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अनोखा विवाह

नीरजा और महेश चंद्र द्विवेदी की सगाई की रस्मों का प्रारम्भ ही नाटकीय नहीं हुआ अपितु विवाह भी कम नाटकीय परिस्थितियों में नहीं हुआ। 

जब लड़के और लड़की की सहमति मिल गई तो जैसे चुपचाप सगाई का सामान वापस भेज दिया गया था, उसी तरह चुपचाप वापस लाकर श्रीमती सुशीला शर्मा की अल्मारी में रख भी दिया गया। द्विवेदी जी के छोटे भाई रमेश चंद्र द्विवेदी सन्‌ 1964 में कनाडा जाने वाले थे। अब श्री शम्भूदयाल दुबे ने शर्मा जी को पत्र लिख कर आग्रह किया कि रमेश के विदेश जाने के पूर्व महेश की शादी कर दी जाये। शर्मा जी नीरजा की शिक्षा एवं महेश द्विवेदी की आई.पी.एस. की ट्रेनिंग समाप्त होने से पूर्व उनका विवाह नहीं करना चाहते थे। आख़िर समझौता इस बात पर हुआ कि तिलक रमेश के सामने  हो जाये और विवाह ट्रेनिंग समाप्त होने पर। 

10 मई 1964 को शर्मा जी अपने बड़े भाई पंडित त्रिवेणी सहाय शर्मा, साँढ़ू श्री रामस्वरूप मिश्रा, श्रीमती सुशीला शर्मा के बड़े भाई श्री राजेंद्र मिश्रा, अपने भानजे सोमेश चंद्र पाठक के साथ कार से तिलक का सामान लेकर, अछल्दा से मानीकोठी गाँव तक की ऊबड़-खाबड़ एवं टूटी-फूटी सड़क पर, किसी तरह कार कुदाते हुए श्री शम्भू दयाल दुबे के घर तक पहुँचे। चलते समय सोमेश पाठक (सदन दद्दा) ने नीरजा से शरारत में चुपचाप पूछा– “क्या तुम्हें गाँव के घर के बारे में कुछ पूछना है?" नीरजा को डर था कि ससुराल ठेठ देहात में है, ऐसा न हो कि वहाँ शौच के लिये खेत में जाना पड़ता हो? उसने कहा– “दद्दा बस यह पता कर लीजियेगा कि वहाँ साफ़-सुथरा टौयलेट है या नहीं?" 

ग़नीमत है कि जब नीरजा ससुराल पहुँची तो ज्ञात हुआ कि पूरे गाँव में उन दिनों टौयलेट केवल उस घर में ही था।      

द्विवेदी जी की परीक्षा के बाद ट्रेनिंग समाप्त होने वाली थी अतः उनके पिता जी ने सहालगों के दिन में अपने पंडित से शुभ मुहूर्त विचरवा कर 14 जून की तारीख़ विवाह के लिये निश्चित करके शर्मा जी को बता दी। श्री राधेश्याम शर्मा उस समय आगरा में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के पद पर नियुक्त हो चुके थे। शर्मा जी अपनी बेटी का विवाह बदायूँ जनपद की दातागंज तहसील के अपने पारम्परिक घर से करने वाले थे। उनके बड़े भाई और श्रीमती शर्मा की माँ एवं बड़े भाई का घर भी दातागंज में आमने-सामने है। अधिकांश सम्बंधी वहीं थे और घर में पहली शादी होनी थी अतः खूब ज़ोर-शोर से तैयारी प्रारम्भ हो गई।

अब भाग्य को नाटक तो दिखाना ही था। हुआ यह कि महेश द्विवेदी विभागीय लिखित परीक्षा में तो पास हो गये पर घुड़सवारी में घोड़ी पर जीन कसने की परीक्षा में फेल हो गये। उसकी पुनर्परीक्षा माउंट आबू में होनी थी और उसकी तिथि 17 जून थी। इस सूचना से दोनों घरों में भूकम्प आ गया। दोनों पक्षों के निमंत्रण पत्र छप कर वितरित भी हो गये थे। मानीकोठी से दातागंज तक जाने के लिये बस और बारातियों के स्वागत के लिये हाथियों की व्यवस्था हो चुकी थी। दोनों ओर अधिकांश तैयारियाँ हो चुकी थीं अतः दोनों पक्ष विचारमग्न थे कि इस समस्या से कैसे निजात पायें। विभागीय परीक्षा की तिथि टाली नहीं जा सकती थी और विवाह की तारीख़ भी नहीं बदली जा सकती थी। उन दिनों विवाह संस्कार तीन दिन में पूर्ण होते थे। 14 जून को बारात की अगवानी और जयमाल, रात में विवाह और सप्तपदी, 15 जून को कुँवर कलेऊ, न्योतनी आदि रस्में और 16 जून को प्रातः बारात की विदाई होनी थी। 

इस समस्या का निदान यह खोजा गया कि 15 तारीख़ को जनवासे में न्योतनी के बाद शीघ्रता से दूल्हे को घर बुलाकर हाथ का कंगन खुलवाने की रस्म कर दी जाये और फिर उन्हें शाम के 6 बजे तक शीघ्रता से कार दौड़ा कर बरेली भेज दिया जाये। बरेली से रात 9 बजे की ट्रेन से दिल्ली और वहाँ से दूसरी ट्रेन से वह माउंट आबू समय पर पहुँच सकते हैं। वहाँ परीक्षा देकर जब द्विवेदी जी दातागंज लौट आयें तब नीरजा के छोटे मामा श्री मानवेंद्र कुमार मिश्रा की 21 जून को होने वाली शादी में सहभागिता करें और वहाँ से लौटकर जब आयें तब नीरजा को विदा करके ले जायें। 

इसी कार्यक्रम के अनुसार विवाह करने का निश्चय किया गया। नीरजा के ताऊ की हथिनी पवन के साथ ही दो अन्य हाथियों की भी व्यवस्था की गई ताकि बारात दरवाज़े पर आये तो हाथी पर शान से बैठ कर आये। उस समय का क्या युग था– गाँव की लड़की की शादी में गाँव का हर व्यक्ति बिना जाति-पाँति का विचार किये सहभागिता करता था। जिसके पास दूध-दही है वह दूध-दही लिये चला आ रहा है। जिसके पास सब्ज़ी है वह सब्ज़ी ला रहा है। कोई शगुन ला रहा है तो जो कोई आर्थिक रूप से अक्षम है तो वह श्रम करके कन्या के विवाह में सहयोग करके पुण्य कमा रहा है। लाला राम स्वरूप गुप्ता जो शर्मा जी के बड़े भाई की तरह थे, ने अपनी नई कोठी बनवाई थी। जब उन्हें सूचना मिली कि शर्मा जी नीरजा का विवाह दातागंज से करने वाले हैं तो उन्होंने स्वयं अपनी नयी कोठी में जाना स्थगित कर दिया और नीरजा की बारात के लिये जनवासा बनाने के लिये व्यवस्था करा दी। 

14 जून को बस रात में मानीकोठी गाँव में आकर खड़ी हो गई थी। कार्यक्रम यह था कि प्रातः मुँह अँधेरे 4 बजे बारात मानीकोठी से चल दे। बारातियों को पहले से आगाह कर दिया गया था कि गाँव के प्रत्येक घर का एक बाराती जायेगा। सब बाराती अपने अच्छे साफ़-सुथरे कपड़े तैयार कर लें। 4 बजे सुबह हर हालत में चल देना है ताकि 9 बजे तक दातागंज पहुँच जायें और नाश्ता वहाँ पहुँच कर किया जाये। द्विवेदी जी की माता जी ने ज़बरदस्ती एक टोकरी में कुछ पूड़ी साथ में रख दी थीं।

बाराती लोग बड़े उत्साह से तैयार होकर ठीक समय पर आ गये पर भाग्य को अभी परीक्षा लेनी थी। बस घर्र-घर्र घूँ करके किसी तरह स्टार्ट हुई पर नहर की पटरी पर एक पेड़ की शाखा के सामने नतमस्तक हो गई। जब कुल्हाड़ी लाकर वृक्ष की एक शाखा को काट कर हटाया गया तब जाकर बस चल पाई। इटावा में एडवोकेट लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी अपनी छोटी पुत्रियों के साथ सम्मिलित हुए। बस किसी तरह तेज़ नहीं चल पा रही थी। लगता था कि जान-बूझ कर बाबा-आदम के ज़माने की बस बुक की गई थी। थोड़ा चल कर बस हाँफने लगती थी। कहाँ तो बाराती यह कल्पना कर रहे थे कि शर्मा जी के घर पर पहुँच कर नाश्ते में तरह-तरह के माल उड़ायेंगे और कहाँ अब यह लगता था कि नाश्ता ही नहीं दोपहर के भोजन के भी लाले पड़ जायेंगे। इधर 14 जून की भयंकर गर्मी और तेज़ धूप थी और 10 बजते-बजते लू भी चलनी शुरू हो गई। बदायूँ पहुँचते-पहुँचते बस की साँसें टूट गईं और उसने आगे चलने को मना कर दिया। किसी तरह बस की मरम्मत कराई गई। सारे बाराती लू, धूप, गर्मी और भूख-प्यास से बेहाल हो चुके थे। सबने एक-दो जो भी पूड़ी हिस्से में पड़ीं खा लीं पर उसने पेट की क्षुधा कम करने के स्थान पर तीव्र कर दी। किसी तरह दोपहर को तीन बजे बारात दातागंज पहुँच पाई। 

इधर नीरजा के घरवाले चिंतित थे कि 9 बजे बारात आनी थी, 3 बजने वाले हैं। नाश्ता क्या दोपहर के भोजन का समय भी बीत रहा है। नीरजा के पापा मन में सोचने लगे कि कहीं लड़के वालों का कोई और नाटक तो नहीं होने जा रहा है। उस समय सूचना पाने का कोई अन्य साधन नहीं था। इसी समय बस आने की सूचना मिली। शीघ्रता से बारातियों की अगवानी ठंडे जल और मैगो शेक से की गई तब जाकर दोनों पक्षों को चैन पड़ा।

बारातियों को लाला रामस्वरूप जी की नई शानदार कोठी में निवास का ही सुख नहीं मिला। उनके लिये नहाने के बाद खाने के लिये सुस्वाद भोजन के अतिरिक्त, नाई, मालिश करने वाले, धोबी और मोची की भी व्यवस्था थी। चारपाइयों पर इतने साफ़ धुले चमकदार बिस्तर बिछे थे । उनके गाँव में तो बिजली का नामोनिशान नहीं था पर यहाँ बिजली चली जाये तो हाथ में पंखा लेकर झलने वाले भी तैयार थे। कुछ ग्रामवासियों को छोड़ कर अधिकांश ने तो अपने जीवन में इतना शानदार स्वागत अभी तक नहीं देखा था। थके-हारे लू-धूप से त्रस्त बाराती नहा-खाकर, बिस्तर पर लेटकर सपनों की दुनिया में पहुँच गये। 

रात के 8 बजे महेश द्विवेदी दूल्हा बन कर झगा पटुका पहनकर, मौर लगा कर तैयार हो गये। पवन नामक हथिनी को दूल्हे को बिठाने के लिये विशेष रूप से सजाया गया था। उसपर दूल्हे के साथ उनके बड़े भाई श्री रामचंद्र दुबे अपने पुत्र राकेश और पुत्री मंजू के साथ बैठे। आज उनके छोटे भाई रमेश की कमी खल रही थी। अन्य दो हाथियों पर श्री शम्भू दयाल दुबे एवं अन्य विशेष सम्बंधी थे। बारात तैयार होकर गाजे-बाजे के साथ बड़ी धूम-धाम से पूरे क़स्बे का चक्कर लगाकर शर्मा जी की हवेली के सामने पहुँची। रास्ते में सभी घरों की छतों पर स्त्रियाँ और बच्चे बारात देखने के लिये लदे हुए थे। बारात आने पर परम्परानुसार आतिशबाज़ी चलाकर बारात का स्वागत किया गया।

हवेली के बड़े फाटक के अंदर प्रवेश करने पर बड़ा दालान था जहाँ जयमाल की व्यवस्था की गई थी। जयमाल दातागंज में पहली बार होने जा रही थी। इसका ग्रामवासियों और अधिकांश सम्बंधियों द्वारा विरोध हो रहा था। श्री राधेश्याम शर्मा जिस बात को सही समझते थे तो दुनिया उलट-पलट जाये पर वह पीछे नहीं हटते थे। उनकी राय थी कि जयमाल होने से सब सम्बंधी लड़के-लड़की को देख लेते हैं। यदि जयमाल नहीं होती है तो लोग शादी में सहभागिता करने के बाद भी लड़के-लड़की को पहचानते नहीं हैं। विरोध के बावजूद जयमाल कैसे होगी यह देखने के लिये शर्मा जी की हवेली की विशाल छत और चहारदीवारी से हज़ारों आँखें नीचे दालान में झाँक रही थीं। आज स्थिति यह है कि दातागंज की किसी कन्या का विवाह बिना जयमाल नहीं होता है। जयमाल के समय नीरजा घूँघट निकाल कर जयमाल डालने गई थी। द्विवेदी जी के एक घनिष्ठ मित्र ने द्विवेदी जी को दिखाने के लिये, या कहिये कि उस समय की शहर में होने वाली जयमाल की रीति के अनुसार नीरजा की साड़ी किनारे से खींच दी जिससे मुख खुल गया। जयमाल डालकर नीरजा शीघ्रता से घर के अंदर चली गई। उसने द्विवेदी जी के उस मित्र को शरारती समझ कर उस समय माफ़ नहीं किया। बाद में सम्पर्क होने पर पाया कि वह बहुत सज्जन हैं। नीरजा को यह शिक्षा मिली कि किसी के प्रति तुरंत कोई भावना नहीं बना लेनी चाहिये।

रात के तीन बजे दूल्हे को जगाकर हवेली लाया गया। हवेली के अंदर सारी स्त्रियाँ दोनों आँगनों में बिछी दरियों पर पसरी हुई थीं। अंदर के आँगन को ख़ाली कराके मंडप के पास जगह बनाई गई। 4 बजते-बजते विवाह संस्कार का कार्यक्रम प्रारम्भ हो गया। जयमाल एवं विवाह के कार्यक्रम के वीडियो बनाने का भार आगरा के शर्मा जी के स्टेनो ने लिया था। वीडियो बना भी और अधिकांश लोगों को दिखाया भी गया पर नीरजा और द्विवेदी जी ने आज तक नहीं देखा।

विवाह के पश्चात द्विवेदी जी प्रातः जनवासे में चले गये। नहा कर तैयार होकर वह अपने बंधुओं और कुछ मित्रों के साथ कुँवर कलेऊ के लिये आये। आँगन के बीच में एक पलंग पर रेशमी चादर बिछाकर कुँवर कलेऊ की रस्म की तैयारी की गई। बारात में लोगों ने द्विवेदी जी को समझाया था कि “बिना कोई माँग किये भोजन को हाथ नहीं लगाना। यह रस्म है।" द्विवेदी जी ने कुछ भी खाने से इंकार कर दिया और कहा “मुझे कार चाहिये तब कुछ खाऊँगा।" नीरजा के छोटे भाई राजीव के पास अपनी एक खिलौने की कार थी। उसने जब अपनी कार लाकर दी तब द्विवेदी जी ने भोजन को हाथ लगाया। छोटी बहिन सुषमा और ताऊ की बेटी संतोष ने जीजा के जूते चुराकर नेग लेकर ही जूते वापस किये। ताई श्रीमती मथुरा देवी को गाने का बेहद शौक़ था। नीरजा की बुआ श्रीमती रामप्यारी भी लोकगीतों के गायन में किसी से कम नहीं थीं। अपनी सहेलियों सहित नीरजा की ताई एवं बुआ ने लोक गीतों और गालियों का मोर्चा सम्हाल लिया था।

बारात के भोजन की व्यवस्था लाला रामस्वरूप की कोठी के पास बने म्युनिसिपैलिटी के दफ़्तर में थी। बरेली से सर्वोत्तम रसोइये बुलाकर बारातियों के लिये भोजन तैयार कर रहे थे। हवेली पर अलग रसोइये भोजन तैयार कर रहे थे ताकि घर से कोई भूखा न जाये और महिलायें रसोई में न लगी रहें। वे विवाह के समय सभी कार्यक्रमों में प्रसन्नतापूर्वक सम्मिलित हो सकें। कुँवर कलेऊ के पश्चात सब लोग जनवासे में एकत्रित हुए। दोनों पक्षों के पंडित आमने-सामने बैठे। न्योतनी में दोनों पक्षों के पंडितों द्वारा एक-दूसरे की प्रशंसा करने का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ।

न्योतनी समाप्त हो पाती उसके बीच में ही दूल्हे को शीघ्रता से खिला-पिला कर हवेली ले आया गया। 6 बजे तक द्विवेदी जी को यहाँ से बरेली के लिये विदा होना आवश्यक था। नीरजा की बुआ की बहू श्रीमती शारदा (सदन पाठक की पत्नी) ने जल्दी से एक थाल में पानी भरकर दूल्हा-दुल्हन की अँगूठी की रस्म करा दी और दोनों के कंगन खुलवा दिये। हड़बड़ी में जो कुछ हुआ दूल्हा–दुल्हन किसी को स्मरण नहीं रहा कि क्या हुआ था, कैसे हुआ था। सदन पाठक शीघ्रता से महेश द्विवेदी को पुलिस के ड्रायवर और गनर के साथ बरेली ले गये। उन दिनों ट्रेन में पहले से रिज़र्वेशन नहीं होते थे। एक दरोगा जी ने कंडक्टर की ख़ुशामद करके द्विवेदी जी को दिल्ली जाने वाली ट्रेन में बिठा दिया।

भाग्य का खेल अभी समाप्त नहीं हुआ था। जैसे ही पुलिस वाले द्विवेदी साहब को ट्रेन में फ़र्स्ट क्लास के दर्जे में सीट पर बिठा कर गये और ट्रेन के इंजन ने सीटी मारी ही थी कि एक फ़ौज का सेकेंड लेफ़्टीनेंट अफ़सर भागता-दौड़ता आया और द्विवेदी जी से बोला– “यह सीट तो कंडक्टर ने मुझे रिज़र्व की थी आप इसे ख़ाली कीजिये।" द्विवेदी जी ने कहा– “यह सीट कंडक्टर ने मुझे रिज़र्व की है।" दोनों ने अपनी-अपनी यात्रा करने की आवश्यकता बताते हुए स्वयं यात्रा करने की बात कही और फिर एक दूसरे की ज़रूरतों को समझते हुए एक सीट पर ही यात्रा करने का मन बना लिया। आँखों में काजल और पैरों में महावर लगाये सुंदर, स्मार्ट द्विवेदी के साथ एक सीट पर रात्रि व्यतीत करते हुए वह फ़ौजी अफ़सर मन ही मन मुस्करा रहा था और अपने भाग्य पर इतरा रहा था। इधर द्विवेदी मन मसोस कर रह गये। शादी के मंडप में दुल्हन को छोड़कर उल्टे-सीधे भागते हुए ट्रेन पकड़ी तो रात बितानी पड़ रही थी किसी पुरुष के साथ और वह भी एक फ़ौजी अफ़सर के साथ। 

प्रातः ट्रेन दिल्ली पहुँची तो वहाँ से माउंट आबू के लिये दूसरी ट्रेन पकड़ कर द्विवेदी जी राजपूताना और फिर बस से माउंट आबू पहुँचे। ग़नीमत यह रही कि भाग-दौड़ कर वह परीक्षा के ठीक समय पर पुलिस ट्रेनिंग कालेज के कैम्पस में थे। भाग्य की विडम्बना देखिये कि किसी दूल्हे को क़िस्मत का यह मज़ाक नहीं झेलना पड़ा होगा कि शादी के तुरंत बाद अपनी दुल्हन से मिलने के स्थान पर घोड़ी की जीन कस रहा हो।

अब इधर दुल्हन ने भी कम त्रासदी नहीं झेली। किसी के विवाह के तुरन्त बाद, विवाहस्थल से ही वर परदेश चला जाये, बारात वापसी के रास्ते में हो और वधू पहले ही ससुराल पहुँच जाये– ऐसा न कभी देखा था न सुना परन्तु नीरजा के साथ ऐसा ही हुआ। विवाह सम्पन्न होते ही विवाह-मण्डप से दूल्हा जी को विभागीय परीक्षा के लिये रात्रि मे प्रस्थान करना पड़ा। अगले दिन प्रातः पाँच बजे बाबा आदम के काल की बस मे चली बारात बस की ख़राबी के कारण सूरज ढलने के पश्चात ही गाँव पहुँची और नीरजा दुल्हिन के वेश मे, बदायूँ से कार से चल कर इटावा अब (औरैया) के ’मानीकोठी’ नामक ग्राम मे प्रातः साढ़े दस बजे ही पहुँच गई। बारात के विदा करने के दो घण्टे के पश्चात कार चली थी, पर रास्ते मे कहीं भी बारात वाली बस का अता-पता नहीं था। नीरजा ने सोचा कि बारात पहुँच चुकी होगी परन्तु मानीकोठी ग्राम पहुँच कर ज्ञात हुआ कि न तो बारात पहुँची है न ही गाजा-बाजा। वह बिचारी अकेली कार में अपने भाई के साथ बैठी थी। ’नकटा’ की रस्म के लिये नाच-गा कर, रात्रि जागरण कर, घर की महिलायें भोर के समय सोई थीं और कुछ समय पूर्व ही जाग कर नित्य-क्रियाओं मे निमग्न थीं। थोड़ी देर मे शोर मच गया– ’बहू आ गई’, ’बहू आ गई’। शीघ्र ही सारे गाँव मे हड़कम्प मच गया और लड़के-लड़कियों का झुण्ड ’हो’-’हो’ करता, कार को चारों ओर से घेर कर खड़ा हो गया। बड़ा-बड़ा काजल लगाये, गहरे नीले कुर्ते या फ़्रौक और पटरे के चौड़ी पट्टीदार पाजामे पहने लड़कियाँ एवं सिर में ढेर सा कड़ुआ तेल चुपड़े, गहरी नीली कमीज़ और पटरे के नेकर या पाजामा पहने लड़के ’शहर की पढ़ी-लिखी व बड़े घर की लड़की’ की अगवानी के लिये विशेष रूप से सज्जित होकर आये थे। ग्राम की कुछ स्त्रियाँ जो अधिकतर एक धोती मात्र पहने थीं अपने घरों के दरवाज़े खोलकर बाहर झाँकने लगीं।

"जिज्जी! ज़रा आरती की थाली सजा लेना, मैं अभी आती हूँ,” सास ने ग़ुसलखाने के अन्दर से आवाज़ लगाई। तब तक तइया सास (ताई) ने अपनी बड़ी बहू को आवाज़ लगा कर कहा– "अभी बारात तो आई नहीं, भला बहू का परछन कैसे हो पायेगा?"

बड़ी बहू ने पुनः आवाज़ लगा कर चचिया सास से पूछा– "चाची! बारात तो आई नहीं है ऐसे में बहू का क्या हो? परछन के बिना वह घर में कैसे पैर रख सकती है?”

इस समस्या का निदान निकाला गया कि छत पर बने कमरे में बहू को बिठाया जाये। बिजली विहीन गाँव में, १६ जून की भयंकर गर्मीं में, तपती दोपहर की तेज़ लू में, टीन की छत के नीचे, दुल्हिन की भारी साड़ी पहने नीरजा बैठी थी और उसको चारों ओर से घेरे हुए, एकटक उसे घूरते हुए, ज़ू में बन्द जानवर की अनुभूति कराते अनेकों बच्चे और स्त्रियाँ थीं। उस वातावरण में नीरजा को घूँघट किसी वरदान से कम नहीं लगा।

"बहू खीर खा लो। परछन से पहले खाना नहीं मिलेगा"– आग्रह करते हुए नीरजा की जिठानी श्रीमती शकुंतला दुबे ने बड़े लाड़ से एक बेले में खीर भर कर उसे दी। दर्जनों आँखें उसके मुख पर केन्द्रित थीं और ऐसे में अकेले खाना हो, यह उसके बस की बात नहीं थी। एक चम्मच शगुन की खीर खाकर और पानी पीकर नीरजा ने बेला यह सोचकर अपने समीप रखना चाहा कि बाद में एकान्त होने पर खीर खा लूँगी कि इतने में एक बच्ची ने बेला पकड़ा और ’सुड़ुक’, ’सुड़ुक’ करते सारी खीर साफ़ कर दी। उसके पर्स में माँ के बनाये आलू के परांठे लपेट कर रक्खे थ’–पर नसीब में होते तब न। एक शैतान बच्चे ने झपट कर उसका पर्स उठाया और जब तक वह समझ पाती, पर्स खोलकर–  ”यह क्या है” और परांठे उसके हाथ में थे– "चाची! ये मैं खा लूँ?"– पूछने के पहले ही परांठे को मुँह मे भरते हुए उसने पूछा। उस दिन नीरजा ने जाना कि अन्तड़ियाँ भूख से कैसे कुलबुलाती हैं।
  
मोटी दरी पर, ज़मीन पर बैठे-बैठे पीठ अकड़ गई। घूँघट में गर्मी के कारण पसीना धारा प्रवाह बह रहा था। उस दिन ’एड़ी से चोटी तक’ मुहावरे की उत्पत्ति का राज़ खुला। यदि पसीने बहने की प्रक्रिया की निरन्तरता न बनी रहती तो अपने नीचे से होते जल प्रवाह का स्पष्टीकरण देना सम्भव न होता। भगीरथ तपस्या के उपरान्त, सायं सात बजे ’बारात आ गई’ का शोर सुनाई दिया। स्नान ध्यान के उपरान्त घण्टे भर बाद पण्डित जी प्रकट हुए। लकड़ी के एक पटे पर पति का पटुका रख कर, नीरजा की चादर से गठजोड़ करके, ’परछन’ की रस्म पूरी की गई। अब आई मुँह दिखरौनी की रस्म की बारी– प्रातः पाँच बजे की नहाई, यात्रा करके आई, दिन भर पसीने से नहाई, उस समय मेरी छवि क्या रही होगी सोच कर भी सिहरन होती है। पसीने से छितराये बाल, उलझी चोटी, भीगी- गुंजली साड़ी, धूल से भरा चेहरा, पसीने से बह कर माथे की जगह गाल पर लगी बिन्दी, ईश्वर को धन्यवाद है कि वहाँ बिजली नहीं थी।
  
"दुल्हिन तुम्हारे बाप ने तुम्हें का-का दओ है?"–नीरजा के हाथ के सोने के कंगनों को छूकर, मन ही मन उनका वज़न आँकते हुए, गोरी सी दुबली-पतली, लम्बी, पड़ोस की अइया (दादी) ने झापड़ सा मारा।
  
नीरजा इस अप्रत्याशित प्रश्न के लिये प्रस्तुत नहीं थी, अचकचा कर स्तब्ध सी रह गई कि तुरन्त ही उसकी सास श्रीमती पान कुँवर -जो अइया के स्वभाव से परिचित थीं, उसे प्यार से थपकते हुए बोलीं– " लड़की दिन भर गर्मी में तच गई। इसे जल्दी से खिला-पिला कर छत पर ले जाओ।" 

यह कह कर वह अइया की ओर उन्मुख होकर बोलीं– "जिसने अपनी बिटिया दी, उसने तो सब कुछ दिया है।” उनके स्नेह कवच से रक्षित नीरजा भाव-विह्वल होकर अपने सारे कष्ट भूल गई। शीघ्र ही नहाने-धोने एवं कुछ खाने-पीने के बाद वह छत पर पहुँचा दी गई।
  
अब खुली छत पर, स्निग्ध चाँदनी रात्रि में नहाई प्रकृति, गाँव और नहर, बाग़ में रह-रह कर बोलते मोर, आकाशगंगा, सप्तर्षि, ध्रुवतारा, उल्कापात, श्वेत बगुलों के उड़ते पंक्तिबद्ध झुण्ड कितने सुन्दर प्रतीत हो रहे थे। ठण्डी, शीतल वायु ने तन-मन की पीड़ा, थकान और ताप हर लिया। चाँद के ऊपर झीना आवरण का घूँघट डालती एक घटा पवन वेग के साथ आगे बढ़ गई। कितना मनोरम वातावरण था? 
   
नीरजा बच्चों और सम्बंधियों की कन्याओं के साथ खुले आकाश में एक खाट पर बैठ गई। थोड़ी देर के पश्चात उसकी जिठानी एक थाली में भोजन लेकर आईं। एक कटोरी में रसेदार सब्ज़ी, एक सूखी सब्ज़ी और पूड़ी। अभी नीरजा समझ पाती तब तक जिठानी एवं दो लड़कियाँ भी बड़े प्रेम से उसी थाली में भोजन करने आ गईं। अब एक कठिन समस्या थी। नीरजा जिस वातावरण में रहती थी वहाँ भाई-बहन भी एक-दूसरे के साथ भोजन नहीं करते थे। जूठा खाने का तो सोचते भी नहीं थे। नीरजा उन लोगों के प्रेम का अनादर करके उनका दिल भी नहीं दुखाना चाहती थी और उसकी अंतरात्मा इस तरह खाना भी नहीं गवारा कर रही थी। ऐसे समय रात में बिजली न होना वरदान सा लगा। नीरजा ने एक पूड़ी हाथ में पकड़ ली और पूड़ी का एक कौर तोड़ कर दूर से कटोरी तक लाई और बिना सब्ज़ी छुए सूखी पूड़ी खा ली। 
     
कुछ देर के बाद नीरजा की सास ऊपर आईं। उनके हाथ में भैंस का मलाईदार दूध था। वह बड़े प्यार से बोलीं– “बेटा दूध पीलो”। मना करने पर वह समझीं कि बहू शर्म के कारण मना कर रही है अतः अपने आँचल से नीरजा का मुँख ढाँप कर बोलीं– “दूध तो पीना पड़ेगा। लो अब कोई नहीं देख रहा है।" अब एक और समस्या आई। नीरजा घर पर दूध मलाई छानकर पीती थी। उसके मम्मी-पापा चिढ़ाते थे कि “इसके मुँह में मलाई काटती है।"

यहाँ नीरजा की सास अपनी भैंस के दूध को स्वयं अच्छी तरह उबालकर उसमें ढेर सी मलाई डाल कर बड़े प्यार से लेकर आई थीं। पिये बिना कोई चारा नहीं था। नीरजा ने किसी तरह दाँत दबाकर मुँह में मलाई छान कर दूध पिया। बाद में शौचालय में मलाई थूक कर जान बचाई।
    
इसके पश्चात आया अग्नि परीक्षा का समय। नीरजा की स्वच्छ बिस्तर पर सोने की आदत थी। उसके बिस्तर पर छोटे भाई-बहिन भी पैर साफ़ करके ही बैठ सकते थे। पर मानीकोठी में पानी आदि अन्य सुविधायें यथोचित मात्रा में न होने के कारण लोग स्वच्छता की अवधारणा से परिचित नहीं थे। नीरजा के श्वसुर सेवानिवृत्त होकर गाँव में रहने लगे थे और विवाह के लिये अनेकों सम्बंधी कई दिनों पहले से घर पर थे अतः बिस्तर आदि धुलवाने की किसी को आवश्यकता ही नहीं महसूस हुई। लड़कियाँ नीरजा से बार-बार वहाँ बिछे बिस्तर पर बैठने का आग्रह कर रही थीं पर वह हिम्मत नहीं कर पा रही थी और बिना बिछी खाट पर ही लेटना चाहती थी। नीरजा ने सोचा कि अपना बिस्तर बंद खोल कर बिस्तर निकाल कर बिछा लूँ। तभी उसकी जिठानी आईं और उसका बिस्तरबंद उठा कर ले गईं कि “आज तो तुम्हें यहीं के बिस्तर पर सोना है।" नीरजा मन ही मन काँप उठी क्योंकि जिस बिस्तर पर उसे सोने को कहा जा रहा था उसे तो वह अपने पैर से भी छूने की हिम्मत नहीं कर सकती थी। किसी से कहे तो क्या और कैसे? नीरजा मन मसोस कर, किसी तरह अपनी साड़ी के पल्ले से पूरे हाथ छिपाकर और किसी तरह साड़ी में पैरों को समेट कर चारपाई पर लेट गई कि उसका कोई अंग बिस्तर से न स्पर्श करे।  
    
नीरजा अभी तंद्रिल ही थी कि अचानक उसकी बड़ी जिठानी आईं और उन्होंने एक अत्यंत गंदी, महकती चादर उसके ऊपर डाल दी। नीरजा की घ्राण शक्ति वैसे ही अत्यंत तीव्र थी, इस चादर की महक से उसे लगा उसका दम घुट जायेगा। बिना सोचे-समझे उसका हाथ ऊपर गया और चादर ज़मीन पर गिरी। बड़ी जिठानी हँसती हुई बोलीं– “मैंने सोचा लला महेश यहाँ नाय हैं तो उनकी चादर ही तुम्हें उढ़ाय दें।"
    
किसी तरह रात बीती। सुबह चार बजे उठकर नीरजा नहा-धोकर तैयार हुई और फिर ससुराल के स्नेह से आप्लावित अपने फुफेरे भाई सदन दद्दा के साथ कार से वापस आ गई। नीरजा को ससुराल में सबका इतना प्यार मिला कि उसने अपने मन में निश्चय किया कि ससुराल में जो कमियाँ हैं उन्हें प्यार से दूर करेगी। जब तक ससुराल में सुंदर, स्वच्छ और सुखद वातावरण नहीं बना, नीरजा ने अपनी माँ या बहिन को भी इस विषय में कुछ नहीं बताया था। आज मानीकोठी गाँव को देखकर कोई कल्पना नहीं कर सकता कि यह वही गाँव है जहाँ उसका विवाह हुआ था। उसे गर्व है कि वह अपने माता-पिता के संस्कारों के कारण अपनी ससुराल छोड़ कर भागी नहीं। 


 

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