बादल मंडराये अबकी बार
काव्य साहित्य | कविता नन्दकुमार मिश्र आदित्य15 Aug 2025 (अंक: 282, प्रथम, 2025 में प्रकाशित)
ना बरसे, जी तरसे, केवल मंडराये अबकी बार!
पुरवा झोंक गयी अंखियन में धूल
पछुआ ले आयी हियरा की शूल
भूली गुजरिया सिनेह, भूल गये सजना दुलार!
कितनी है बेतुकी बात, पावस है झुलसाता गात,
फसलों को छल गयी हरियाली,
सखियों के झूले हैं ख़ाली,
आये ना उनके मनमीत, सूने घर-आँगन दुआर!
महँगाई छुए आसमान, जल रहे खेतों में धान
मौसम ने बदला स्वभाव, हाटों के बढ़े-चढ़े भाव
रूठे पाहुन, सकुचाया किसान,
खेतों में पड़ गयी दरार!
टुन्ने औ' मुन्ने के टोटके, बोले छुटकी और छोटके
एक मुट्ठी सरसों, आजकल परसों
बरसो रे बरसो, कारे बादर बरसो
बदरा है बहरा, सुने ना गुहार!
तकनीकी मंगल है, कंक्रीटी जंगल है,
मानव प्रकृति में अब जारी दंगल है,
शजर का विनाश या शहर का विकास
विकास की विभीषिका, नियति लाचार!
सूखी तलैया, बने मेंढक मौनीबाबा,
नाचना भी भूल चले, जाने क्यों मोर?
बदले ज़माने के शौक़ भी बदले-से
पॉप का धमाल, रॉक का शोर!
गाने वाले गये कहाँ मेघ-मल्हार!
बादल मंडराये . . .
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