अदृश्य दरारें
काव्य साहित्य | कविता डॉ. नेहा गौड़15 Jul 2026 (अंक: 301, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
उसके बाल अभी भी रात जैसे स्याह हैं,
चेहरे पर झुर्रियों की कोई लकीर नहीं।
लोग कहते हैं—
"कैसी जवान लगती है, अभी भी!”
लेकिन . . .
उसकी कमर झुक गई है—
यह झुकना उम्र का नहीं,
उन ज़िम्मेदारियों का बोझ है,
जो उसने वर्षों तक ढोया है।
उसकी पिंडलियों में ठहरी हुई थकान
उसकी ढलती उम्र का परिणाम नहीं,
बल्कि उस संघर्ष की है,
जिसे किसी ने कभी गिना ही नहीं।
हाँ, वह अब “बूढ़ी हो गई है”!
पर कौन देखता है
उसके भीतर का वह अकेलापन,
जो धीरे-धीरे उसकी रगों में
बुढ़ापा घोल चुका है।
दरअसल, स्त्री उम्र से बूढ़ी नहीं होती,
स्त्री बूढ़ी होती है—
संघर्ष और ज़िम्मेदारियों की उन दरारों से,
जो अदृश्य रहकर भी उसकी आत्मा को थका देती हैं।
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