्तज़ार करो।"

कोने में बैठे एक व्यक्ति ने उठकर कहा -"देखिए, गाँव वालो! वोट एक शक्ति है। एक ऐसी चीज है जो आपकी व हमारी किस्मत बदल सकती है। हमें अपना वोट उस व्यक्ति या पार्टी को देना चाहिए जो हमारे बारे में सोचे, हमारे लिए काम करे। हमें चापलूसियों व सब्ज़बाग दिखाने वालों से बचना ज़रूरी है। आदमी के लिए पैसा ही सब कुछ नहीं है। असूल व सिद्धान्त और ज़मीर भी कुछ होते हैं।"

भीड़ में से कोई चिल्लाया -"अब्बे बैठ जा...बैठ जा! बड़ा आया सिद्धान्तों वाला। सिद्धान्तों की बात करन्ी है तो नेताओं के पास जा। जो हज़ारों करोड़ों डकारते हैं। अरऽऽरे! पैसे तो पैसे क्या वे तो हमारे जानवरों के चारे तक खा जाते हैं। बड़ा आया सिद्धान्तों वाऽऽऽला। जब वे इतना खा रहे हैं..अगर बहती गंगा में हमने डुबकी लगा ली तो तुझे काहे की मिर्ची लगी है।" फिर वह जनता से मुख़ातिब होकर बोला -"क्यों भाइयो?.. " सबने कहा, बिल्कुल सही कह रहा चमनलाल। कहते कहते खी खी कर सब हँसने लगे। चालू रहते चमनलाल बोला -"नेता जब एक पार्टी में से दूसरी पार्टी में जाने के लिए करोड़ों लेता है तो क्य हम पचास साठ हज़ार नहीं ले सकते।" तालियों से चौंक गूँज उठा।

तभी बच्चू बोला -"नेता जी वोट किसे देना है ये तो बताओ?"

नेता बोले -"बच्चू भाई, बतायेंगे बतायेंगे। पहले मुर्गियों को तो आने दो। फिलहाल राज़ को राज़ ही रहने दो। तुम क्या समझते हो, क्या पार्टी वालों ने अपने अपने जासूस नहीं छोड़ रखे होंगे हमारी बातों को जानने व सुनने के लिए। अरररे बड़े काँइयाँ होते हैं ये!"

बच्चू बोला -"फिर तो ठीक है।  हाँ एक बात हमारी भी सुन लो वोट-सोट की बात तो अब हम से करियो ना। ये बता देना कि ठप्पा किस पर मारना है बस्स्ऽऽऽऽ...।"

नारद और भगवान जी अपनी अपनी खोपड़ियाँ खुजलाने लगे। उनके पल्ले कुछ भी नहीं पड़ा कि मतदाता वोट किसे देगा और चाहता क्या है?.. केवल पैसों के सिवा! दोनों बैरंग लौट पड़े अपन शिवर की ओर।

दूसरे दिन लोगों से पूछते पूछते चुनाव कार्यालय की ओर गए। वहाँ पहुँच कर देखा अंदर बाहर गलियारों में सफेद कुर्ते पैजामें पहने व कंधों पर कीमती शालों को लटकाए हज़ारों लोग इधर से उधर, उधर से इधर भागम-भागी दौड़म-दौड़ कर रहे हैं। उन्हें देखकर कौन कह सकता है कि भारत गरीब है। भारत में गरीबी है। सुबह के गए शाम को उनका नंबर आया।

अपने ’नामीनेशन’ के पेपरों को बाबू मान्यवर जी के आगे रख कर वे बाबू के उत्तर की प्रतीक्षा करते रहे। मान्यवर ने उनको देखे बिना हाथ आगे बढ़ा कर कहा -"राशन कार्ड...।" इतना कहना था कि भगवान व नारद एक दूसरे का चेहरा देखने लगे कि ये क्या कह रहा है।

नारद बोले -"मान्यवर जी! वो क्या होता है?"

खोपड़ी को उठाकर उसने उन्हें घूरते हुए कहा -"इस देश में रहते हो या बाहर से आये हो? राशन कार्ड नहीं समझते...! अररे इसके बिना ते इस देश में गति है ही नहीं। जीयो तो राशन कार्ड, मरो तो राशन कार्ड, स्कूल-कालेज नौकरी शादी-विवाह के अवसरों में सबसे पहले इसको पूछते हैं। ...नहीं समझे...?"

दोनों ने सिर हिलाया।

"देखो... जैसे बाहर के मुल्कों में ग्रीन कार्ड, सिटिज़न कार्ड या लैंडड कार्ड होते हैं, वैसे ही भारत में राशन कार्ड होता है..राशन कार्ड। राशनों की लाइनों में लगे हो कभी कि नहीं? अररे कुछ खाते-वाते हो कि नहीं?"

"जी ये खाते नहीं।" नारद जी ने कहा।

अचरज से मान्यवर ने उनकी ओर देखा और कहा -"क्या कहा? ..ये खाते नहीं। यहाँ जो खाता नहीं वो तो नेता बन ही नहीं सकता, मैं गारंटी से कहता हूँ। आप चुनाव लड़ने आये हो ना?"

"हाँ।" दोनों ने मुन्डी हिलाई।

"नाम क्या है?"

"जी भगवान"

"भगवान - क्या भगवान, श्रीवास्तव भगवान टोपीवाला भगवान दारूवाला भगवान... " बीच में नारद जी बोल पड़े -"विष्णु।"

पलभर घूरते हुए बोला मान्यवर -"भगवान विष्णु..! फिर कहोगे वैकुंठ से आये हो।"

"जी हाँ।" - नारद बोले।

"देखो मेरा भेजा मत खाओ। वैसे भी लोगों से बात करते करते खोपड़ी खाली हो गई है। पार्टी का नाम?"

"जी....."

"पार्टी भाई पार्टी। अररे बैनर बैनर ... जिसके नीचे तुम चुनाव लड़ोगे।"

"मानव...।" - भगवान बोले।

"मानव क्या? .. मानव वादी?"

"हाँ...हाँ मानव वादी! बिल्कुल सही कहा आपने मान्यवर जी।" -नारद बोले।

"याने मानववादी पार्टी राइट? हमने समजवादी, साम्यवादी, राष्ट्रवादी पार्टियाँ तो सुनी.. लेकिन ये मानव वादी क्या बला है श्रीमान? खैर..छोड़िये ये बतायें कि कहाँ से लड़ोगे?..मेरा मतलब चुनाव से है। है कोइ कांस्टीचुएन्सी दिमाग में?"

"देवभूमि..।" नारद ने झट से जवाब दिया।

"देवभूमि यानि भारतखण्ड?"

"जी हाँ..जी हाँ, वहीं से।"

"मान गए उस्ताद। क्या जगह छाँटी है। अभी अभी तो बना है वो राज्य। खोपड़ी की दाद देनी पड़ेगी आपकी। आप अवश्य जीत जाओगे भय्याऽऽऽ..। अब जरा चुनाव चिन्ह के बारे में भी बता दो, बड़ी कृपया होगी आपकी।" -मान्यवर ने कहा।

"डालर!"

"जी...?"-मान्यवर चौंके किये कहीं विदेशी एजेंट तो नहीं? फिर पूछा चुनाव चिन्ह के बारे में।

"डालर...!"- नारद ने जरा जोर देकर कहा।

"एक बात बताओगे श्रीमान जी। आपको रुपये में क्या कमी दिखी जो आपने डालर को चुना।"

वो क्या है कि इन्टरनेशनल मार्केट में इसकी वैल्यु ना के बराबर है.. इसीलिए ..हमने डालर को चुना। जरा नज़र दौड़ायें तो आज दुनिया इसी के पीछो दौड़ी जा रही है। अगर जीत गए ता यहाँ भी डालर ही डालर होंगे।" -भगवान जी की ओर मुड़कर नारद ने कहा -"क्यों प्रभो...?"

"वेट ए सेकंड।" -मान्यवर ने नारद से कहा -"अभी अभी थोड़ी देर पहले आपने इनका नाम भगवान विष्णु बताया था कि नहीं?"

"सत्य, बिल्कुल सत्य। इनका नाम भगवान भी है। विष्णु भी है। और लोग इन्हें प्रभो के नाम से भी जानते हैं।"

"वाह क्या खूब! अररे भई ऐसा तो नहीं कि थोड़ी देर में आप इन्हें दीनबन्धु, मुरारी के नाम से पुकारने लगो।"

"अवश्य मान्यवर जी, जगत इन्हें इस नाम से भी पुकारता है।"

"कभी भगवान, कभी विष्णु, कभी दीनानाथ, कभी मुरारी...ये तो पैदायशी नेता लग रहा है। वाह बेटे...! तुम अवश्य चुनाव जीतोगे, मैं दावे के साथ कह सकता हूँ।" - मान्यवर ने ज्यादा उलझन श्रेयस्कर न समझते हुए कहा -"इस फार्म पे दस्तखत कर दो।" फार्म को आगे बढ़ाते हुए मान्यवर ने कहा -"अब किस नाम से पुकारूँ आपको श्रीमान?"

"त्रिपुरारी कहिए त्रिपुरारी..।" -नारद ने कागजों को पकड़ते हुए कहा।

"अच्छा, अच्छा बहुत हो गया। जमानत के पैसे भरो और दफ़ा हो जाओ। वो क्या कहाते...।"

नारद ने उत्तर दिया -"नटवर कहिए नटवर। श्रीमान मान्यवर जी।"

"हे भगवान.. मैं तो पागल हो जाऊँगा इसके साथ।" कहकर वह उठ कर दूसरे कमरे कि ओर चल दिया।

नामीनेशन के पेपरों को भगवान जी को थमाते नारद जी बोले -"प्रभो.. पहला चरण पूरा हुआ। अब चुनाव के युद्ध का शंखनाद कर उतरा जाए चुनाव की रणभूमि में।"

चुनाव कार्यालय के बीचोंबीच में खड़े होकर नारद को गले लगाते हुए प्रभु बोले -"सखे! इसके अलावा अब कोई चारा भी तो नहीं रह गया। लड़ना लड़ाना तो जैसे मेरी जन्म कुंडली में विधाता ने शुरू से लिख दिया हो।"

 

कार्यालय से बाहर निकलते हुए नारद भगवान को समझाने लगे -"हे सृष्टि के पालनहार! ..इस चुनाव में साम दण्ड भेद सबका इस्तेमाल होगा। चरित्रों का हनन भी होगा। हमारी बात ध्यान से सुनें..इस चुनाव में तीनों चीज़ों पर विशेषरूप से ध्यान देकर फूँक-फूँक कर कदम रख कर देख देख कर चलें..प्रैस व प्रैसवाले इन्टरनेट और वीडियो..वो भी कैमकोडर को। जबसे इसकी इज़ाद हुई न जाने इसने कितने ही जाने माने दिग्गज नेताओं की ऐसी की तैसी कर दी। तहलका ने तहलका मचा के रख दिया है प्रभो! इस मृत्युलोक में ज़र,जोरू और ज़मीन से भी बचकर चलें। ये तीनों ही चुनाव में सकैण्डलों के मुद्दे बनते हैं और विपक्षी इन्हीं को शिखण्डी के रूप में ढाल बना कर अपने सामने चुनाव लड़ने वाले पर इसका निशाना साधते हैं।"

"आपके कहने का भावार्थ हम समझ गए नारद। हमारा लक्ष्य बैलट-बाक्स, वोट व मतदाता होगा बस्स!" - भगवान ने नारद को यकीन दिलाते हुए उनके कन्धों पर हाथ रख कर घर चलने का आग्रह किया। दोनों घर की और चल दिये।

 

भगवान इन दिनों, नारद जी द्वारा मार्किट से लाई गई फिल्मी एक्टरों की टेपों को देख देख कर अभ्यास करने में लगे हुए थे।  नारद जी उनकी इस प्रकार की लगन व अभ्यास को देखकर अति प्रसन्न  हुए और बोले -"भगवन! आप परीक्षा में उत्तीर्ण हो गये लगते हैं। अब आँखें बंद कर कूद जायें चुनावी मैदान में आपकी विजय निश्चित है।"

ये सुनकर भगवानजी का मनोबल बढ़ा। उन्होंने नारद से कहा -"क्यों ना कूदने से पहले एक दो  प्रैस कान्फ्रैन्स रखी जायें ताकि जाने से पूर्व मतदाताओं पे असर हो और ज़्यादा से ज़्यादा लोग  हम, हमारे विचारों से अवगत हो जायें कि हम कौन है और क्यों चुनाव लड़ रहे हैं।"

"अवश्य भगवन।"- नारद जी ने कहा।   

"तो क्यों ना आज के दोपहर के खाने पर ..!"

 "ना..ना!"- नारद ने भगवान जी को टोकते हुए कहा -" दोपहर का नहीं, रात्री के भोजन पर प्रभो..  रात्री के। आप इनकी फ़ितरत को नहीं जानते क्योंकि पत्रकार जीव खाने का नहीं, पीने का ज़्यादा शौकीन होता है और ये, उसे अपना स्टेटिस सिंम्बल भी मानते है। इसके सेवन के पश्चात उसकी बुद्धी,चक्षु व उँगलियाँ खुलकर अपना प्रभाव दिखाती हैं। फिर देखिये कल के अखबारों में, ऊँचे ऊँचे हेडिंगों में  आपका नाम, आपके विचारों का ख़ुलासा, आपकी तारीफ़ों के पुल जिसे पार कर मतदाता आप तक पहुँचेगा।"

नारद जी लगे टेलीफोन पे टेलीफोन करने, प्रैस रिलीजों को फैक्स पे  फैक्स करके रात्री के भोजन का सब को निमन्त्रण पे निमन्त्रण लगे देने।  50-60 पत्रकारों से स्वीकृति पाने के पश्चात नारदजी जुट गये रात्री की भोजन व्यवस्था में।

निर्धारित स्थान व समय पर एक एक करके पत्रकार महोदय साथ में कैमरे, लाइट तथा अन्य ताम झाम को लेकर पहुँचने लगे ।   नारद जी आने वाले हर पत्रकार का बडे़ विनम्र भाव से स्वागत-सत्कार करते रहे।

आज के नेताजी, याने भगवान जी  को आने में अभी थोड़ी देर लग रही थी। इस बीच में नारद जी ने समय का सद्‌उपयोग करना श्रेयस्कर समझा । उन्होनें पत्रकार महोदयों से कहा.. "देखिये,  नेताजी के आने मे अभी देरी लग रही, क्यों न.. हम तब तक मधुशाला  याने मेरा कहने का मतलब हाट ड्रिंक का सेवन करें।"  इतना कहना था कि  गिद्ध की तरह टूट पडे़ पास में पड़ी बोतलों पर वे सब। आधे घन्टे के अन्तराल में ही ठीक ठाक हो गयी थी पत्रकार मण्डली। इस दौरान भगवान जी भी पधार गये थे ।

सब का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हुए नारद जी कहने लगे- "हे, प्रत्याशियों के भाग्यविधाताओ!  हे, चुनाव व चुनाव में लड़ने वालों पर अंकुश लगाने वाले महारथियो। आज के इस प्रैस कान्फ्रेंस में आप सब का हाiर्दक स्वागत है। हमारे नेताजी" -नारद कुछ कहना चाह रहे थे कि तभी किसी पत्रकार ने सवाल किया--

"आपका परिचय?"

"हम नारद हैं.. ।"

"लगते तो नहीं।" पत्रकार ने छूटते कहा..। यह सुनकर हाल में हँसी का फुहारा छूट पड़ा । नारद जी बात को चालू रखते हुए कहने लगे -

"आपने हमारी प्रैस रिलीज़ तो पढ़ ही ली होगी  कि क्यों हमने नई पार्टी बनाई? यों हम चुनाव लड़ रहे है? क्यों इसकी जरूरत हुई ?"

"मेरा नाम सूघे लाल है, मै उधेड़बुन अखबार से हूँ। कृपया आप अपने नेता जी का परिचय देने का कष्ट करेंगे।"

नारद बोले- "क्यों नहीं.. क्यों नहीं।"  भगवान जी की ओर इशारा करते हुए बोले- "ये भगवान विष्णु जी है .."

तभी सूघे लाल कह उठा- "वैकुंठ वाले, या बोरीवली झोपड़ पट्टी में रहने वाले।"  इतना कहना था कि फिर हँसी फूट पड़ी हाल में।

"फिलहाल हमें भारत के किसी भाग का मानकर चलें तो यही उत्तम रहेगा।"  उन्होने उसका उतर एक सुलझे एवं पारखी के रूप में दिया । तभी किसी ने प्रश्न किया- "आप चुनाव क्यों लड़ रहे हो? कुछ रोशनी डालेंगे इस पर ?"

"हमारे भगवान बडे़ दयालु हैं। वे अपने भक्तों याने मतदाताओं के दुखों को नहीं देख पा रहे हैं। यूँ तो यहाँ उनका शोषण सदियों से होता आया है लेकिन जब से उन्होंने आज़ादी पाई तब से उसकी हालत दिनों-दिन और भी बिगड़ती जा रही है। जिन नेताओं ने उसकी खुशहाली के लिए काम करना था, वे ही उसे लूट खसोट रहे है। गरीबों को गरीबी की रेखा से उपर लाकर उठाने के संकल्प लेकर उतरे हैं हम इस चुनाव में।"

"तो गरीबी आपका चुनावी मुद्दा है।"

"जी ..हाँ।"  नारद बोले ..।

 तभी आवाज आई- "नारदजी आप ही बोलेंगे या नेताजी को भी कुछ कहने का मौका दोगे। "

 "क्यों नही क्यों नहीं!"

जैसे ही भगवान जी बोले फ्‍लैश लाइटों ने आँखे चौंधिया दीं। कैमरे वाले लगे एक दूसरे के कन्धों पे चढ़ने । प्रशकार्ताओं ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी। भगवान भी सोच सोच कर, नारद की ओर देख देख कर नपे तुले शब्दों मे अपना उत्तर देते रहे ।

"आपका परिचय?"

"आम आदमी में से मैं भी एक हूँ। क्या इतना प्रयाप्त नही ?"

"आप किस पार्टी से है..जनता, भारतीय जनता, जनवदी  जनतंत्र...?"

"जी.. मैं मानववादी हूँ .. ’गरीब दल’ हमारी पार्टी है।  जिसमे अमीरों के लिए कोइ जगह नहीं है।"

"चलो माना आप गरीबों के हिमायती हैं। चुनाव चिन्ह के बारे में कुछ बतायेंगे आप?"- धाँसू पत्रकार सेंधमार जी ने प्रश्न किया।

भगवान जी कुछ कहते उस से पहले नारद जी बीच मे कूद पडे - "देखिए..चुनाव चिन्ह कुछ भी हो सकता था, जैसे हाथ, पाँव,  उँगली, पैर, लठ्ठ, लोटा, बंदूक, तमंचा वग्ौरहा वग्ौरहा... लेकिन,  ये सब तो,  किसी न किसी ने हथिया लिए थे। इसीलिए हमने सोच समझ कर इन सबसे हट कर एक अलग से चुना है अपना चुनाच चिन्ह।"

"वो क्या है?"

"डा - ल - र।"-  इतना कहना था कि सब पत्रकार एक दूसरे का चेहरा देखने लगे।

सेंधमार ने फिर प्रश्न किया - "डालर को देख कर ऐसा नहीं लगता कि आपको विदेशी ताकतों ने खड़ा किया है?"

"बस्स्स्स्स..!  यही तो कमी है हमारे यहां के बुद्धिजीवियों में कि वे ज्यादा सोचे-समझे बिना झट से निष्कर्ष पर पहुँच कर अपना फैसला भी दे देते हैं।  हमें किसने नहीं, हमें तो हमारी माताश्री ने उतारा है इस चुनाव में।" 

सेंधमार कहाँ छोड़ने वाले थे ...फिर सवाल किया..  "माना आपको आपकी माता जी ने उतारा, मान गये, लेकिन डालर ’फ़ौरन करंसी’ क्यों चुना आपने अपना चुनाव चिन्ह? भारतीय रूपये को क्यों नहीं?"

"बड़ा अच्छा प्रश्न किया है आपने। रूपये की कीमत इन्टरनेशनल मार्केट में ना के बारबर है। अपने ही देश में उसकी साख दिन प्रति दिन गिरती जा रही है, ये तो आप भी जानते है । यहाँ पर तो आपको मेरे साथ सहमत होना पड़ेगा। देखिये करंसी तो कंरसी है। चाहे वो रुपया हो या डालर। लक्ष्मी तो लक्ष्मी ही हुई  ना? डालर को, अमीर गरीब सब पहिचानते है। उसकी की भाषा सब जानते हैं। इसके पीछे जब सब दौड़ रहे हैं, तो हमने सोचा इसे देख कर यहाँ का मतदाता भी दौड़ पड़ेगा हमारे पीछे।"

"आपके भगवान जी ने कभी पहले चुनाव लड़ा?" - किसीने प्रश्न किया।

"नहीं।"

 "तो अब क्यों लड़ रहे हैं।"

भगवान बोले-- "हमें तो मतदाताओं की गरीबी ने मजबूर किया है चुनाव लड़ने को।"

"कहाँ से लड़ने का इरादा है?"

"वो तो तय है ही ..देवभूमी से लड़ेंगे।"

"देवभूमी? माने -- भारतख्ण्ड से? जो अभी अभी बना है राज्य?"

"जी हाँ।"

तबतक बीच में सुरतेलाल ने सवाल किया - "आप शादीशुदा है या कँवारे?"

भगवान नारद का चेहरा देखने लगे ... नारद बचाव मुद्रा में बोल उठे--

"मानते हैं आपकी पैनी दृष्टि को .." पत्रकार की ओर मुखातिब हो कर बोले-  "कया नाम बताया आपने..?"

 "सुरतेलाल।’"

"हाँ सुरतेलाल जी..हमारे कुछ पत्रकार भाईयों की ये कोशिश रहती है कि कैसे किसी के घर के अंदर घुसा जाये।  कैसे उँगली पकड़ कर पहुँचा पकड़ा जाय।  माना, ये शादीशुदा है, तो उससे क्या होगा? क्या हमारी महिला मतदाताओं की सारी की सारी वोटें इन्हें पड़ जायेंगी? और माना नहीं हैं शादीशुदा तो? तो क्या सारे कँवारों की वोट इन्हें ही मिलेगी? माना हम कहते हैं कि इनकी सौलह सौ  पटरानियाँ हैं तो कोई करेगा विश्वास? आप करेंगे? आप, आप और आप?" उँगली उठा उठा कर सबसे प्रश्न करते रहे नारद। उनकी इस आक्रमण मुद्रा को देख के हाल में सन्नाटा सा छा गया था। " ..नहीं ना? मुuझे पता था  कोई विश्वास नहीं करेगा।"  भगवान जी की ओर देखकर उन्हें उठने का संकेत देते हुए नारद जी बोले-"नो मोर कोएश्चन? चलिए प्रभौ ..उठिये..उठिये..।"

भगवान जी बोल- "लेकिन वे हम से कुछ प्रश्न पूछना चाह रहे हैं सखे ..।"

"अरर..रे  इस समय यहाँ से जाने में भलाई है भगवन।"-  नारद ने फिर कहा -"ये, आपको लपेटने के चक्कर में हैं। आप समझता क्यों नहीं?" दोनों वहाँ से उठ कर चल दिये।

सुबह चाय की प्याली को लेकर भगवान जी के कक्ष में दाखिल होकर अखबार को बढ़ाते हुए नारद ने कहा- "वैसे बुरा नहीं छापा आपके बारे में पत्रकारों ने लेकिन कल तो बाल बाल बच गये वरना सारी पोल खुल जाती और चुनाव लड़ने से पहले  ही हार गये होते।" "वो कैसे?"  भगवान ने पूछा।

"वो तो घर के चौखट तक पहुँच चुके थे। केवल दहलीज़ लाँघनी बाकी रह गई थी। फिर घुसते भीतर, फिर बेडरूम में ..सारा भंडा फूट जाता। जो पढ़ रहे हो उसकी जगह छपा होता- बैकुंठ से भगवान पृथ्वी पर चुनाव लड़ने आये हैं। जाने क्या कर दिया होगा उसने वहाँ। फिर छपी होतीं एक से बढ़ एक बातें और कच्चा चिट्ठा।" 

"ये बात थी।" नारद के हाथों को चूमते हुए भगवान बोले- "थैंक्यू..थैंक्यू ब्रर्दर।"

जब से भगवान व उनकी पार्टी ’गरीब दल” ने भारतखन्ड को अपना चुनाव-स्थली चुन तब से आये दिन अखबारों में उनके बारे में छपने लगा था। जिन्हें पढ़ पढ़ कर वहाँ की नेशनल एवं रिजिनल पार्टियों में एक भूचाल सा आ गया  था। उनकी नीदें उड़ गईं। उनके कान खडे़ हो गये कि ये शख़्‍स और ये पार्टी आखिर है कौन? कहाँ से आये हैं? जिन्हें कोई नहीं जानता था उन्हें लोग रातों रात जानने लगे थे।

भारतखन्ड में ’भगवान और गरीबदल’ एक जाना माना नाम हो गया था जिसे सुन सुन कर वहाँ के दिग्गज नेता काशीराम सिलमोड़िया व फतेसिहं पहाड़ी की नींद हराम हो गई थी।

दोनों कई सालों से इस क्षेत्र की राजनीति में ध्रुव तारे के समान चमक रहे थे। मजाल है इनके रहते रहते कोई यहाँ सेंध मार दे। यद्यपि दोनों एक दूसरे के कट्टर दुशमन, कट्टर विरोधी,  दोनों एक दूसरे को यूँ तो फूटी आँख नही सुहाते थे लेकिन जब से ये भगवान वाला चक्कर शुरू हुआ तो दोनों एक दूसरे के करीब आने के लिए रास्ते तलाशने में लगे हुए थे। जब कुर्सी व बिल को खतरा दिखाई दे तो नेता-नेता से, साँप नेवले से, आपस में हाथ मिलाने से नहीं चूकते। बस यही हाल था इन दोनों का भी ।  

काशीराम के घर के आगे मोटरों का काफिला रुका। काशीराम ने दौड़ कर फतेसिंह की कार के पास जाकर, उसका दरवाजा खोला और हाथ जोड़ कर उससे स्वागत की मुद्रा में बोले-

"नमस्कार।  हमारे गरीबखाने में आपका स्वागत है, भाभी कैसी हैं, बच्चे कैसे हैं।

फ़तेसिहं ने चलते चलते उत्तर दिया- "वे सब तो ठीक है लेकिन हम ठीक नहीं हैं।"

ये सुन के  काशीराम भी बोले- "सच मानिए तो वही हाल हमारा भी है जब से पिछले दो चार दिनों के अखबार पढ़े।" सोफे पे बैठते हुए उसने कहा। 

"देखिए पहाड़ी जी,  हमारे और आपके बीच जो भी घट रहा हो वो घर की बात है। उसे हम संभाल लेंगे। लेकिन, कोई अजनबी.. वो हमारे घर मे सेंध लगाये, इसे हम बिलकुल बरदाश्त नहीं करेंगे। आप क्या कहते हैं इसके बारे में?" - सिलमोड़िया ने फतेसिंह की ओर मुड़ कर कहा ।

"जहाँ तक सेंध का प्रश्न है वो तो लग चुकी है काशीराम जी।"  फतेसिंह ने कहा।

"तो कुछ कीजिए ना।"-  काशीराम बोले। 

"उसी के लिए तो आये है यहाँ। कुछ सोचना होगा इसके तोड़ का।"

तभी काशीराम को याद आया, फतेसिंह से बोले-

"अरे आपके विधायक है ना? वो क्या नाम है उनका ..जगतपती...।"

"हाँ..हाँ।" सर हिलाकर फतेसिह ने उत्तर दिया।

"उनके बडे़ भाई साहब के दामाद है ना  ’खबर ले, खबर दे ’ के अखबार में।"

"एच.पी की बात तो नहीं कर रहे है आप?"

 "हाँ, हाँ  ऊन्हीं की  उन्हीं की, उनसे कह के उन्हें फोन लगवा कर उनसे पता करवायें इस पूरे नाटक का।"

फतेसिंह ने फोन मिलाया जगतपती को-- "हलो.. जगतपती, हम फतेसिंह बोल रहे है..।"

"नमस्कार, नेता जी। कहिए कैसे है आप।"

"हम वैसे तो ठीक है लेकिन एक समस्या .. "

बीच मे बात काटकर के जगतपती ने कहा-

"हम समझ गये हैं सारी समस्याएँ। भगवान वाले की बात कर रहे हैं ना आप?कहिए हम क्या कर सकते हैं आपके लिए?"

"आपके बडे़ भाई के दामाद है ना, ’खबर ले-खबर दे” अखबार मे चीफ़ रिपोर्टर उनसे बात करवाओ तो ... ।"

"अभी करवाता हूँ। आप लाइन पर ही रहियेगा।"

थोड़ी देर में जगतपती और एच. पी. बतियाने लगे-

"हलो..कौन  - ?"

"मै, जगतपती।"

"ओ, चाचा जी प्रणाम। कहिए कैसे याद किया..। "

"बेटाजी,  हमारे नेताजी .." बात पूरी होने से पाले फतेसिह बीच में कूद पडे़।

"अररे एच.पी. साहब, कैसे है आप?"

"सब आप की कृपा है नेता जी।"

"कृपा तो आप जैसे की होनी चाहिए। हम जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं पे। आप का फोन कही टेप टाप तो नहीं होता है ना।"

 "नहीं नहीं, आप खुलके कहिए जो भी कहना हो।"

"आपको तो पता ही है चुनाव सर पर है। वैसे भी कई लफ़ड़े हैं ऊपर से ये भगवान वाला क्या लफड़ा है थोड़ा पता करेंगे।"

"वैसे  तो, असल में, हमें भी कुछ पता नहीं। आप कहते हैं तो,  एक- दो,  दिन में पता करके  आपको बताता हूँ।"

"ज़रा जल्दी हो जाए तो बड़ी कृपा होगी।" -  फतेसिंह ने बडी दयनीय भाव मे कहा ...।

 "नेता जी शर्मिन्दा न कीजिये। आपने एक काम दिया है अवश्य करेंगे। यकीन कीजिए। " - कह कर फ़ोन रख दिया एच.पी.ने।

फतेसिंह ने मुड़कर काशी राम से कहा- "देखिए,  हम दोनों की हालत पतली है ये तो आप भी जानते है। ऐसे में राजनीति करने की भूल मत कीजियेगा जैसे आप ने पिछले चुनाव में की थी। कहा था की ऊपर की चार सीटों पर अपने केंडिडेट खड़ा न करें, लेकिन नहीं माने। नतीजा क्या निकला था। आप भी हारे, हम भी। "    

"जहाँ त ाजनीति सवाल है तो आप ने भी कहाँ कसर छोड़ी।",  पलट कर वार किया काशीराम ने -"आप से कितनी मिन्नतें की थीं तब हमने कि  हमारी सरकार को अभी मत गिराइये। मत खींचिये हाथ को। सर्मथन वापस ले लिया। ये राजनीति नहीं थी तो और क्या थी? राजनीति आप करते है हम नहीं। खैर छोड़िये, फिलहाल पहले जो समस्या है उसके बारे में सोचते हैं।" 

"परसों तक रुकते हैं।  देखें, एच.पी क्या खबर लेकर आता है।"  फतेसिंह बोला। उठकर जाने लगा तो काशीराम ने फिर कहा।

"अगर हम सरकार बनाने की क्षमता में आये और कही दो चार सीटों की जरूरत पड़ी तो--"

" देखेंगे, देखेंगे।"  कह कर जाते जते फतेसिंह ने कहा और चल दिये ।

इधर भगवान जी का तूफ़ानी चुनावी दौरा शहर-शहर, गाँव- गाँव होता हुआ हज़ारों लाखों की भीड़ को जोड़ता हुआ बढ़ता ही जा रहा था। सुनने वाले "कल.., ज़रा रुकिए। मैं स्कैज्युल देख लूँ। कल तो ...ओ--, मुश्किल हो जायेगी.... वो क्या है कि, कल बहुत बिजी है।"

तभी भगवान जी बीच में बोल पड़े..."हम तो एकदम खाली हैं।"

टेलिफोन के चोंगे पर हाथ रखकर- "सिस्स्स्स स्स्स्स्स्स्" - नारद भगवान जी से बोले- "इनको थोड़ा इन्तज़ार करवाना ज़रूरी है, तभी आदमी की कीमत बढ़ती है- आप नहीं समझोगे..राजनीति के खेल हैं।"

एच.पी.- "और परसों?"

"हाँ परसों सुबह 7.30 बजे कार्यकर्ताओं के साथ मीटिंग है। दोपहर में एक डेलिगेशन आ रहा है। शाम को पातलखंड के कार्यवाहक एडमिन्सिट्रेटर के साथ, उसके बाद गरीब दल के उच्च अधिकारियों के साथ मंत्रणा...खैर जब आपने आदेश दे ही दिया है तो कुछ न कुछ तो करना ही होगा आपके लिए। अब देखिये ना.. आप जैसे मित्रों को निराश भी तो नहीं किया जा सकता। शाम के 5.30 बजे कैसा रहेगा।"

"ठीक है। बहुत बहुत शुक्रिया नारद जी।"

"इसमें शुक्रिये की क्या बात है एच.पी. साहब। ये तो एक हाथ से देने और एक हाथ से लेने वाली बात है। आप हमारी पीठ खुजलायें और हम आपकी... कैसा कहा...।"

"जी बिल्कुल सही... अच्छा तो शाम को मिलते हैं।" - कहकर फोन रख दिया दोनों ने।

फोन को रखते  नारद भगवान जी से बोले- "हाँ, जब वो आयेगा तो आप अपने नये कलफ़ लगे कुर्ते के पल्लू को साइड से फाड़ दें।"

भगवान आश्चर्य से नारद की ओर देखकर पूछने लगे- "ऐसा क्यों?"

"बताता हूँ, बताता हूँ!"- नारद बोले- "सवाल कम करा करें प्रभो। जब वो आएगा तो, आते ही वो आपसे पूछेगा..’अरे! नेता जी, क्या बात है? आपका कुर्ता फटा  पड़ा है।’ आप बिना देखे कहेंगे- ’कहाँ...। अररे, हमें तो पता ही नहीं..। फ़ुर्सत कहाँ इन सब बातों के लिए।’ कह कर आप, उनका हाथ पकड़ कर सोफे की ओर ले जाएँगे..। क्या समझे?"

"इससे क्या होगा नारद जी?" - भगवान जी ने पूछा।

"इम्प्रेशन...प्रभो! इम्प्रेशन! ये टोटके हैं राजनीति के!"

अगले दिन जब फतेसिंह ने अखबार उठाकर देखा तो उसकी आँखें खुली की खुली रह गईं। भगवान के साथ एच.पी. का लम्बा चौड़ा इन्टरव्यू? बड़बड़ाने लगे पहाड़ी जी- "हम से तो कहता था रहस्य पता करेंगे, और यहाँ देखो... उसके तारीफ़ों के क्या पुल पे पुल बाँधे हैं।" गुस्से में जगपती को फोन लगाया।

"हल्लो... जगपती। आज का अखबार देखा?"

"जी...।"

"क्या तलवे चाटे हैं एच.पी. ने हमारे विरोधी के।"

"अरे नेताजी, गुस्से पर काबू रखें। अगर उसने तारीफ़ों के पुल बाँधे हैं तो कहीं न कहीं एक आध ईंट की जगह अवश्य छोड़ी होगी अंदर घुसने के लिए। आपने उसे काम दिया है ना करने को, तो वो ज़रूर करेगा। तारीफ़ करके तभी तो अंदर घुसेगा ना? आप ही ने तो सिखाया है कि पहले विश्वास तो और समय आने पर विश्वासघात करने से मत चूको।"

"ठीक है..ठीक है।" - नेताजी ने जैसे ही फोन रखा था कि दरवाजे पर काशीराम दिखाई दिये।

"नमस्कार सिलमोड़िया जी। कहिए कैसे आना हुआ?"

"सिंह साहब.. लगता है कि हमारे राजनीति के दिन लदने वाले हैं।" - सोफे पर बैठते हुए काशीराम ने कहा। -"उनकी मीटिंगों में वो ताबड़-तोड़ भीड़, हमारे यहाँ खाली खाली तम्बू। जिन्हें देख देख कर हमारे कार्यकर्ताओं के मनोबल टूटने लगे हैं। कुछ कीजिये नहीं तो नाक ...."

"अररे...नहीं..नहीं, ऐसा नहीं होगा काशीराम जी।" अन्दर के कमरे में जाकर दोनों मन्त्रणा करने लगे। दरवाजे पर जैसे ही दोनों आये फतेसिंह ने काशीराम के कान में जाने क्या कहा कि जिसे सुनकर काशीराम ने सर हिला के अपना समर्थन दिया।

"हाँ...जैसा हमने आप से कहा बस वैसे ही करें। पहले अपने एक दो चमचों से भाषण करवायें, जैसे ही आपका भाषण शुरू हो बस तभी अपने किसी गुरगे से कहें कि लाइट काट दे। उसके बाद तब आप दिल भर के कोसें अपने विरोधी भगवान और उसके गरीब दल को। क्या समझे?"

इधर जैसे ही भगवान जी का चुनावी रथ भारतखण्ड की राजधानी पहुँचा, लोगों की भीड़ देखते ही बनती थी। सड़कों, रास्तों, पहाड़ों  यहाँ तक की घरों की छतों पर आदमियों की भीड़ इकट्ठी होकर उनको सुनने के लिए बेचैन थी। जैसे ही भगवान ने बोलना शुरू किया कि भीड़ से "गरीब दल ज़िन्दाबाद" के नारों से समुचा पहाड़ गूँज उठा। अपने भाषणों में बीच बीच जब जब वो गरीब व गरीबों की बात करते तब तब जयकारों, नारों व तालियों से पूरा वातावरण गूँज उठता।

दूसरे दिन काशीराम ने आपा-धापी में एक मीटिंग रखवाई। किराये की भीड़ जुटाई गई। कुछ लोग वैसे भी आ गये सुनने को। जैसे ही काशीराम बोले कि एकाएक बिजली चली गई। बस फिर तो बरस पड़े काशीराम गरीब दल पे..."भाइयो य सारी की सारी शाजिस गरीब दल की है। ये शरारत हमारे विरोधियों की है। हमने अपने पूरे राजनैतिक जीवम में कभी भी ऐसी iघनौनी और ओछी हरकत नहीं देखी। क्यों भाइयो?"

भीड़ चिल्लाई- "बिल्कुल सही ...ये तो सरासर ज्यादती है। उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था।" भीड़ गुस्से में घर चली गई। दूर-दराज़ों से पैदल, मोटर-गाड़ी, रेलों में भर-भर कर आने लगे। उनकी अदाओं, उनके भाषणों का असर मतदाताओं पर सर चढ़कर बोलने लगा था।

ये देखकर प्रांतीय सरकार को उनकी कड़ी सुरक्षा का विशेष प्रबंध करना पड़ा। वह जहाँ भी जाते, जनता पागलों की तरह टूट पड़ती। अखबारों, मैगज़ीनों, टेलिविज़नों, प्रैस-रिपोर्टरों की भीड़ देखते ही बनती थी। उनकी कब्रेज़ मुख्य पृष्ठों पर छापे जाने लगी। टेलिविज़नों में होड़ सी लगने लगी थी। रेटिंग आसमान छूने लगी थी। ऐसे में, वे विज्ञपन वालों से चाँदी कूटने लगे थे।

ये सब देखकर नारद जी, अति प्रसन्नचित्त दिखाई दे रहे थे।  भगवान जी से बोले- "प्रभो..., अखबार, टी.वी. की रिपोर्टों से लगता है कि हम चुनाव जीत गये हैं। आपका जवाब नहीं। क्या भाषण देते हैं आप! जो जहाँ रहता है, वहीं जम के रह जाता है। और बाई गॉड... मैं तो कहता हूँ अगर आप फिल्मों में जाएँ तो, अमित जी देखते रह जायेंगे। कुछ भी कहो प्रभो, जनता बड़ी खुश है। भगवन देखा उन कैसटों का कमाल, जिन्हें मैं मार्केट से लाया था। थेंक्यू अमित बच्चन जी, थेंक्यू राजकुमार जी, थेंक्यू दिलीप जी, थेंक्यू..थेंक्यू!!" - दोनों हाथ जोड़ कर नारद जी बोले।

"अभी तो शुरूआत है नारद जी, आगे-आगे देखिये होता है क्या!" - भगवान जी ने कहा -"वैसे--अगली मीटिंग कहाँ है?" उन्होंने प्रश्न किया।

"भारतखण्ड की राजधानी ’गेंरीसेंण’ में।"  तभी टेलीफोन की घंटी बजी।

"--हैलो, कौन?"

"जी--, मैं एच. पी.।"

"कहिए, क्या सेवा करें एच.पी. साहिब?"

"एक विशेष इन्टरव्यू करना चाहते हैं हम, अपने होने वाले भावी नेता पर।"

"क्या बात कह रहे हैं आप? वो, और भावी...?"

"जी हाँ भावी--, हमारी आँखों से देखिए ना। कब ठीक रहेगा?"

"अरररे..., आप जब चाहें चले आयें। आपके लिए तो दरवाजे हमेशा खुले हैं।"

"कल कैसा रहेगा।"

 

भगवान जी ने जैसे ही पेपर खोला, देखा तो हैरान रह गए पढ़कर। मोटे  मोटे अक्षरों मं छपा था, "गरीब दल की घिनौनी शाजिस", फिर लिखा था पूरा विवरण। दौड़ कर नारदजी के पास जाकर बोले- "नारद जी देखिये क्या छपा है हमारे लिए! जबकि हमने ऐसा कुछ किया ही नहीं।"

नारदजी ने पढ़ते हुए कहा- "हमको जनता में बदनाम करके, अपने लिए हमदर्दी पैदा कर, हमारे वोटों काट कर, अपनी ओर करने की शाजिस है। राजनैतिक हथकंडा है प्रभो...।"

"ये बात है.. तो जल्दी से प्रैस कान्फ्रैंस बुलाइए। हम स्पष्टीकरण करना चाहेंगे।"

"डैमेज तो जो होना था वो तो हो चुका है प्रभो। फिर भी आप कहते हैं तो बुला लेते हैं।"

दूसरे दिन प्रैस कान्फ्रैंस में भगवान ने स्पष्ट श्ब्दों में कहा- "ये सरासर उनकी अपने दिमाग की उपज है। इसमें गरीब दल का कोई हाथ नहीं है। हमें जनता में बदनाम करने की शाजिस है। हमने कोई बिजली-वजली नहीं काटी। ये मगरमच्छ के आँसू रो रहे हैं। हम अपने मतदाताओं से अपील करते हैं कि वे इनके बहकावे में न आयें। इनकी कही हुई बातों पर विश्वास न करें।"

खेल शुरू हो चुका था जो हर चुनावों में होता आया है, आरोपों और प्रत्यारोपों का । पेपरों के माध्यम से। आरोप पे आरोप व कीचड़ उछालने गे थे एक दूजे पे दोनों पार्टियाँ। अखबार वाले आये दिन एक दूसरे की कमजारियों  को खोद खोद कर छापने लगे थे। लकिन पार्टी वाले तो अपने विरोधी पार्टी की किसी ऐसी खबर की तलाश में थे कि जिसको वो जनता में लपेट लपेट कर भुना सकें। चाहे वो व्यक्तिगत हो या चरित्र  से हो।

नारदजी भगवान जी को कदम कदम पर फूँक फूँक कर चलने की राय देते रहे।

फतेसिंह और काशीराम की हालत देखकर लगता था कि अंदर से वे हार मान चुके हैं कि तभी एच.पी. का फोन बज उठा-

"हल्लो..नेता जी हैं।"

"कौन बोल रहे हैं?"- पहाड़ी जी ने कहा।

"मैं एच.पी.।"

"कहिए ... कहिए कोई खबर?"

"जबरदस्त खबर है आपके लिए। मैंने पता कर लिया है इस शख़्‍स के बारे में।" जैसे ही पता करने वाली बात सुनी...,फतेसिंह ने, उसके बुझते चहरे पर एक चमक आई और बोला- "हाँ, बताइए. बताइए।"

"वहीं आकर बताता हूँ।" कहकर एच.पी. ने फोन रख दिया।

फतेसिंह अपनी कोठी के बरामदे में एक कोने से दूसरे कोने में जैसे लखनऊ के अजायब घर में, पिंजड़े में बन्द "मैन ईटर" (पहाड़ी लदार, जिसने 20-25 बच्चों को मारा था) की तरह एच.पी. की इन्तज़ार में इधर से उधर घूम रहे थे कि अचानक गेट पर गाड़ी आती दिखाई दी तो उन्हें लगा कि एच.पी. आ गया। लेकिन वो एच.पी. नहीं बल्कि काशीराम की गाड़ी थी। पहिचानने के बाद लगे फिर घूमने। काशीराम ने पास जाकर फतेसिंह को ऐसे घूमने  व परेशानी का कारण पूछा-

"सिंह साहब सब खैरियत तो है?"

"आयें...आयें। एक अच्छी खबर है हम दोनों के लिए। अच्छा हुआ तुम खुद ही चले आये वरना फोन करके बताता।" वे अभी बैठक में गये ही थे कि घंटी बजी।

"ये लो, शायद एच.पी. ही है।" दोनों दौड़ कर बाहर दरवाजे पर आये। एच.पी. और वो अंदर बैठक में चले गये।

"हाँ, क्या खबर है एच.पी. साहब।"- दोनों एक साथ कह उठे।

"मुझे, भगवान जी के यहाँ एक फ़ैक्स की कापी मिली, जो लक्ष्मी जी ने इन्हें कुछ ही दिनों पहले भेजी थी।"

इतना कहना था कि वे दोनों एक दूसरे का मुँह देखने लगे कि क्या खबर है। इसमें कौन सी बड़ी बात है लक्ष्मी ने फ़ैक्स किया तो...?

"आप नहीं समझे..?"- एच.पी. बोला

"नहीं।" - दोनों ने कहा।

"ये भगवान कोई और नत्थू खैरा भगवान नहीं है। ये स्वयं भगवान श्री कृष्ण हैं श्री कृष्ण!"

"स्वर्ग वाले..?" - काशीराम ने पूछा।

"हाँ.. वही स्वर्ग वाले, लक्ष्मीपति, दीन बन्धु..।"

"नहीं, नहीं ...मैं कैसे मान लूँ?" फतेसिंह बोला

"आप माने या ना माने, ये कापी है। यकीन न हो तो स्वयं ये कापी लेकर जाना और पूछना उनसे। मैं चलता हूँ।" कहकर चल दिया एच.पी.।

फतेसिंह को अभी भी यकीन नहीं  हो रहा या कि अगर ये वास्तव में नारायण हैं तो इन्हें क्या जरूरत पड़ी कि वे पृथ्वी में आकर चुनाव लड़ें।

चुटकी लेते हुए काशीराम बोले-"अरे सिंह साहब, कहीं ऐसा तो नहीं कि इन्होंने भाई बिल कलिन्टन जैसा कोई लफ़ड़ा ..." काशीराम हँसते हँसते कहते जा रहे थे-"सोचा..., कहीं इम्पीचमेंट हो, उससे पहले भारत जाकर चुनाव जीत कर कम से काम पासपोर्ट तो हासिल करलूँ, न जाने कब काम आ जाए।" इतना कहना था कि फिर दोनों ठहाका मार मार कर हँसने लगे।

फतेसिंह ने कहा-"छोड़िए मजाक बहुत हो चुका। जल्दी से एक प्रेस-कान्फ्रेन्स बुलायें। उसमें खुलास.. लेकिन पहले क्यों न दोनों मिल के इस समय चुनाव लड़ें? कुछ भी हो वो इस समय हम पर भारी है। जनता उनके साथ है। अगर चुनाव जीत गये, फिर अलग अलग हो जायेंगें। इसमें कौन सी बड़ी बात है।"

"ठीक है।" काशीराम ने कहा -"पार्टी का नाम ’एकता पार्टी’..कैसी रहेगी?" दोनों सहमत हो गये।

दूसरे दिन कान्फ्रेन्स हुई। पत्रकारों से मुखातिब होकर दोनों ने एकता पार्टी के झन्डे तले एक हो कर चुनाव लड़ने का ऐलान किया जो जनता व पत्रकारों के लिए भी एक चौंका देनी वाली खबर थी। किसी पत्रकार ने कहा- "ये तो वास्तव में चौंका देने वाली खबर है!"

फतेसिंह ने कहा- "अभी ते हम आपको एक और चौंका देने वाली सूचना देंगे।" सब ध्ौर्य के साथ बैठकर सूचना का इन्तज़ार करने लगे।

"हमारे विरोधी दल के नेता भगवान भारत से नहीं हैं।" इतना कहना था कि पत्रकारों में खलबली मच गयी। लगे प्रश्नों पर प्रश्न करने। "कहाँ से हैं? कौन हैं? क्यों लड़ रहा है चुनाव यहाँ से?" आदि आदि।

काशीराम जी बोले- "सब को उत्तर दिया जाएगा... पूरे परिणामों के साथ। लेकिन अभी आपको इन्तज़ार करना पड़ेग।" उठकर चल दिए दोनों नेता।

दूसरे दिन सारे के सारे अखबार चौंका देने वाली खबरों से भरे पड़े थ। नारद जी जब अपने बारे में खबर पढ़ी तो उनके पाँव के नीचे की जमीन खिसकने लगी। भागे भागे भगवान जी के पास गये और बोले- "प्रभो! जिसका डर था वही हो गया। हमारा भेद हमारे विरोधियों को पता चल चुका है। अब ये देखना है कि वे कैसे उड़ाते हैं हमारी धज्जियाँ।"

"मैंने पहले ही लक्ष्मी को कह दिया था पर मानी नहीं। वैसे आपको क्या लगता है? वे क्या कर लें इन एक दो दिनों में?" भगवान जिज्ञासावश पूछ बैठे नारद जी से।

"काश मुझे पता होता..", नारद जी बड़ी उदासी से बोले, "अब तो उनकी मीटिंगों में जाकर ही पता करूँगा भगवन...।"

"ठीक है सखे।" कहकर भगवान  कल के आने का इंतज़ार करने लगे।

जब दोनों पार्टीयाँ एक हुईं और जब से उन्होंने जनता को भगवान और गरीब दल के बारे में बताया तब से जनता का रूझान थोड़ा थोड़ा उनकी ओर होना शुरू हो गया।  मीटिंगों में भीड़ भी जुटने लगी थी। आज की रैली में काफी भीड़ थी जिसे देख के फतेसिंह और काशीराम दोनों फूले नहीं समा रहे थे। छुपते-छुपाते नारद भी घुसे भीड़ के बीच, ताकि सुन सकें कि क्या कह रहे हैं नेता और जनता का रुख क्या है। मंच से पहाड़ी गरजा-

"भाइयो! हमारी नीतियाँ बिल्कुल साफ हैं। यहाँ की जनता व उसके उत्थान व विकास के लिए, जो हमारे विरोधियों के पास नहीं। वे आपको रिझाने के लिए गरीब व गरीबी राग आलाप रहे हैं। हम भी मानते हैं, यहाँ गरीबी है। है तो है.. इसमें दो राय नहीं। मैं पूछता हूँ.. कौन सी जादू की छड़ी है उनके पास जिसे घुमा कर वे तुरन्त गरीबी हटा देंगे। भाइयो... मेरा तो आपसे केवल एक प्रश्न है कि जाकर गरीब दल व उनके नेताओं से पूछें कि कब हटा देंगे वो गरीबी को? अगर उनके पास इसका उत्तर है तो आकर बतायें, अगर नहीं है... तो बंद करें वे अपना ये रोना।" तालियाँ बज उठीं।

"समय लगता है किसी काम को पूरा करने में। हमारे ये बाल धूप में सफेद नहीं हुए, अनुभवों से हुए हैं अनुभवों से!" फिर तालियों की गड़गड़ाहटों से पूरा माहोल गर्मा उठा। "अब काशीराम जी से कहूँगा कि वे आयें और जनता के सम्बोधित करें।"

"दोस्तो! भारतखण्ड की तरक्की और उन्नति आपके हाथ में है। आप जैसा चाहेंगे वैसा ही होगा। आप हमें वोट दें या न दें लेकिन हम ये कतई नहीं चाहेंगे कि कोई बाहर वाला वो भी विदेशी आकर हम और आप पे राज करे। क्या आप चाहेंगे?", जनता का स्वर उभरा- "नहीं!" साथ ही जनता में कुलबुलाहट भी शुरू हो गयी.."ये विदेशी बोलो तो कौन?"

"हम किसी और की बात नहीं कर रहे हैं", काशीराम जी ने कहा- "हम गरीब दे के नेता भगवान की बात कर रहे हैं। जिसे हम नर समझते रहे, असल में वह नर नहीं...", जनता साँस थाम बैठ गई कि नेताजी ये क्या कर रहे हैं।

"हौंसला रखें। हम सच कह रहे है वो नर नहीं.. नारायण है नारायण!" काशीराम ने कहा।

तभी भीड़ में से आवाज़ आई- "देखिये, पहेलियाँ न बूझाईये, साफ़ साफ़ कहिए क्या कहना चाहते हैं आप।"

"ये वही भगवान है, वही नारायण है जिसने करुक्षेत्र के मेदान में धर्मराज युधिष्ठर से ’अश्वथामा हतो हतो’ कहलाकर अपने भाइयो की जीत के लिए झूठ बुलवाकर उस समय के महान योद्धा द्रोणाचार्य को निहत्थे कर के मरवा दिया था। ये वही भगवान है... ज रुक्मणी को उठा कर ले गया था ये वही भगवान है जिसने छल से दुर्योधन जैसे महारथी को भीम द्वारा मरवाया। ये शख्स, झूठ बोलने में बहुत चालाक है। अपने झूठ को सच में बदलने में इसे महारत है।

भाइयो! छल तो धोखा हुआ ना--, और जो धोखेबाजी में माहिर हो जो अपने ही सगे-सम्बन्धियों, अपने ही रिश्तेदारों को धोखा दे सकता है तो उसके लिए आप किस खेत की मूली हैं। आप उस पर यक़ीन करेंगे? बोलिये, करेंगे...?"

जनता चिल्लाई..."नहीं..। कभी नहीं!"

"मैं पूछता हूँ.. अगर  वो भगवान है तो क्यों आया है वो यहाँ चुनाव लड़ने? क्या जरूरत पड़ी थी उसे चुनाव की? वो तो, वैसे ही सब ठीक कर देता है पर.. नहीं। भाइयो.. इसमें भी कोई जरूर दाल में काला है। स्वार्थी जो ठहरा! अवश्य कोई स्वार्थ छुपा होगा उसको।"

नारद जी.. दोनों कानों पर हाथ रखकर सुनते रहे। काशीराम स्टेज से भगवान जी को कोसता रहा।

"भाइयो व बहिनों! अपने आप तो मक्कार, धोखेबाज, छल-कपटी है ही, लेकिन अब जरा इनकी घरवाली के बारे में सुनें.. अररे वो लक्ष्मी है ना--- लक्ष्मी, अब क्या कहूँ उसके बारे में। जो अपनी सहेलियों को घर बुला बुला उनकी बेइज्जती करती नहीं थकती। पार्वतीजी इसका उदाहरण है। उनके पति को भिखारी, नशेड़ी, निठल्लू न जाने क्या क्या कहके शर्मिन्दा किया इसने। अरे.., मैं तो कहता हूँ, भिखारी तो स्वयं ये हैं ये.. जो भीख माँगने न जाने किस किस के पास नहीं गया। राजा बली के पास कौन गया था? बामन बनकर तीन पग धरती को माँगने...? ये गया था ये! अब यहाँ भी चला आया हमसे वोट माँगने। भाइयो! ये भीख नहीं तो और क्या है?.. बताइये, ... बोलिए? अरे मैं तो कहता हूँ आप अपना कीमती वोट भले ही पानी में डाल दें लेकिन इस शख्स को बिल्कुल न डालें। ये मेरी आप से दरख़्‍वासत है।" भीड़ उसके एक एक शब्द को बड़ी गहराई व दिल से सुन रही थी।

"भारतखण्ड को लोगों को उन्होंने समझ क्या रखा है? क्या उसने इन्हें किसी बैंक का चेक समझ रखा है, जिसे जब चाहे भुना लें। हमारे यहाँ का आदमी मर जाएगा लेकिन वो अपने सम्मान पे ठेस नहीं लगने देगा। विरोधी सुनले!.. वह भूखा रह सकता है लेकिन वो बिक नहीं सकता और न ही उसका वोट बिकाऊ है।" इतना कहना था कि सारा पांडाल तालियों की करतल ध्वनि से गूँज उठा।

"भाइयो! चुनाव नज़दीक है। फैसला तुम्हार हाथों में है कि वोट किसे देनी है। हमारे विरोधी तो कल चले जायेंगे। आप और हमने तो यहीं जीना है यहीं मरना है--- जय एकता!", कहकर उन्होंने अपना जोशीला भाषण समाप्त किया।

 नारद वापस आकर भगवान से बोले- "प्रभो,..  लगता है हमारा बोरिया बिस्तर  बंधने वाला है। आज तो हद ही हो गई। उन्होंने आपको और माते को जम के कोसा। कोसा ही नहीं, ऐसे-ऐसे लांछन लगाये कि जिनको सुनकर कान फट जायें। आपके चरित्र पर उँगलियाँ उठा-उठाकर वार पे वार किये गये। आपको छली,धोखेबाज, झूठा, फ़रेबी, मक्कार स्वार्थी न जाने क्या क्या कहा गया प्रभो। और तो और, माते को भी नही बख्शा उन्होंने। एक रात में सब कुछ बदल गया। बाकाी जो कुछ बचा है कल वोटींग बूथ पर जाकर देखूँगा और सुनूँगा फिर दूँगा आपको सूचना।" नारदजी उठ कर चल दिये।

रात जैसे तैसे कटी। सुबह हुई। नारद उठे, चल दिय वोटींग बूथ की ओर। देखा, लोग वोटींग बूथ में लम्बी लम्बी कतारों में खड़े थे। पास जाकर उन्होंने मतदाताओं की नब्ज टटोलने की कोशिश की। एक से पूछा- "आप अपन वोट किसें देंगे श्रीमान?"

"मैं तो अपना वोट गरीब दल को दूँगा।"

जो उन्होंने सुना, नारद जी, सुनकर अपने कानों पर यक़ीन नहीं कर पा रहे थे कि जो उसने कहा, क्या वह सच था? इतना कहने सुनने के बाद भी लोग अभी भी हमारे साथ हैं। फिर सवाल किया नारद ने- "क्यों देंगे आप अपना वोट गरीब दल को?"

"ये दोनों चोर-चोर मौसरे भाई हैं। हम इन्हें अच्छी तरह से जानते हैं।" तभी भीड़ ने कहा- "हाँ, हाँ, हम भी गरीब दल को ही देंगे अपना वोट।"

सुनकर नारद गदगद हो गये। अन्दर से अरदास आई- "हे भारत के गरीब मतदाता, तुझे प्रणाम! तेरा भेद तू ही जाने!"

जहाँ जहाँ गए, मतदाता उनका मनोबल बढ़ाते रहे। एक बूथ में तो विरोधी और इनके चाहने वालों में हाथापाई तक हो गई। शाम होते होते आशा बलवती हो गई थी कि वे जीत रहे हैं। 8 बजे खबर आई-

"ये आकाशवाणी है। अब आप प्यारेलाल से चुनाव का विशेष बुलेटिन सुनिये। भारतखण्ड में चुनाव का अंतिम दौर समाप्त हो गया है। यूँ तो एकता पार्टी तथा गरीब दल में जबरदस्त टक्कर होने की सम्भवना है, अभी-अभी हमारे विशेष सम्वाददाता ने खबर दी है कि मतदाताओं का जोशोखरोश देखकर कहा जा सकता है कि गरीब दल भारी मतों से विजयी होगा। यह देखकर लगता है कि उनके नेता भगवान इस प्रदेश के भावी मुख्य मंत्री हो सकते हैं।"  जैसे ही भगवान और नारद जी ने यह खबर सुनी उनकी बाँछे खिल गईं। लगे दोनों एक दूसरे को गले लगाने। नारद जी ने तो एडवान्स में बधाई दे डाली-" नये राज्य के, नये मुख्य मंत्री जी को बधाई हो। माते को फ़ैक्स कर दूँ.. आप कहें तो?"

"सखे.. अभी मतगणना होने दें। उनका रिज़ल्ट आने दें। तब कीजियेगा लक्ष्मी को फ़ैक्स।" भगवान ने नारद से कहा।

मतगणना जारी थी। बीच-बीच में रिज़ल्टों में उतार-चढ़ाव आता जाता रहा, जिसे देखकर दोनों पार्टियों में कभी खुशी, कभी मायूसी का दौर आता जाता रहा। तभी प्यारेलाल फिर टी.वी. पर उभरे.."मैं प्यारेलाल एक खास खबर को लेकर आपकी सेवा में हाज़िर हूँ। अभी अभी सूचना मिली है कि गरीब दल के नेता भगवान अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी एकता पार्टी के नेता फतेसिंह से लगभग 1लाख 80 हजार वोटों से हार गये हैं।"

जैसे नारद ने सुना, उसे काटो तो खून नहीं... ये क्या हो रहा है? ये क्या हो गया? हमारे सभी उम्मीदवार जीत रहे हैं और नेता जी हार गये।

 उसने भगवान जी की ओर देखा भगवान जी चारों खाने चित्त .. हार की खबर को  बरदाश्त नही कर पाये। बेहोश हो गये थे जगतपती।  नारद जी, उन्हें पानी के छीटे दे दे कर होश में लाने का प्रयास करते रहे।

जैसे भगवान होश में आये, नारद बोले- "हम हार गये प्रभो..हम हार गये। मैंने माते से पहले कहा था कि वहाँ हमारी हार निश्चित है।"

"दिल छोटा न करो मित्र।  हार जीत तो जीवन में लगी ही रहती है लेकिन मनुष्य के हाथों मात खाना, हमारे लिए थोड़ा कष्टदाई है। जाओ विश्राम करो।" स्वयं भी उठ कर चल दिये अपने कमरे की ओर।

 चढ़ते सूरज को सब अर्घ डालते है डूबते को नहीं। यही जग की रीत भी है, जब तक किसी का सितारा ऊँचा है सब उसके साथ। जैसे गर्दिश में सितारा आया नहीं कि  सब पल्लू झाड़ कर गायब। यही हुआ भगवान जी के साथ..कल तक लोग व चाहाने वालों की भीड़, अखबार, पत्रकारों, रिपोर्टरों, टी.वी  वालों का तांता लगा रहता था और अब वो, नारद और  इर्द गिर्द मडंराता सूनापन। तुलसीदास जी ने ठीक ही लिखा ’समय जात लागत नही बारा’।

शाम के समय  नारद जी भगवान जी के कमरे में उनका हाल पूछने गये तो देखा भगवान वहाँ नहीं हैं। नारद ये देख कर थोड़ा विचलित हुए। इधर उधर देखने के बाद जैसे बाहर निकले, तो देखा--  सामने सूखे कीकर के पेड़ के नीचे प्रभो बाँसुरी को लेकर बैठे हैं।

नारद को आते देख भगवान बोले--  "आओ.. आओ नारद जी। समय का खेल तो आप ने देख ही लिया।"  बाँसुरी को घुमाते कहने लगे- " कितना सटीक कहा था लक्ष्मी ने इस बाँसुरी को देते हुए तब। इसे साथ में रखना ना भूलियेगा ये तुम्हारे मायूसी के क्षणों में काम आयेगी। 

एक बात बतायें मित्र",  भगवान बोले-- "हम, हारे तो हारे कैसे?  हमाे पास मुद्दे थे, भाषण थे, अदायें थीं,  आवाज़ का जादू था, भीड़ थी,  मतदाताओं का विश्वास था, पूरी कवरेज़ थी। जनता हमारे साथ थी। ये हुआ तो हुआ क्या? कहाँ मात खा गये हम।"  इतना कहना था कि भगवान जी के सैल फोन की घंटी बज उठी-

"हल्लो ... कौन?"  भगवान जी बोले।

"प्रणाम--- भगवन। मैं फतेसिंह पहाड़ी।"

"--जीते रहो!"  भगवानजी  ने आशीर्वाद दिया।

 "अ-हँ..,  ना  --ना  प्रभो..।  ’जीते रहो’ नहीं, यूँ कहिए कि---’जीतते  रहो’।"

"चलिए---जीतते  रहो।" भगवान बोले.. साथ में कहा - "हे नरप्राणी उर्फ़ फतेसिंह जी।  एक बात बताइये ..आप,  जीते तो जीते कैसे?

 पहाड़ी बोले- "प्रभो! आप पर विजय पाना हमारे जैसे प्राणियों के बस की बात नहीं। हाँ, अलबत्ता चुनाव में आप से जीत जाना हमारे बाएँ हाथ का खेल है। क्यों कि यह नर का खेल है, नारायण का नहीं।"

प्रभो  बोल-  "हमने आपसे कुछ पूछा है? उसका उत्तर दीजिए।"

"भगवन, आपके पास वो सब कुछ था जो चुनाव जीतने के लिए होना चाहिए, और आपने उनका इस्तेमाल भी किया। जनता, अखबार, मतदाता सबके सब आपके साथ थे।  ऐसा भी नहीं कि उन्होंने  आपका साथ नहीं दिया ..सब ने दिया।  वोटें भी आप को ही पड़ीं। लेकिन हमने अपनी विद्या से, जिसे हमारी भाषा में स्किल कहते हैं जो आपने नहीं सीखी ---  वो है ’बूथ कैप्चरिंग’, आपको हराया।"

"वो क्या होता है?" भगवान जिज्ञासा बस पूछ बैठे पहाड़ी जी से।

"माना,  सारे  जेनुइन वोट आप को पडे़। लेकिन वो बैलट बाक्स जिसमें वे वोटें थी हमने,  एन केन प्रकारेण  हथिया लिये, और, रातों-रात उनसे सारे वे वोट निकाल कर अपने नाम के वोट डाल कर  पोलिंग आफिसर के दसख्त से सील करा के मजिस्ट्रेट के आगे पेश  करके अपने हक में वोट गिनवा के  बढ़त हासिल कर ली। इसे कहते हैं बूथ कैपचरिंग  दीनाबन्धु।"

"मान गये प्राणी आपको और आपकी खोपड़ी को।"  कह कर भगवान जी ने फोन काट दिया।

नारद बोल- "आज्ञा हो तो चलें वापस...।"

"हाँ --अब वैसे इसके अलावा चारा भी तो नहीं। लक्ष्मी भी हमारी बाट जोह रही होंगी।" पुष्पक विमान आया, दोनों उसमें बैठ के वैकुण्ठ की ओर चल दिए।

स्वर्ग लोक में पहुँचते ही लक्ष्मी ने प्रभो का स्वागत करते हुए कहा- "क्षमा भगवन! हमें बड़ा दु:ख हुआ कि आप पृथ्वी में चुनाव हार गये।"

"आपको कैसे पता..?" भगवान ने आश्चर्य से पूछा।

लक्ष्मी ने एच.पी. व फतेसिंह द्वारा हार की भेजी हुई फ़ैक्स की कॉपी उन्हें दिखाते हुए कहा- "इससे!"

प्रभो और नारद एक दूसरे का चेहर देखते रहे। मन ही मन आदमी की खोपड़ी की दाद भी देते रहे।

नाद बोले-"भगवन क्षमा मैं तो कई दिनों से ठीक से सोया भी नहीं। घर जाकर पहले थकान मिटा लूँ।" कहकर चल दिये।

भगवान और लक्ष्मी उनको जाते देखते रहे। लक्ष्मी की और मुड़कर भगवन बोले- "प्रिये! आपके खेल को खेलते मैं भी बहुत थक गया हूँ। मुझे भी थोड़े आराम की जरूरत है।" कहकर दोनों अन्दर चले गये।

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