अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

अनकही उम्मीद

 

नील, एक कवि है, जिसके शब्दों में दर्द और प्रेम की गहराई बसी हुई थी। उसकी कविताएँ जीवन के उन पहलुओं को छूती थीं, जिन्हें लोग अक्सर अनदेखा कर देते हैं। एक दिन, सोशल मीडिया पर उसकी कविताओं पर एक टिप्पणी आई, “आपके शब्दों में एक जादू है, जो दिल को छू जाता है।” यह टिप्पणी आर्या की थी, जो एक साधारण गृहिणी है, लेकिन जीवन की जटिलताओं और सादगी को गहराई से समझती है। 

यहीं से उनकी बातचीत की शुरूआत हुई। शुरूआत में यह बस कविताओं और उनके अर्थों पर चर्चा थी, लेकिन धीरे-धीरे यह बातचीत वीडियो कॉल्स में बदल गई। आर्या अपनी दिनभर की कहानियाँ नील को सुनाती, और नील अपनी कविताओं के पीछे छिपे भावों को साझा करता। दोनों के बीच एक अनकहा रिश्ता बन गया था-एक ऐसा रिश्ता, जो कभी वास्तविकता में नहीं मिला, लेकिन उनकी बातचीत में हर दिन नया रूप लेता गया। 

फिर एक दिन, बिना कोई संकेत दिए, आर्या ने नील से बात करना बंद कर दिया। न कोई मैसेज, न वीडियो कॉल। नील को समझ नहीं आया कि यह अचानक क्या हो गया। उसने आर्या से संपर्क करने की हर मुमकिन कोशिश की, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। 

हालाँकि नील ने कभी भी आर्या को ग़लत नहीं समझा। वह जानता है कि आर्या की कुछ मजबूरियाँ और ज़िम्मेदारियाँ होगी, जो उसे इस क़दम के लिए मजबूर कर रही थीं। नील आर्या की परिस्थितियों को समझता है और उसका आदर करता है। 

लेकिन नील के दिल में एक ख़्वाहिश रह गयी, एक आख़िरी बार आर्या को अपनी नज़रों से ख़ुश देख लेने की। अगर आर्या अपनी ज़िन्दगी में आगे बढ़ चुकी है, नील को यह भी यह मंज़ूर है। वह बस चाहता है कि एक बार आर्या से उसकी बात हो जाए, ताकि उसकी तड़पती आत्मा को शान्ति मिल सके। प्यार तो नील हमेशा आर्या से ही करेगा, लेकिन उसे यह जानकर चैन मिलेगा कि आर्या ख़ुश है। 

नील को यह भी विश्वास था कि आर्या के मन में भी उसके लिए प्रेम आज भी है। शायद इसी डर से आर्या नील से संपर्क नहीं कर रही कि कहीं नील अपनी ज़िन्दगी में आगे बढ़ गया हो, और अगर वह फिर से उसके जीवन में आएगी तो नील अपने क़दम रोक देगा। 

दो साल बीत गए। नील के दिल में आर्या के लौटने की उम्मीद अब भी ज़िंदा है। वह अपनी कविताओं में उसकी यादों को बुनता, उसके लौटने के इंतज़ार में अपने शब्दों को सजाता। उसकी हर कविता में आर्या का अक्स झलकता है। वह जानता है कि वे कभी हक़ीक़त में नहीं मिले, लेकिन उनके बीच जो भावनाएँ थीं, वे असली थीं। 

नील का दिल मानता है कि एक दिन आर्या फिर से उसकी ज़िन्दगी में लौटेगी, और वे फिर से अपनी अधूरी कविताओं को पूरा करेंगे। उसकी उम्मीद, उसकी कविताओं की तरह, कभी नहीं मरी, आज भी वह उसके दिल में ज़िन्दा है आर्या के इंतज़ार में। 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

......गिलहरी
|

सारे बच्चों से आगे न दौड़ो तो आँखों के सामने…

...और सत्संग चलता रहा
|

"संत सतगुरु इस धरती पर भगवान हैं। वे…

 जिज्ञासा
|

सुबह-सुबह अख़बार खोलते ही निधन वाले कालम…

 बेशर्म
|

थियेटर से बाहर निकलते ही, पूर्णिमा की नज़र…

टिप्पणियाँ

सरोजिनी पाण्डेय 2024/09/03 11:46 AM

तो यह भेद है "दिकू" और दिकू प्रेमी की !!!!!!

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

कहानी

किशोर साहित्य कहानी

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं