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मज़दूर वर्ग और पूँजीवादी वर्ग 

 

मेहनत की लूट पर
टिकी हैं केवल
दो ही कक्षाएँ—
इस अर्थव्यवस्था में
एक है श्रमिक वर्ग, 
और दूसरा
पूँजीपति वर्ग। 
 
श्रमिक वर्ग
कड़ी मेहनत करता है, 
जबकि पूँजीपति
मेहनतकशों की लूट पर
ज़िंदा रहता है। 
 
राजनीति फैलती जा रही है, 
सार्वजनिक कंपनियाँ
निगली जा रही हैं, 
सब कुछ बेचा जा रहा है। 
 
मंदी के नाम पर
सौदे किए जाते हैं, 
और मेहनत की कमाई
जनता से
छीन ली जाती है।
  
सामाजिक संगठन
चुपचाप
तमाशा देखते हैं—
कुएँ पर खड़े प्यासे को देखकर भी
कुछ नहीं बोलते। 
 
निजीकरण ने
किसी भी देश की
अर्थव्यवस्था को
मज़बूत नहीं किया है। 
 
हर पूँजीपति
मेहनतकश जनता के
शोषण पर खड़ा है, 
और कार्यकर्ता
एक-दूसरे से बड़ा बनने की होड़ में
मज़दूर वर्ग को
और कुचलते रहते हैं। 
 
मेहनतकश लोग
आपस में लड़ते हैं, 
क्योंकि उन्हें
अपना वर्ग-चरित्र
समझ में नहीं आता। 
 
जिस दिन लोग
अपने वर्गीय हित
पहचान लेंगे—
उसी दिन
बंधु समाजवादी क्रांति
शुरू होगी। 

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