अंतर
काव्य साहित्य | कविता डॉ. हिमाँशु कुकरेती15 Mar 2026 (अंक: 294, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
कभी कभी शूल भी
सहलाने लगते हैं ज़ख़्म
और फूल दे जाते हैं
अनगिनत पीड़ा भरे क्षण!
कभी अपने
बेगाने से होकर
राह में काँटे बोकर
हँस देते हैं
मेरे बिंधे हुए तलवों को देखकर!
कभी बेगाने
थोड़ी देर के लिये आकर
लोरियाँ सी गाकर
सुला जाते हैं!
तभी तो आज तक
अंतर नहीं कर पाया हूँ
अपने में बेगाने में!
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