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कूज़गर और मूरत

 

वो ख़ाक-ए-फ़ानी हो गया, 
मुझे सँवारने की ज़िद में, 
मेरे वुजूद के हर ज़र्रे में, 
जिसका अक्स-ए-फ़ानी था। 
  
एक कूज़गर के हाथों में, एक मूरत को गढ़ा था, 
मिट्टी की बेजान काया को, रूह से उसने मढ़ा था। 
कँपकँपाते हाथों से उसने, उसे साँचे में सँवारा, 
अपनी ही उम्र का क़तरा, उस पर क़ुर्बान किया सारा। 
  
जब वो मूरत सजी-धजी, बाज़ार की ज़ीनत बनी, 
हीरे-मोतियों से लदी, ख़ुद में ही सिमटी-तनी। 
महँगे दामों में बिकी तो, उसे ख़ुद पर गुमान हुआ, 
उस कूज़गर को भूल गई, जिससे उसके होने का नाम हुआ। 
  
वो मूरत अब महलों में थी, आसमान छूने को बेताब, 
उस कूज़गर के एहसानों का, दिया उसने बेदर्दी से जवाब। 
मगर वक़्त का पहिया चला, वो मूरत ज़मीन पर आ गिरी, 
टुकड़ों-टुकड़ों में टूटकर, अपनी हस्ती से हार गई। 
  
जो कभी महफ़िल की रौनक़ थी, वो सिर्फ़ अब कूड़े की ढेरी थी, 
वक़्त की मार में, अपनों ने भी तो कूज़गर से नज़रें फेरी थीं। 
वही कूज़गर फिर मिला उसे, उस बिखरी हुई धूल में, 
फिर से उठाकर गले लगाया, अपनी पुरानी ही भूल में। 
  
पश्चात्ताप में जलकर चूर-चूर वो फिर से मिट्टी बनी, 
उसके हाथों की गर्मी में खोने को, 
तैयार थीं वो अपनी राख को, 
इस फ़रिश्ते में पिरोने को। 
  
मिट्टी थीं, मिट्टी ही रही, बस ये घमंड का नशा था, 
जो इंसान रूह देता है, वही तो उसका असली ख़ुदा था। 
वो मूरत तो आज फिर कूड़े से उठकर सँवर गई, 
पर कूज़गर की रूह, उसी ढेरी पर ख़ाक होकर बिखर गई। 
 
शब्दार्थ:
कूज़गर= मूर्तिकार, रचयिता, कुम्हार
ख़ाक-ए-फ़ानी= मिट्टी बन चुका, मिट्टी में मिला हुआ
अक्स-ए-फ़ानी= परछाईं, मौजूदगी
ज़ीनत= शोभा, सुंदरता, रौनक़

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