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लहुलुहान अख़बार 

इक दिन सुबह उठते ही 
इक लहुलुहान 
अख़बार मुझसे लिपट गया 
मैंने उसे ढांढस बंधाया 
और उसकी दास्ताँ
सुनने के लिए 
उसे कुर्सी पर बिठाया 

बोला सीना फाड़कर 
देख-देख! कितने शहीदों का 
खून मुझ पर लगा है 
ये ही नहीं रेल दुर्घटनाओं, 
बलात्कारों व कई 
हवाई दुर्घटनाओं के 
उलीचे हुए खून के 
छींटे भी पड़े हैं मुझ पर, 
ये एक दिन की नहीं 
रोज़ मर्रा की बात 
बन गई, थक गया हूँ
हार गया हूँ कुछ तो कर मेरे लिए,
वह चुपचाप अपना 
आँचल सँभाल बैठ गया

जब उसने देखा 
कि उसे देखकर मेरी 
आँखों से भी आँसू 
टपक रहे थे।

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