अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

शिक्षा प्रणाली 

ये जाने कैसी 
शिक्षा प्रणाली हमने रची है 
शैतान की ख़ाला है, 
चुड़ैल की चची है।

 

बच्चोम से भारी हैं बस्ते 
जाने क्यूँकर ढोते सारे रस्ते
दसियों विषयों की रोज़ पढ़ाई
मानो हिमालय की दुर्गम चढ़ाई

 

सारा कुछ सीखा देने की 
अंधी होड़ सी मची है
ये जाने कैसी 
शिक्षा प्रणाली हमने रची है 
शैतान की ख़ाला है, 
चुड़ैल की चची है।


जब पुस्तके और स्मृति ही थी 
ज्ञान का आधार
तब इस पद्धति में 
रहा होगा कुछ सार
पर अब जब तकनीक ने 
बदल दिया है खेल सारा
और उँगलियों बटन पे पड़ते ही 
खुल जाता सूचनाओं का भंडारा

 

ऐसे में रटवाने पे ज़ोर तो 
कोरी नासमझी है
ये जाने कैसी 
शिक्षा प्रणाली हमने रची है 
शैतान की ख़ाला है, 
चुड़ैल की चची है।


सबको भली लगती जो 
लिखावट हो सुन्दर
और ये कभी रही था 
काम पाने का भी ज़रूरी हुनर
पर अब टाइपिंग ने कर 
दिया है काम बड़ा आसान
और ख़त बुरे भी हों 
अब तो नहीं कुछ बड़ा नुक्सान

 

अब तो जिसे पढ़ा भर जा सके 
बस वही लिखावट अच्छी है
ये जाने कैसी 
शिक्षा प्रणाली हमने रची है 
शैतान की ख़ाला है, 
चुड़ैल की चची है।


अंत में क्या कहें इस परीक्षा, 
अंक और परिणाम की व्यवस्था पर
ठीक होगा चुप चाप ही कुछ 
आँसू बहा लेना इस व्यथा पर
बेजोड़, अद्वितीय और 
अनूठा ही है हर बच्चा अगर
तो काहे फिर होड़ और स्पर्धा 
इनके ज़हनों में घोलते हो ज़हर

 

छोड़ भी दो थोड़ी बहुत 
मासूमियत जो इनमे बची है
ये जाने कैसी 
शिक्षा प्रणाली हमने रची है 
शैतान की ख़ाला है, 
चुड़ैल की चची है।
 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं