दलित समाज की पीड़ा को व्यक्त करती कविताएँ
समीक्षा | पुस्तक समीक्षा खान मनजीत भावड़िया 'मजीद’15 Jan 2026 (अंक: 292, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
पुस्तक: बंद दरवाजे (दलित-चिंतन की कविताएँ)
कवि: जयपाल
प्रकाशन: यूनिक पब्लिशर्स, कुरुक्षेत्र
मूल्य: ₹150 (पेपर बैक)
पिछले दिनों हरियाणा के चर्चित कवि जयपाल जी द्वारा लिखित काव्य पुस्तक ‘बन्द दरवाजे’ पढ़ने का अवसर मिला। इस पुस्तक में दलित चिंतन की कविताएँ हैं। दलित चिंतक/कवि ओमप्रकाश वाल्मीकि और सूरजपाल चौहान को समर्पित ‘जूठी पत्तल’ की पंक्तियों में भूख का यथार्थ देखिए:
“जूठी-पत्तल
हम तो बस टूट पड़ते थे
मिली-जुली सतरंगी मिठाइयों पर
घुली-मिली दाल-सब्जियों पर
कटे-फटे फल-फ्रूटों पर
कभी कभार ही मिलते थे हमें ये छत्तीस व्यंजन
माँ बहुत ख़ुश होती थी
कभी-कभी दुःखी भी होती थी”
दलित साहित्य के बारे में अलग-अलग लेखक अलग-अलग राय रखते हैं। हर लेखक ने अपनी हर रचना में बदलाव और विकास को अलग-अलग तरीक़े से दिखाया है। कुछ दलित लेखक ऐसे भी हैं जो देवी-देवताओं को मज़ाक के साथ नकारते हैं। कुछ लेखक ऐसे हैं जो आम लोगों की लोक संस्कृति को एक नई ज़िंदगी देने वाली दुनिया के तौर पर देखते हैं। कुछ दलित लेखक ऐसे हैं जो मिथकों और कहानियों को समुदाय की क्रिएटिविटी से बने रूपक मानते हैं, उन्हें पूरी ज़िम्मेदारी और संवेदनशीलता के साथ देखते हैं। कुछ दलित लेखक ऐसे हैं जो मार्क्सवाद को बहुत नफ़रत से देखते हैं, और कुछ दलित ऐसे हैं जिन्हें इस बात का अफ़सोस है कि मार्क्सवादी अभी तक हमारी मदद के लिए क्यों नहीं आए। कुछ सोचते हैं कि मार्क्सवाद ही एकमात्र रास्ता है जो जात-पाँत को सही अर्थों में समाप्त कर सकता है और ग़ैर-बराबरी मिटा सकता है। सभी लेखकों की अलग-अलग सोच है लेकिन सारे लेखकों में कहीं न कहीं एक जगह जाकर समानता देखने को मिलती है कि जाति पर आधारित अमानवीय भेदभाव और जाति समाप्त होनी चाहिए।
‘उसका गाँव’ कविता आज के सन्दर्भ में पूर्णतया सटीक बैठती है . . . उदाहरणार्थ यदि मैं गाँव जाता हूँ तो सबसे पहले मेरा नाम पूछा जाता है फिर महल्ला, पाना, ठोला, ठिकाना, बाप, दादा आदि ताकि जाति का पता चल जाए। शहर में भी यही हाल है, केवल मकान नं. की पहचान काफ़ी नहीं है जाति तो शहर में भी देखी जाती है। कुछ पंक्तियाँ आप भी देखिये:
“वे जाति नहीं पूछते
आज कल कोई किसी से जाति नहीं पूछता
जाति मिट सी गई है मानो
जैसे पढ़ लिख से गए हैं सब
इसीलिए जाति नहीं पूछते
हालाँकि बाक़ी सब अते-पते,
आग्गा-पिच्छा गली-मौहल्ला
वे अच्छी तरह पूछ लेते हैं
बार-बार पूछते हैं
पूछते ही रहते हैं कुछ न कुछ
जब तक पानी पूरी तरह साफ़ ना हो जाए
और पता ना लग जाए
कौन कितने पानी में है!”
‘हम क्या करते रहे’ कविता में कवि ने दलित वर्ग से प्रश्न पूछे हैं कि वे क्या करते रहें? जयपाल जी सीधे तौर पर कविता के माध्यम से अनेक सवाल कर रहे हैं:
“वे गा रहे थे
हम नाच रहे थे
वो बोल रहे थे
तो हम सुन रहे थे
सदियाँ गुज़र गईं
कुछ इसी तरह
पता ही नहीं चला
वे क्या कहते रहे
हम क्या करते रहे”
दलितों-पिछड़ों और वंचित समाज ने कभी नहीं सोचा आख़िरकार वे कर क्या रहे थे! अर्थात् केवल अनुसरण कर रहे थे! आदेश मान रहे थे!!
‘दलित बस्ती’ कविता एक बेहतरीन कविता है जिसमें दलित बस्ती स्वयं अपने बारे में कहती है कि मेरे पास तो न तो ढंग से सूर्य पहुँचा है न ही ढंग से कोई कवि। ‘आशा’ नामक कविता में दलित-स्त्री कहती है कि बीता हुआ कल मेरा कभी नहीं हुआ और जो चल रहा है वह किसी और का है और भविष्य पहले ही तय हो चुका है।
दलित स्त्री का दुःख कवि के शब्दों में:
“मैं तोड़ देना चाहती हूँ वे पैर
जो दलकर मुझे दलित बनाते हैं
दफ़न कर देना चाहती हूँ उस बचपन को
जो मेरे ज़ख़्मों पर नमक छिड़कता है
भूल जाना चाहती हूँ वह जवानी
जो मुझ पर बिजली बन कर गिरी थी
बंद कर देना चाहती हूँ वे पवित्र कुएँ
जिनमें मेरी लाश तैरती रहती है
पटक देना चाहती हूँ वे व्यवस्थाएँ
जो मेरा सिर सबके पैरों में रख देती है
छोड़ देना चाहती हूँ वे रास्ते
जो सिर्फ़ मेरे लिए ही बनाए गए हैं
मोड़ देना चाहती हूँ वे हवाएँ
जो मेरे सवालों को उड़ा ले जाती हैं
पलट देना चाहती हूँ वे सारी परंपराएँ
जो मेरे गले में लटका दी गई हैं”
इसी तरह ‘मैं किसको क्या कहूँ’ कविता में भारतीय गाँव में दलित महिला की स्थिति देखिए:
“मैं क्या कहूँ
उस गाँव को
जो सबका है पर मेरा नहीं
उन गाँव के कुत्तों को
जो मुझे ही देखकर भौंकते हैं
उन गाय भैंसों को
जिनका गोबर-मूत भी मेरे हाथों से पवित्र है
उस गाय-माता को
जिसके के नाम पर माबलिंचिंग हुई
और मैं विधवा हो गई
क्या कहूँ
उन देवताओं को
जो मुझे हमेशा शाप ही देते हैं
उन पवित्र पुजारियों को
जिनका धर्म मेरी परछाईं पर टिका है
उन धार्मिक चरणों को
जिनके नीचे मुझे कुचला ही गया
उन हवेलियों को
जिसके दरवाज़े हमेशा बन्द ही रहते हैं
उन महाजनों को
जिनके पास मेरी आत्मा गिरवी है”
वर्ण-व्यवस्था को लेकर उपर्युक्त कविता कुछ तीखे सवाल उठाती है और बेचैन करती है।
संस्कृत से लिया गया “दलित” शब्द का शाब्दिक अर्थ है “टूटा हुआ”, “कुचला हुआ”, “बिखरा हुआ”, या “उत्पीड़ित” जो भारत में इन समुदायों द्वारा झेली गई ऐतिहासिक अधीनता, हाशिए पर धकेले जाने और अधिकारों से वंचित किए जाने को दर्शाता है, जिन्हें ऐतिहासिक रूप से “अछूत” माना जाता था और जाति व्यवस्था से बाहर रखा गया था। यह शब्द अब सामाजिक/राजनीतिक पहचान का प्रतीक बन गया है, जो ज़्यादातर कविताओं में झलकता है। इन कविताओं में दलित समाज की पीड़ा को गहरी संवेदनशीलता और प्रतिबद्धता के साथ व्यक्त किया गया है। देश के वर्तमान जातिवादी और साम्प्रदायिक माहौल में ये कविताएँ बहुत ही महत्त्वपूर्ण सवाल उठाती हैं। मनुष्यता को बचाने का आह्वान करती हैं और मानवीय गरिमा को प्रतिष्ठित करती हैं।
आशा है पाठकों को इस पुस्तक की कविताएँ दलित समस्या पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करेंगी।
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