अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

खनकती चूड़ियाँ

चूड़ियाँ जब बजतीं हैं
बहुत ही भली लगतीं हैं

 

माँ की चूड़ियाँ बजती हैं 
सुबह-सुबह नींद से जगाने के लिये
माँ की चूड़ियाँ बजती हैं
एक-एक कौर बना कर मुझे खिलाने के लिये
माँ-की चूड़ियाँ बजती हैं
थपकी दे कर मुझे सुलाने के लिये
माँ की चूड़ियाँ बजती हैं
आर्शीवाद और दुआयें देने के लिये.....
हे! ईश्वर सदा मेरी माँ की चूड़ियाँ
इसी तरह बजती रहें खनकती रहें
ये जब तक बजेंगी खनकेंगी
मेरे पापा का प्यार दुलार
मेरे सिर पर बना रहेगा......
वरना तो मैं -
कुछ भी नहीं कुछ भी नहीं

बहन की चूड़ियाँ बजती हैं
बहन की चूड़ियाँ बजती हैं
मेरी कमर पर प्यार भरा
धौल जमाने के लिये
बहन की चूड़ियाँ बजती हैं
मेरे माथे पर चंदन टीका लगाने के लिये
बहन की चूड़ियाँ बजती हैं
मेरी कलाई पर राखी बाँधने के लिये
बहन की चूड़ियाँ बजती हैं
लड़ने और झगड़ने के लिये
हे! ईश्वर सदा मेरी बहन की चूड़ियाँ
इसी तरह बजती रहें खनकती रहें
ये जब तक बजेंगी
साले बहनोई का रिश्ता रहेगा
और रहेगा भाई बहन का प्यार जन्मों तक..........

पत्नी की चूड़ियाँ बजती हैं
पत्नी की चूड़ियाँ बजती हैं
प्रतीक्षारत हाथों से दरवाज़ा खोलने के लिये
पत्नी की चूड़ियाँ बजती हैं
प्यार और मनुहार करने के लिये
पत्नी की चूड़ियाँ बजती हैं
हर दिन रसोई में
मेरी पसन्द के तरह-तरह के
पकवान बनाने के लिये
पत्नी की चूड़ियाँ बजती हैं
जब वह हो जाती है आलिंगनबद्ध
और सिमट जाती है मेरे बाहुपाश में
हे ईश्वर मेरी पत्नी की चूड़ियाँ
इसी तरह बजती रहें खनकती रहें
जब तक ये चूड़ियाँ बजेंगी खनकेंगी
तब तक मैं हूँ मेरा अस्तित्व है
वरना, इनके बिना मैं कुछ भी नहीं कुछ भी नहीं

बेटी की चूड़ियाँ बजती हैं
बेटी की चूड़ियाँ बजती हैं
पापा-पापा करके ससुराल जाते वक़्त
मेरी कौली भरते समय
बेटी की चूड़ियाँ बजती हैं
दौड़ती हुई आये और मेरे
सीने से लगते वक़्त
बेटी की चूड़ियाँ बजती हैं
सूनी आँखों में आँसू लिये
मायके से ससुराल जाते वक़्त.......
बेटी की चूड़ियाँ बजती हैं
रूमाल से अपनी आँख के आँसू
पापा से छिपा कर पोंछते वक़्त
हे! ईश्वर मेरी बेटी की चूड़ियाँ
इसी तरह बजती रहें खनकती रहें
जब तक ये बजेंगी खनकेंगी
मैं उससे दूर रह कर भी
जी सकूँगा......
ख़ुश रह सकूँगा

बहू की चूड़ियाँ बजती हैं
बहू की चूड़ियाँ बजती हैं
मेरे घर को अपना बनाने के लिये
बहू की चूड़ियाँ बजती हैं
मेरे दामन को ख़ुशियों से
भरने के लिये
बहू की चूड़ियाँ बजती हैं
मेरा वंश आगे बढ़ाने के लिये
बहू की चूड़ियाँ बजती हैं
मेरे बेटे को ख़ुश रखने के लिये
हे! ईश्वर मेरी बहू की चूड़ियाँ
सदा इसी तरह बजती रहें खनकती रहें
जब तक ये बजेंगी खनकेंगी
मेरा बुढ़ापा सार्थक है वरना,
इनके बिना तो मेरा जीना ही
निष्क्रिय है निष्काम है!

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

हास्य-व्यंग्य कविता

हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी

लघुकथा

कविता

सांस्कृतिक कथा

बाल साहित्य कविता

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं