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अस्तित्व

मैंने ख़ुद को
एक अरसे से नहीं देखा ...
या शायद ख़ुद को
कभी नहीं देखा।

 

एक अनकहा-सा
दबाव रहता है...
कभी मर्यादाओं का ..
कभी रिश्तों का ..
जब देखा जो देखा
उनकी नज़र से देखा।

 

कभी बेटी
कभी बहन
कभी बहू
कभी पत्नी
कभी माँ
कभी सखी
ये सारे उद्बोधन ..
हो गए हावी ...
और मैं भूल गई ..
मैं मानस भी हूँ ..
मैं भूल गई ....
इन सब रिश्तों से परे
मैं ....हाँ मैं भी हूँ ..और जीत गई
समाज की मानसिकता।
जकड़ दिया गया मुझे
नारी होने के दायरे में
अब मैं मानस नहीं ..
बस एक नारी हूँ।
अनगिनत रिश्तों ..
और मर्यादाओं के
बोझ से दबी ...
अपनी कुंठाओं
से निरंतर संघर्ष करती ..
बस एक नारी ...

 

जब देखा ख़ुद को
बस एक नारी देखा।
कभी अबला
कभी सबला
कभी तितली
कभी चिड़िया
कभी धरती
कभी शक्ति
कभी भक्ति
कभी बस 'चीज़'
बस ये ही रह गई
पहचान मेरी ...
खो गया कहीं
*अस्तित्व* मेरा ...
खो गया वो मेरा
साधारण-सा मन ...
खो गया अहसास
मैं भी मानस हूँ पहले ...
धुँधला गया है ये सच
मेरे भी है सपने ...
सादा से
चंचल से
शरारती से
निश्छल से
और रह गया एक
सच बाकी ....
नारी ही हूँ और कुछ नहीं
और कुछ नहीं
किसी ने कभी देखा...
एक अरसे से मैंने
ख़ुद को नहीं देखा ...
या शायद ख़ुद को
कभी नहीं देखा।

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