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शेष ही शाश्वत है

 

न आना तुम्हारा चयन था
न जाना।
कोई चला जाता है ऐसे
जैसे
सूरज के छूते ही
ओस अपने होने से
मुक्त हो जाए।
घाट पर
देह
पंचतत्वों को
लौटा दी जाती है।
अग्नि को अग्नि,
जल को जल।
कुछ भी
अपना नहीं रहता।
पर जड़ें
अदृश्य जल से रस खींचती हैं,
फिर अंकुरित होती हैं
नए पत्तों, नए फूलों,
नए जीवन की छाया में।
बीज
मृत्तिका में गिरते हैं
बिना पूछे
जड़ें गहरी हों या उन्नत,
उगना और लौटना
एक ही अटल लय है।
तुम आए
रिक्त
गए भी
उसी रिक्तता में
बीच में
अर्थ, स्मृति, संबंध
कुछ देर
रुक गए।
मनोरथ, स्मृति, छाया
सिर्फ़ यह बताती है
कि जीवन
किसी का नहीं।
समय
किसी के लिए
गति नहीं बदलता,
बस जाते को देखकर
क्षण भर
अपने ही मौन में
ठहर जाता है。
जन्म और मृत्यु
विरोध नहीं,
एक ही सत्य की
दो अवस्थाएँ हैं।
जो आया
उसे जाना ही था
यह अनिवार्यता नहीं,
यह अस्तित्व की
मूल भाषा है।
जीवन
इस भाषा को
समझ लेने का
क्षण मात्र।
जन्म
कोई इच्छा नहीं,
मृत्यु
कोई विफलता नहीं
दोनों
प्रकृति की
सनातन लय के
अपरिहार्य चरण हैं।

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