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प्रतीक्षा की लौ

 

इतिहास की सबसे लंबी चुप्पियों में
कुछ स्त्रियाँ रहती हैं।
उर्मिला उनमें से एक है।
 
चौदह वर्ष।
वन में
राम थे।
अयोध्या में
उर्मिला।
 
एक नाम
महाकाव्य में चलता रहा।
दूसरा
दीपक की लौ की तरह
घर में जलता रहा।
 
लौट आने की कथा
सबने सुनी।
प्रतीक्षा की नहीं।
 
यशोधरा।
एक स्त्री,
एक शिशु,
और एक लंबी रात।
 
एक द्वार खुला।
कोई
ज्ञान की ओर चला गया।
 
पीछे
जागती हुई आँखें रह गईं।
 
सदियाँ बीत गईं।
हम
बोधिवृक्ष की छाया में
बैठे रहे।
 
उस दीप की लौ तक
कभी नहीं पहुँचे।
 
गांधारी।
उसने
अपनी आँखों पर
अँधेरा बाँधा।
 
फिर
उसी अँधेरे में
एक-एक कर
सौ नाम
खो दिए।
 
इतिहास को
उसका शाप याद रहा।
उसका शोक नहीं।
 
मंदोदरी।
वह जानती थी—
कुछ विनाश
युद्धभूमि में नहीं,
अहंकार में जन्म लेते हैं।
 
लंका
बहुत बाद में जली।
 
अहिल्या।
वर्षों तक
एक धड़कन
पत्थर के भीतर
बंद रही।
 
कथा को
चमत्कार याद रहा।
वह धड़कन नहीं।
 
कुछ स्त्रियाँ
कथा बन गईं।
कुछ
कथा के भीतर रहकर भी
प्रसंग बनी रहीं।
 
हम केंद्र पढ़ते रहे।
हाशिए नहीं।
 
पर यह मत समझो
कि वे केवल
महाकाव्यों में रहती हैं।
 
इतिहास की सबसे लंबी चुप्पियों में
आज भी
कुछ स्त्रियाँ रहती हैं।
 
इतिहास की रोशनी
अक्सर वहीं ठहरती है
जहाँ तलवारें चमकती हैं।
 
दीपक बचाने वाले हाथ
उसकी नज़र से
छूट जाते हैं।

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