बंद घड़ी
कथा साहित्य | लघुकथा कृति आरके जैन1 Sep 2026 (अंक: 301, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
पुराने मकान की सफ़ाई करते समय बेटे को पिता की वर्षों पुरानी बंद घड़ी मिली। उसने हँसते हुए कहा, “इसे फेंक देते है, अब किसी काम की नहीं।”
कोने में बैठी दादी ने घड़ी हाथ में ली, उसे सहलाया और बोली, “यह बंद आज नहीं हुई . . . जिस दिन तुम्हारे पिता ने पहली तनख़्वाह से अपने लिए कुछ ख़रीदने का सपना छोड़ा था, उसी दिन इसका समय रुक गया था।”
बेटा चौंका।
दादी आगे बोलीं, “उस दिन उन्होंने घड़ी नहीं ख़रीदी। तुम्हारी फ़ीस भर दी थी। फिर हर साल कोई न कोई ज़रूरत पहले आ जाती रही।”
बेटे ने घड़ी को ग़ौर से देखा। उसके शीशे पर खरोंचें थीं, पर भीतर का समय जैसे अब भी पिता की मुस्कान सँजोए बैठा था। उसी शाम वह घड़ी ठीक करवाकर पिता की कलाई पर बाँधने लगा। पिता मुस्कुराकर बोले, “अब इस उम्र में इसका क्या करूँ?”
बेटे ने पहली बार पिता का हाथ कसकर थामा और कहा, “घड़ी समय नहीं बताएगी . . . यह बताएगी कि मेरा समय किसने बनाया था।” पिता की आँखें नम थीं। कुछ घड़ियाँ चलना बंद नहीं करतीं, वे बस अपना समय अगली पीढ़ी के नाम लिख देती है।
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