वृन्दावन तो वृंदावन है
काव्य साहित्य | गीत-नवगीत डॉ. अवनीश सिंह चौहान1 Jun 2020 (अंक: 157, प्रथम, 2020 में प्रकाशित)
वृन्दावन तो वृंदावन है,
प्रेम-राग की रजधानी
प्रेम यहाँ बसता राधा में
मुरली मधुर मुरारी में
प्रेम यहाँ अधरों की भाषा
नयनों की लयकारी में
प्रेम यहाँ रस-धार रसीली,
मीठा यमुना का पानी
प्रेम यहाँ पर माखन-मिश्री
दूध-दही, फल-मेवा में
प्रेम यहाँ पर भोग कृष्ण का
भक्ति-भाव नित सेवा में
प्रेम यहाँ पर ब्रज-रज-चंदन,
शीतल-संतों की वाणी
प्रेम यहाँ तुलसी की माला
नाम, जाप, तप, मोती में
प्रेम यहाँ मंदिर की घण्टी,
जगमग-जगमग जोती में
प्रेम यहाँ पर ध्यान-साधना,
मुक्ति-प्रदाता, वरदानी।
अन्य संबंधित लेख/रचनाएं
अंतिम गीत लिखे जाता हूँ
गीत-नवगीत | स्व. राकेश खण्डेलवालविदित नहीं लेखनी उँगलियों का कल साथ निभाये…
टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
लघुकथा
पुस्तक समीक्षा
व्यक्ति चित्र
साहित्यिक आलेख
बात-चीत
सामाजिक आलेख
गीत-नवगीत
ललित निबन्ध
विडियो
उपलब्ध नहीं
ऑडियो
उपलब्ध नहीं