अख़बारों में
शायरी | नज़्म डॉ. अंकेश अनन्त पाण्डेय1 Feb 2026 (अंक: 293, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
जो छप जाए अख़बारों में
हर वो लफ़्ज़ सच नहीं होता,
हर गुनेहगार अदालत में तलब नहीं होता,
वो रोटी कमा के अपने हक़ की ज़माने से रुसवा है,
सहर भर के लुटेरे की महफ़िल में ख़लल क्यों नहीं होता,
इसे पहले आ जाए बग़ावत पे उसकी भूख,
सियासत व पत्थरों पे असर क्यों नहीं होता,
बहा ले जाएगी रेत पे खड़ी सारी तेरी दौलत,
किसी सैलाब पर सिफ़ारिश का अमल तो नहीं होता!
जो छप जाए अख़बारों में
हर वो लफ़्ज़ सच नहीं होता!
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