अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

चिता जलाना बन्द भी हो

आतंकवाद पर नित नए
अब ये राग सुनाना बन्द भी हो।
रोज़ खुदे ना कब्र नई
हर दिन चिता जलाना बन्द भी हो॥

 

जो मरते हों दहशतगर्दी से
वो ना तेरे ना मेरे हम सबके हैं,
इस शिक्षित सभ्य समाज के
वो तो सबसे निचले तबके हैं।
उनका ना खुदा ना ईश्वर ही
ना मजहब ना कोई चेहरा है,
साँसों पर उनकी फिर भी
जाने क्यॅू आतंक का ही पहरा है।
ना यहूदी सिख मुस्लिम ना
तो हिन्दू और ना ही ईसाई हैं,
स्वंय विराजे ईश्वर उनके हृदय
वो ख़ुदा की ही परछाई हैं।
नफरत की इस जलती अग्नि की
ला अब ये मंद भी हो॥

 

मौत का ख़ौफ़ ले जीते हैं जो
उनकी तो कोई पहचान नहीं,
बेबस मासूमों के हत्यारों को
करे क्षमा कभी भगवान नहीं।
ले शस्त्र हाथ जो समझ रहे
जन्नत उनको ऐसे मिल जायेगी,
नाज़िल हो आज़ाबे ख़ुदा उनपर
चींटी भी उन्हें ना खायेगी।
सौगाते मौत बाँटते दुनिया में
हो मदहोश हूरों के सपनों में,
करते स्नान प्रतिदिन प्रतिपल
दरिन्दे लाल रक्त के झरनों में।
बस मौत के सौदागर ही नहीं
किसी के तुम फरज़न्द भी हो॥

 

हम पूजें राम और अल्लाह को
पर कब माना उनका कहना,
पढ़ते रहे कुरान और गीता पर
आया क्या इंसानों सा रहना।
सोचो मन्दिर मस्जिद के झगड़ों से
क्या पाया क्या खोया है,
पूछो पाई जन्नत क्या उसने जो
अँधियारे में कब्र के सोया है।
दहशत से मिलें प्रभु गर तो क्यॅू
करते हवन यज्ञ पढ़ते नमाज़,
किस दिशा को जा रहा देखो अब
तथाकथित ये सभ्य समाज।
खून की होली मातम का मुहर्रम
हर पल मनाना बन्द भी हो

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं