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अपूर्ण विराम

 

नगर निगम का बुलडोज़र ठीक आठ बजे पहुँचा। भीड़ तमाशा देखने खड़ी थी, पर एक बूढ़ा आदमी अपनी जर्जर किताबों की दुकान के सामने निर्विकार बैठा था।

अधिकारी ने कहा, “बाबा, हट जाइए। आधे घंटे में सब मलबा हो जाएगा।”

बूढ़ा मुस्कुराया, ”चालीस साल पहले भी यहीं मलबा था, तब मैंने ईंटें नहीं, किताबें रखी थीं।”

बुलडोज़र गरजा। लकड़ी की अलमारियाँ बिखर गईं। धूल का बादल उठा। लोग मोबाइल निकालकर वीडियो बनाने लगे। तभी मलबे से एक छोटी बच्ची दौड़ती हुई आई। उसके हाथ में धूल से सनी एक कहानी की किताब थी। उसने काँपती आवाज़ में पूछा, “दादाजी, यह दुकान फिर खुलेगी न? मैंने अभी यह किताब पूरी नहीं पढ़ी।”

बूढ़े ने किताब ली। उस पर जमी धूल धीरे-धीरे फूँककर हटाई, जैसे किसी बच्चे के माथे से उदासी हटा रहा हो। फिर बोला, “दुकानें टूटती हैं, बिटिया; कहानियाँ नहीं।”

अगली सुबह उसी टूटी हुई जगह पर एक पुरानी चादर बिछी थी। उस पर वही किताबें फिर सजी थीं, और सबसे ऊपर एक काग़ज़ रखा था—“कल दीवारें गिर गई थीं, आज हिम्मत ने फिर दुकान खोल ली है।” उस दिन लोगों ने किताबें कम ख़रीदी, उम्मीद ज़्यादा ले गए।

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