अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

शम्मा नहीं जलाऊँगा...

मासूमों की मौतों पर अब शम्मा नहीं जलाऊँगा।
तख़्ती लेकर हाथों में कोई राग नया ना गाऊँगा॥

 

सदियों से हम ऐसे ही अब तक ये करते आये हैं,
अपनों को फिर भी हम सब यूँही खोते आये हैं।
निर्दोषों की लाशों पर जो रोते हैं ग़म उनका है,
अब तक हम यूँही बस अपने अश्क़ बहाते आये हैं।
हर बार नया सर होता है पर गोली वही पुरानी है,
सिसक रहा है बचपन अब तो सहमी हुई जवानी है।
शामिल हूँ मैं ग़म में उनके पर मातम नहीं मनाऊँगा॥

 

क़त्ल हुआ मासूमों का जब हर ओर चीख पुकार हुई,
काँप उठी धरती भी उस दम ऐसी प्रबल चित्कार हुई।
विद्या के मन्दिर में ऐसा खेल घिनौना वो खेल गए,
पर हिम्मत ना हारी बच्चों ने गोली उनकी झेल गए।
मासूमों पर क़हर क्यूँ ढाया कहकर अल्लाह हू अकबर,
इस करनी पर मिल पायेगी क्या ठौर ख़ुदा के दर पर।
गर यही है फ़रमाने ख़ुदा तो ना ईद कभी मनाऊँगा॥

 

लौट गए घर को सब अपने नमाज़े जनाज़ा पढ़ते ही,
भूल गए हर दर्दोग़म नया सूरज आकाश में चढ़ते ही।
घर में पाला साँप तो उसको रहम न तुमपर आयेगा,
विषधर है जो इक ना इक दिन काट तुमको खायेगा।
इस्लाम हुआ बदनाम पुनः ज़ख़्मी क़ुरान की आयत है,
कर्बला के शहीदों से क्या मिली इन्हें यही विरासत है।
शब्द हुए हैं मौन रजत अब और न कुछ कह पाऊँगा॥

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं