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तेज़ी से विलुप्त हो रहा पारसी समुदाय

 

आज से कुछ हज़ार साल पहले हिमालय से कुछ आर्य नीचे उतर कर मैदानी इलाक़े में बस गए थे। उनकी संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि होती गई और ये पूरे मैदानी इलाक़े में फैल गए। आर्यों के नाम पर इस पूरे भू भाग को आर्यन या एरियाना या ईरान कहा गया। इस पूरे इलाक़े को पारस भी कहा जाता था। चूँकि ये आर्य भारत से आये थे, इसलिए इनकी जवेस्था भाषा संस्कृत से बहुत कुछ मिलती जुलती थी। ऋग्वेद की बहुत सी ऋचाएँ इनकी भाषा में ज्यों की त्यों हैं। ऐतिहासिक रूप से पारसी पंथ की शुरूआत 6वीं शताब्दी ईसा पूर्व में हुई। लेकिन सातवीं ईसवी तक आते-आते फ़ारसी साम्राज्य अपना पुरातन वैभव तथा शक्ति गँवा चुका था। 

आज से 1200-1300 वर्ष पहले अरब आक्रांताओं ने ईरान की समूची धरती पर क़ब्ज़ा कर आर्यों को जबरन मुस्लिम बनाना शुरू कर दिया। उस दौर में कुछ आर्य लोग भाग कर भारत के गुजरात के तट पर पहुँचे। गुजरात के राजा जादव राणा ने उन्हें एक दूध भरा कटोरा भिजवाया। मतलब साफ़ था कि यहाँ उनके लिये जगह नहीं है। आर्यों ने उसमें थोड़ी शक्कर मिला दी। मतलब यह कि हमें अलग से जगह देने की ज़रूरत नहीं हम यहाँ दूध में शक्कर की तरह घुल मिल जाएँगे। राजा जादव राणा ने उन्हें गुजरात में बसने की इजाज़त दे दी। 

चूँकि ये आर्य पारस से आए थे, अतः इन्हें पारसी कहा गया। तब से आज तक पारसी लोग दूध में शक्कर की तरह ही इस देश में रहे। कभी इस देश के लिए न बोझ बने और न अपने लिए कोई विशेष पैकेज या आरक्षण की माँग की। कभी देश द्रोही गतिविधि में शामिल नहीं हुए और न कभी इनकी वजह से साम्प्रदायिक हिंसा ही भड़की। 

पारसी परंपरा में एक मृत शरीर को अशुद्ध मानया जाता है, अर्थात्‌ संभावित प्रदूषक, साथ ही पारसी लोग अग्नि, पृथ्वी व जल को पवित्र मानते हैं। इसलिए मरने पर दाह संस्कार हेतु ये इन तीनों का प्रयोग नहीं करते। मरने पर लाश को पृथ्वी व आकाश के बीच बने टॉवर (जिसे ये दाख्मा कहते हैं) पर रख देते हैं, और उन्हें सूरज के संपर्क में लाया जाता है लाश को गिद्ध नोंच-नोंच के खा जाते हैं। इस तरह सूरज की गर्मी और गिद्धों की वजह से शव को नष्ट किया जाता है! ऊँचाई पर होने के कारण बदबू नीचे नहीं आ पाती। इस टॉवर की संरचना गोलाकार होती है और इसमें तीन पंक्तियाँ है, पहली पंक्ति पुरुष के शवों के लिए दूसरी महिलाओं के लिए और बीच में बच्चों के लिए। 

इस क्रिया के पीछे इनका यह तर्क होता है कि जब तक पारसी जिया दूसरों के लिए जिया और मरने पर भी यह शरीर दूसरे प्राणी के क्षुधा पूर्ति के काम आ जाय तो इससे बढ़िया और क्या हो सकता है। 

आज कल गिद्ध ख़त्म हो रहे हैं और दाह संस्कार का यह तरीक़ा भी अमानवीय व घृणित माना जा रहा है। इसलिए पारसी समुदाय अंतिम संस्कार के इस तरीक़े पर परिवर्तन का विचार कर चुका है। 

जिस प्रकार इस दुनिया से गिद्ध ख़त्म हो रहे हैं, उसी प्रकार पारसी समुदाय की जनसंख्या भी घट रही है। जब भारत में पारसी लोग आए थे उस समय उनकी संख्या 18,000 के लगभग थी। तब से लेकर आज तक इनकी जनसंख्या मात्र 55,000 तक पहुँची है। इनकी जनसंख्या का ग्राफ उत्तरोत्तर नीचे गिर रहा है। यहाँ हम विभिन्न काल में हुए जनगणना का डेटा दे रहे हैं:

1941: 1,10,000
2001: 70,000
2011: 55,000

इनकी जनसंख्या घटने की दर इसी तरह की रही तो 2020 तक इनकी संख्या मात्र 20,000 रह जायेगी और उस हालत में ये एक समुदाय न होकर एक जन जाति कहलाएँगे। यद्यपि आज विश्वभर में मात्र सवा से डेढ़ लाख के बीच ज़रथोस्ती हैं। भारत में कुल पारसियों की संख्या का 70% मुम्बई का निवासी है। ईरान और दूसरे देशों में जब पारसी लोग प्रताड़ित किए जा रहे थे, तब भारत में सबके लिए सद्भाव का माहौल था। यही कारण है कि आज विश्व में पारसियों की सबसे अधिक संख्या भारत में रहती है। इतना ही नहीं, पारसियों ने भी खुलकर भारत की सेवा की और भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन, अर्थव्यवस्था, मनोरंजन, सशस्त्र सेनाओं तथा अन्यान्य क्षेत्रों में सर्वत्र अत्यन्त महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। भारत के आज़ादी की लड़ाई में भी पारसियों का योगदान अप्रतिम रहा है। उद्योग, परमाणु, सिनेमा, सेना, राजनीति, संस्कृति जगत आदि में पारसी लोगों का योगदान वर्णनातीत है। आर डी टाटा, ए बी गोदरेज, दादा भाई नौरोज़ी, फ़ील्ड मार्शल मानक शाह, होमी जहांगीर भाभा, रूसी मोदी, ज़ुबिन मेहता, बोमन ईरानी, पीनाज मसानी आदि लोगों ने विभिन्न क्षेत्रों में अपनी एक अलग पहचान बनाई है। 

भारत में ये लोग कब आये, इसके आधार पर इन्हें ‘पारसी’ या ‘ईरानी’ कहते हैं। पारसी लोग जिस धर्म को मानते हैं उसे ज़ोरोस्ट्रीयन कहते हैं। ज़ोरोस्ट्रीयन धर्म अपने मूल देश ईरान में अब भी मौजूद है। ईरानी मुस्लिम इस धर्म का आदर करते हैं, क्योंकि यह उनके पूर्वजों का धर्म रह चुका है। ईरान में अभी भी कमोबेश 25,000 पारसी रहते हैं। पारसी भी इस देश को अपना देश मानते हैं। ईरान ईराक़ युद्ध के दौरान पारसी भी सीमा पर लड़ने गए और देश के लिए अपनी जान गवाईं थीं। ईरानी संसद में पारसियों का एक नुमायंदा ज़रूर होता है। पूरे विश्व के पारसियों का सम्मेलन ईरान के शहर तेहरान में दो बार हो चुका है। 

पारसी पंथ अथवा ज़ोरोएस्ट्रिनिज़म फ़ारस का राजपंथ हुआ करता था। यह ज़न्द अवेस्ता नाम के ग्रन्थ पर आधारित है। इसके संस्थापक ज़रथुष्ट्र हैं, इसलिये इसे ज़रथुष्ट्री पंथ भी कहते हैं। ज़ोरोएस्ट्रिनिइज़म दुनिया के सबसे पुराने एकेश्वरवादी धर्मों में से एक है। पारसी एक ईश्वर को मानते हैं, जिसे अहुरा मज़्दा (होरमज़्द) कहते हैं। अग्नि को ईश्वरपुत्र समान और अत्यन्त पवित्र माना जाता है। उसी के माध्यम से अहुरा मज़्दा की पूजा होती है। पारसी मंदिरों को आतिश बेहराम कहा जाता है। 

पारसी त्योहार में प्रमुख हैं, नौरोज़, खोरदादसाल, जराठुस्त्र्नों, गहम्बर्स फ्रावार देगन और पपेटी आदि। 

ज़रथोस्ती पंथ में मठवाद, ब्रह्मचर्य, व्रत-उपवास, आत्म दमन आदि की मनाही है। ऐसा माना गया है कि इनसे मनुष्य कमज़ोर होता है और बुराई से लड़ने की उसकी ताक़त कम हो जाती 

प्रमुख शिक्षाएँ—ईश्वर एक और सर्वशक्तिमान है! शरीर नश्वर है और आत्मा अजर-अमर है, इसलिए मनुष्य को अच्छे कार्य करने चाहिए! पारसी धर्म स्वर्ग-नरक में विश्वास करता है! इस धर्म के अनुसार अच्छे कार्यों से मनुष्य को स्वर्ग मिलता है! पारसी धर्म अंधविश्वासों का कठोर विरोधी है तथा चरित्र निर्माण पर बल देता है! यह धर्म सत्य के प्रति आस्थावान रहने का उपदेश देता है! यह धर्म सूर्य और अग्नि का उपासक है! पारसी धर्म मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं करता है! आज पारसियों का अस्तित्व संकट में है। इसके लिए सरकार को कुछ और ठोस क़दम उठाने होंगे। इस समुदाय की आबादी न बढ़ने बल्कि निरंतर घटते जाने के कुछ ख़ास कारण हैं 

1. पारसी लोग तभी शादी करते हैं जब ये पूर्णतया अपने पैरों पर खड़े हो जाते हैं। इस प्रक्रिया में 40 की उम्र तक पहुँच जाना लाज़िम बात है। 40 की उम्र तक पहुँच कर हमसफ़र की तलाश करना बहुत मुश्किल होता है। इसलिए कुछ लोग शादी ही नहीं करते। जो करते हैं वो मात्र एक बच्चे पालने की ही धारणा रखते हैं। इसलिए पारसी समुदाय में मृत्यु दर ज़्यादा व जन्म दर कम होता है।

2. जिस समुदाय में औरतें ज़्यादा पढ़ी लिखी होती हैं उस समुदाय में बच्चे कम होते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि माँएँ बच्चों की अच्छी परवरिश के लिए कम बच्चे पैदा करती हैं। पारसी समुदाय में औरतों के शिक्षा का स्तर शत प्रतिशत है।

3. पारसी समुदाय में यदि कोई लड़का या लड़की अपने धर्म से इतर शादी कर लेता है तो उसे धर्मच्युत कर दिया जाता है। अब उस लड़के या लड़की की गणना पारसी समुदाय में नहीं की जाती।

पारसी समुदाय को बढ़ाने के लिए किराये की कोख पर भी भारत सरकार विचार कर रही है। इस दिशा में सरकार द्वारा पोषित ‘जियो पारसी’ संस्था इस दिशा में कार्यरत है, पर पारसी पुरोहित ने यह शर्त रखी है कि शुक्राणु व अंडाणु पारसी होना चाहिए। 

इसके अतिरिक्त सरकार व पारसी समुदाय ने जनसंख्या बढ़ाने के लिए उन दम्पतियों को 1000/-रुपये मासिक देने की मंज़ूरी दी है। जो तीन बच्चे पैदा करेंगे। मगर इस योजना का लाभ लेने के लिए मात्र 10 लोग ही आगे आए। यहाँ पारसी समुदाय को भी अपने समुदाय को बचाए रखने के लिए आगे आना होगा कुछ सोचना होगा। जब ये पाश्चात्य सभ्यता को अपने जीवन का अंग बना सकते हैं तो धर्म के मामले में इतनी असहिष्णुता क्यों? भारतीय आर्यों ने जब शादी व्याह के मामले में लचीला रूख़ अपना लिया है तो ईरानी आर्य (पारसी) अपनी नस्ल की शुद्धता के प्रति इतने फ़िक्रमन्द क्यों हैं? क्यों नहीं ये भारतीय आर्यों की तरह वसुधैव कुटुम्बकम् को अपना रहे? यहाँ यह तथ्य भी दृष्टिगत होता है कि विश्व शक्तियों के एक दूसरे देशों पर अतिक्रमण और और उनकी संस्कृति के विनाश के कारण एक उन्नत और सुसंस्कृत जाती समुदाय विलुप्त होने के कगार पर पहुँच सकता है। 

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