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दलदल (अमिताभ वर्मा)

पहला दृश्य

(स्कूल में बच्चे प्रार्थना-गीत गा रहे हैं। अन्तिम अन्तरे के गायन के साथ प्रार्थना समाप्त होती है।)

महिला इन्स्ट्रक्टरः 

बच्चो, अब हम रोज़ की तरह वर्जिश करेंगे। वर्जिश करना, यानी कसरत करना हमारी सेहत के लिए उतना ही ज़रूरी है, जितना भोजन करना। कोई सिर्फ़ खाता रहे और कसरत बिल्कुल भी न करे, तो वह कैसा हो जाएगा?

बच्चा 1: 

एकदम मोटे हाथी जैसा!

(बच्चे हँसते हैं।)

महिला इन्स्ट्रक्टरः 

हाथी जैसा मोटा! लेकिन बच्चो, मोटे दिखनेवाले भारी-भरकम जानवर भी कसरत करते हैं! हाथी को ही लो। कितना भारी वज़न उठा लेता है, कितना ज़ोर लगा लेता है, कितनी दूर चल लेता है!

बच्चा 2: 

मैडम, सरकस में तो हाथी कुर्सी पर भी बैठता है, फ़ुटबॉल भी खेलता है, और नाचता भी है!

(बच्चे फिर हँसते हैं।)

महिला इन्स्ट्रक्टरः 

बिल्कुल ठीक! तो जब हाथी जैसा बड़ा जानवर भी कसरत करता है, तो हम आलस क्यों करें? है न! चलो, खड़े हो जाओ एक लाइन में और शुरू करो ड्रिल ... वन ... टू ... थ्री ... फ़ोर ... वन ... टू ... थ्री ... फ़ोर ... 

(महिला इन्स्ट्रक्टर हर मुद्रा के लिए सीटी बजाने लगती है, एक लड़की उसी ताल में ड्रम बजाने लगती है, और बच्चे कसरत करने लगते हैं।)

टीचर सुषमा:

 नीलम मैडम, वह देखिए सुजाता को!

टीचर नीलमः 

सुजाता को? सुजाता कहाँ है सुषमा मैडम?

सुषमा: 

वह देखिए ना! वह, पाँचवी क्लास की कतार में। आगे से आठवीं लड़की। वह सुजाता ही तो है!

नीलम (हैरत से): 

वह लड़की? ... वह सुजाता है? ... (अविश्वास से) नहीं! 

सुषमा: 

अरे हाँ नीलम मैडम, वह सुजाता ही है! पहले तो मैं भी चकरा गई थी उसे देख कर!

नीलमः 

हाँ, यक़ीन ही नहीं होता सुषमा मैडम! लगता है गर्मी की छुट्टियों में ख़ूब खा-पीकर आई है। पहले तो वह दुबली-पतली, छरहरी-सी लड़की थी। अब कैसी गुलथुल लग रही है!

सुषमा: 

गुलथुल नहीं, स्थूल! उसकी ऊँचाई तो वही है, लेकिन शरीर कैसा अजीब-सा फैल नहीं गया है?

नीलमः 

वाक़ई, सुजाता तो किसी वयस्क औरत की तरह दिख रही है, जैसे उसकी शादी हो गई हो! लेकिन सिन्दूर तो लगाया ही नहीं है उसने!

सुषमा (हँसते हुए): 

नीलम मैडम, अब आप के वह पुलिसवाले हैं तो आपको भी इनवेस्टिगेशन करने की आदत पड़ने लगी है। अरे भाई, सुजाता खा-पी कर हो गई होगी मोटी!

(बच्चों की कसरत समाप्त हो जाती है।)

नीलम (ठण्डी साँस ले कर, गम्भीरता से): 

हाँ, शायद ऐसा-ही हुआ हो। शायद सुजाता खा-पी कर मोटी ही हो गई हो। चलिए, एसेम्बली ख़त्म हो गई, चलें।

सुषमा: 

चलिए! ... नीलम मैडम, एक बात समझ में नहीं आती। 

(दोनों साथ-साथ चलने लगती हैं।)

नीलम (इठलाते हुए): 

सुषमा मैडम, हम टीचर हैं तो इसका मतलब यह तो नहीं कि दुनिया की हर बात हमारी समझ में आ ही जाए। अब अगर आप अपना सवाल बताएँ, और मुझसे इतने फ़ॉर्मल तरीक़े से बात न कर के बेतकल्लुफ़ी से बातें करें, तो मैं कोशिश करूँगी, कि जो बात आपकी समझ में नहीं आई, वह अगर मेरी समझ में आई हो, तो उसे आपको भी समझा दूँ!

(दोनों हँसती हैं।)

सुषमा: 

ठीक है, नीलम! आपके पति पुलिस में बड़े ओहदे पर हैं। आपने डॉक्टरेट की है। आप चाहतीं तो किसी बड़े ऑफ़िस में, किसी बड़ी संस्था में, किसी बड़े पद पर काम कर सकती थीं। मोटी तनख़्वाह होती, ढेर सारी इज़्ज़त होती, ख़ूब सारा पावर होता। फिर, आपने इस सरकारी स्कूल में साधारण-सी टीचर बनना क्यों पसन्द किया?

नीलम (हँसती है): 

वाह, लगता है बड़ा सोच-विचार किया है तुमने मेरे बारे में! ठीक है, तुम्हारा सवाल बड़ा जायज़ है। लेकिन मेरे जवाब देने से पहले तुम यह बताओ कि तुमने कॉर्पोरेशन के इस स्कूल में नौकरी क्यों की?

सुषमा: 

पैसों की ज़रूरत थी। औरतों के लिए टीचरी सहज है, सो बी एड् किया। और, कहीं और नौकरी नहीं मिली तो यहीं कर ली। सरकारी नौकरी है, तो एक सिक्योरिटी तो है ही, तनख़्वाह भले ही कम हो!

नीलमः 

बस, यही बात है?

सुषमा: 

हाँ, यही बात है!

नीलमः 

नहीं, यही बात नहीं है।

सुषमा:

यही बात नहीं है! ... क्या मतलब? यही बात है भाई, और क्या बात हो सकती है?

नीलमः 

अगर तुमने नौकरी सिर्फ़ पैसे कमाने के लिए ही की है, तो बहुत-से और काम कर सकती थीं तुम, जिनमें यहाँ से ज़्यादा पैसे मिलते। तुम जवान हो, सुंदर हो! कहीं रिसेपप्शनिस्ट लग जातीं, मॉडलिंग कर लेतीं, या ...

सुषमा (संकोच से): 

नहीं-नहीं-नहीं-नहीं, उस तरह के काम मुझे नहीं करने!

नीलमः 

बस! वही बात मेरे साथ भी है! तुम्हें शारीरिक बनावट की वज़ह से मिलने वाले काम से एतराज़ है और मुझे हर उस तरह के काम से चिढ़ है जो मुझे मेरे पति के ऊँचे ओहदे की वज़ह से ख़ैरात में मिले, या जिसका मक़सद बड़े-बड़े खोखले लेक्चरों की आड़ में रुपया बटोरना हो। ग़ौर से सोचो सुषमा, तो तुम्हारे-मेरे कन्धों पर कितनी बड़ी ज़िम्मेदारी है! अब यहाँ पढ़नेवाले बच्चे किसी धन्ना सेठ की औलाद तो होते नहीं! बहुत-सी कतर-ब्यौंत करनी पड़ती होगी उनके परिवार को। ऐसे बच्चों को आसानी से पैसा कमाने के ग़लत रास्तों के प्रति आगाह करना, उनमें अच्छे संस्कार डालना, उनमें सीखते रहने के प्रति रुचि पैदा करना, और उन्हें इस तरह गढ़ना कि बड़े हो कर वे बड़ी-से-बड़ी ज़िम्मेदारी बिना किसी हिचकिचाहट के, पूरी ईमानदारी के साथ निभाएँ - यह सब हमें ही तो सिखाना चाहिए।

(थोड़ी देर दोनों शान्त चलती हैं।)

सुषमा: 

बी एड् करने के बाद पहली बार इतनी गहराई से सोची है यह बात! सच कहती हैं आप!

नीलमः 

चलो, तो आ गई बात तुम्हारी समझ में! अच्छा, अब मुझे भी एक बात बताओ।

सुषमा: 

जी, पूछिए!

नीलमः 

वह सुजाता, छुट्टी के डेढ़ महीनों में जो दुबली-पतली, चंचल, कमसिन लड़की से बदल कर वयस्क, परेशान औरत नज़र आने लगी है, वह क्या तुम्हारी क्लास में है? तुम पाँचवी क्लास को ही पढ़ाती हो न?

सुषमा: 

हाँ, सुजाता मेरी-ही क्लास में पढ़ती है।

नीलमः 

कैसी है वह पढ़ाई में? और बाक़ी एक्टिविटीज़ में?

सुषमा (सोचते हुए): 

पढ़ाई में ... पढ़ाई में औसत है, पर खेल-कूद में बड़ी तेज़ है। बिजली की तरह दौड़ती है और जंगली बिल्ली की तरह फुर्र से पेड़ पर चढ़ जाती है!

नीलमः 

लेकिन आज तो उसे हाथ-पैर हिलाने में भी आलस आ रहा था। कुछ बात है। पूछो उससे।

सुषमा: 

ऐसा करें, आज लायब्रेरी पीरियड में उससे बात करें? आप फ़्री हों तो आप-भी बात कर लेंगी।

नीलमः 

कब है लायब्रेरी पीरियड?

सुषमा: 

थर्ड पीरियड है।

नीलमः 

हाँ, मैं फ़्री हूँ, उसी समय करेंगे सुजाता से बात!

दूसरा दृश्य

(नीलम, सुषमा और सुजाता एक कमरे में हैं। बाहर बच्चों के खेलने की आवाज़ आ रही है।)

नीलमः 

तो सुजाता, तुम कह रही हो कि तुम्हें कोई परेशानी नहीं है, हूँ?

सुजाता (धीरे से): 

जी!

नीलमः 

घबराओ मत! मैं भी औरत हूँ। सुषमा मैडम भी औरत हैं। हम दोनों उस उम्र से गुज़र चुकी हैं जिससे तुम गुज़र रही हो। हमें मालूम है बड़े होने पर कैसा लगता है, क्या होता है!

सुजाता (धीरे से): 

जी! मुझे कोई परेशानी नहीं है।

नीलमः 

तो ठीक है। ... बढ़िया है। ... तुम्हें कोई परेशानी नहीं है! ... और क्या चाहिए? ... गुड! जाओ, अपनी क्लास में जाओ।

सुजाता (धीरे से): 

जी ... जी ... जी ... जी ... (सुबकने लगती है)

सुषमा: 

रोओ मत सुजाता!

नीलम (स्नेह से): 

रोने दीजिए इसे सुषमा मैडम, रोने दीजिए! मैं इसकी पीठ पर हाथ फेर रही हूँ न! बेटी, मैं तुम्हारी टीचर ही नहीं हूँ, एक माँ भी हूँ। मैं तुम्हारे साथ हूँ।

(सुजाता थोड़ी देर तक फूट-फूट कर रोती है।)

नीलमः 

मैं कुछ पूछ कर तुम्हारे घाव कुरेदना नहीं चाहती सुजाता! लेकिन, लगता है तुम किसी बहुत बड़ी परेशानी में हो। और, शायद परेशानी कम होने के कोई आसार भी नहीं हैं। है न यही बात?

सुजाता (सुबकते हुए): 

जी!

नीलमः 

और, एक बात और! अगर किसी के बुरे बर्ताव से, किसी की ज़्यादती की वज़ह से तुम्हें परेशानी होती है, तो शर्म उसे आनी चाहिए, तुम्हें नहीं, है ना?

सुजाता (सुबकते हुए): 

जी!

नीलमः 

गाँधीजी ने कहा था, अत्याचार करना पाप है, तो अत्याचार सहना भी पाप है!

सुजाताः 

लेकिन तब क्या करें जब ग़लत काम करने वाला कोई अपना सगा ही हो?

नीलमः 

अत्याचार तो अत्याचार है, चाहे सगा करे, चाहे बड़ा, चाहे बलवान। ग़लत फ़ायदा तो बेजा फ़ायदा ही है न!

सुषमा: 

और इस उम्र में? अभी कोई ग्यारह-बारह साल की होगी तुम! अगर इसी उम्र से कोई तुम्हारा ग़लत फ़ायदा उठाने लगे, तो तुम्हारी ज़िंदग़ी तो पहाड़ बन जाएगी! धीरे-धीरे या तो तुम ग़लत बातों, ग़लत रीति-रिवाज़ों को ही सही मानने लगोगी, या आत्महत्या करने की कोशिश करोगी, या फिर अपना मानसिक सन्तुलन खो बैठोगी! तीनों ही बातें कितनी ग़लत होंगी! मच्छर काटता है, तो उसे काटने थोड़े-ही देते हैं? ठण्ड लगती है तो स्वेटर पहनते हैं कि नहीं? जब तुम भगवान की बनाई प्राकृतिक विपत्तियों से आसानी से निपट लेती हो, तो यह तो आदमी की पैदा की हुई परेशानी है! इसे क्यों बर्दाश्त कर रही हो? ज़रा सोचो, सिर्फ़ दो महीने पहले तुम कितनी चंचल लड़की थीं! इधर-से-उधर कूदती फिरती थीं। हँसती-गाती रहती थीं। आज देखो अपनेआप को! हमें वह पुरानी वाली सुजाता चाहिए!

सुजाता (फूट-फूट कर रोते हुए): 

वह सुजाता अब आपको नहीं मिलेगी ... किसी को भी नहीं मिलेगी ... मर गई वह सुजाता ... और अब यह घिनौनी सुजाता भी मर जाएगी!

नीलमः 

किसने मारा उस सुजाता को?

सुजाताः 

बाबूजी ने!

(संगीत से शॉक का इफ़ेक्ट होता है। साथ ही "बाबूजी ने" की गूँज तीन-चार बार सुनाई पड़ती है। थोड़ी देर ख़ामोशी रहती है।)

सुषमा: 

बाबूजी ने?

सुजाता (कठोर स्वर में): 

जी, मेरे अपने सगे बाबूजी ने!

नीलमः 

तुम्हारी माँ को पता है यह?

सुजाताः 

मेरी माँ दो साल पहले ही मर गई।

नीलमः 

तुम लोग कितने भाई-बहन हो?

सुजाताः 

मैं हूँ, और मुझसे तीन साल बड़ी एक बहन है।

सुषमा: 

क्या करते हैं तुम्हारे बाबूजी?

सुजाताः 

सब्ज़ी की दुकान चलाते हैं।

सुषमा: 

अकेले?

सुजाताः 

हाँ।

नीलमः 

तो, तुम्हारी बहन क्या करती है?

सुजाताः 

चूल्हा-चौका करती है।

नीलमः 

तुम्हारी माँ के मरने के बाद क्या हुआ?

सुजाताः 

माँ मर गई, तो हम दोनों बहन बहुत रोए। पास-पड़ोस वालों ने मदद की माँ की मिट्टी उठाने में। रात में बाबूजी ख़ूब पी कर आए। पहले भी पीते थे। पी कर लौटते थे, तो माँ को पीटते थे। उस रात माँ तो थी नहीं। माँ जहाँ सोती थी, वहाँ गए, और उस जगह को लाठी से पीटने लगे पागलों की तरह। उसी दोपहर माँ की मिट्टी उठी थी, और उसी रात बाबूजी में यह पागलपन समाया! मैं तो डर गई, लेकिन मेरी बहन ने हिम्मत की। बाबूजी के पास जा कर उनका हाथ पकड़ कर रोकने लगी, जैसे माँ रोकती थी। हे भगवान! बाबूजी में तो जैसे शैतान समा गया। बोले, शान्ति ... मेरी माँ का नाम शान्ति था ... बोले, शान्ति तो चली गई मेरे जीवन में अशान्ति कर के, अब से तू ही मेरी शान्ति है।

सुषमा: 

फिर?

सुजाताः 

फिर क्या! मैं तो भाग गई। दूसरे दिन सुबह देखा, तो बहन गुमसुम थी। न हँस रही थी, न रो रही थी। मैं कुछ समझी, कुछ नहीं समझी। एक तो माँ के जाने का दुःख, ऊपर से ...

नीलमः 

तुम लोगों ने किसी से शिक़ायत नहीं की?

सुजाताः 

नहीं, हमारी बात कौन मानता मैडम? फिर बाबूजी को भी शायद कुछ ग़लत लगा। एक-डेढ़ महीने तक ठर्रा नहीं पिया उन्होंने। हमने सोचा, अब वह फिर उस तरह नहीं करेंगे। लेकिन बाद में तो वह रोज़ ही पी कर आने लगे, और रोज़ वही-सब करने लगे।

नीलमः 

उस समय तुम्हारी बहन कोई तेरह साल की रही होगी?

सुजाताः 

हाँ, और क्या मैडम! बड़ी अजीब-सी हो गई वह। सजने-धजने भी लगी, जैसे ब्याह होने पर सजते हैं। बाबूजी उसके लिए कभी समोसा लाते, कभी मिठाई, कभी कपड़ा ... लेकिन यह था कि मुझे भी मिठाई-समोसा देती थी। मुझे सुबह-सुबह तैयार कर के स्कूल भेज देती, और कहती, ख़ूब खेल-कूद कर आराम से अइयो! मैं स्कूल से लौटती तो थक कर सो जाती। पता नहीं बाबूजी कब आते रात में। सुबह जब मैं स्कूल जाती, बाबूजी सोए रहते। इतवार को भी किसी-न-किसी तरीक़े से मैं बच ही जाती!

सुषमाः 

तो तुम फँस कैसे गई उनके चक्कर में?

सुजाताः 

धीरे-धीरे बाबूजी और मेरी बहन के बीच क्या है, मुहल्ले में सबको पता चल गया। सब बाबूजी-बहन को नीची निगाहों से देखने लगे। ताना मारने लगे। बाबूजी का मिज़ाज गर्म रहने लगा। अभी गर्मी की छुट्टियों में मैं एक दोपहर घर के बाहर खड़ी थी। कोई लड़का साइकिल पर जा रहा था। उसने मुझे देख कर सीटी बजाई, गाना गाने लगा। बाबूजी सामने से आ रहे थे। उन्होंने देख लिया। लड़के को साइकिल से पटक कर बहुत पीटा। फिर घर आए। मुझे देखा, तो चौंक गए। बोले, मैं तो समझा था कि शीला है। शीला मेरी बहन का नाम है न! फिर बोले, तुझमें और शीला में ज़्यादा फ़र्क नहीं दिखता। 

नीलमः 

ओह!

सुजाता (घृणा से): 

उस रात के बाद ... उस रात के बाद ... अब क्या बोलूँ, घिन आती है! मना करो, तो मारते-पीटते हैं। घर में बन्द कर जला देने की धमकी देते हैं। आज स्कूल का पहला दिन था, सो उनको पता नहीं चला और बहन ने स्कूल भेज दिया। घर वापस जाऊँगी तो पता नहीं क्या होगा। शायद आप मुझे कल से देख भी न पाएँ।

सुषमा (दुख से): 

ओह!

नीलमः 

सुजाता, घबराओ मत! इस तरह के हादसे सिर्फ़ तुम्हारे साथ ही नहीं हो रहे। दुनियाभर में लाखों-करोड़ों बच्चे – लड़के और लड़कियाँ दोनों – ऐसे हैं जो किसी परिचित की हवस का शिकार बनते हैं। भाई, बहन, चाचा, चाची, मामा, मामी, यहाँ तक कि पैंसठ साल के एक दादाजी की घिनौनी हरक़तों के बारे में भी हाल में पढ़ा था मैंने। ऐसे अपराधी बड़े चालाक होते हैं। उन्हें देख कर अन्दाज़ भी नहीं लगा सकते कि उनका एक रूप इतना घिनौना भी होगा। ऐसे लोग अपने शारीरिक बल, रिश्ते में ऊँचे दर्जे, या लोकलाज का डर दिखा कर बच्चों को सताते हैं। अबोध शिशुओं पर भी अत्याचार होने की ख़बर पढ़ी गई है।

सुषमा (हैरत से): 

अच्छा?

नीलमः 

हाँ! सुषमा, हमारी और बच्चों के अभिभावकों की यह ज़िम्मेदारी बनती है कि हम बच्चों को जागरूक बनाएँ। उन्हें सिखाएँ कि किसी अजनबी के पास अकेले में न जाएँ, अजनबियों की गाड़ी में लिफ़्ट न माँगें, उन्हें अपने शरीर को न छूने दें, और कुछ ग़लत लगने पर चिल्ला कर लोगों का ध्यान अपनी तरफ़ खींचें। डॉक्टर के अलावा किसी को भी अपने शरीर के छुपे अंग न दिखाएँ। ... और इसके बावजूद कोई अनहोनी घट ही जाए, तो उसे छुपाएँ नहीं, परिवार के बुज़ुर्गों को और पुलिस को उसके बारे में तुरन्त बताएँ।

(महिला कर्मी कमरे में आती है।)

महिला कर्मीः

मैडम, सुजाता से मिलने कोई आया है। कॉमन रूम में है।

सुजाता (डर कर): 

हे भगवान! नहीं नहीं!

नीलमः 

डरो नहीं सुजाता, तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगा!

तीसरा दृश्य

(सुजाता और नीलम स्कूल के गेट पर खड़ी हैं।)

सुजाताः 

मैडम, मेरे बाबूजी को पुलिस पकड़ कर ले गई, लेकिन मेरी तो बदनामी हो ही गई न!

नीलमः 

सुजाता, अगर हम तुम्हारे बाबूजी को नहीं पकड़वाते, तो वह तुम्हारा यौन शोषण करते रहते। क्या तब तुम्हारी बदनामी नहीं होती? क्या तुम्हारे पढ़-लिख कर अपने पैरों पर खड़े होने के सपने चूर-चूर नहीं हो जाते? अब ज़्यादा-से-ज़्यादा क्या होगा? अगर लोगों को पता चलेगा, तो उन्हें साथ-ही यह भी तो मालूम पड़ेगा कि तुमने ख़ुद इस यौन शोषण के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई, कीचड़ से बाहर निकलने की ख़ुद हिम्मत की। तुम्हारा चरित्र ख़राब नहीं माना जाएगा, अच्छा माना जाएगा, हिम्मत भरा! वैसी हिम्मत, जो हर किसी में होनी चाहिए। तुम दलदल से बाहर निकल आई हो सुजाता, इस पर अफ़सोस मत करो। आगे बढ़ो। और कोशिश करो, और किसी बच्चे का शोषण न हो सके। यह दलदल बड़ा भयंकर है, बड़ा ही भयंकर ...  

(सुजाता एक बार नीलम की ओर देखती है और फिर आसमान की ओर ताकने लगती है।)
 

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