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हस्ताक्षर

 

वृद्धाश्रम में रहने वाले एक बुज़ुर्ग रोज़ सुबह सबसे पहले रजिस्टर खोलते और अपने काँपते हाथों से अपने नाम के आगे हस्ताक्षर करते थे। 

एक दिन वहाँ आए एक स्वयंसेवक ने उत्सुकता से पूछा, “दादाजी, यहाँ तो कोई रोज़ जाँच भी नहीं करता। फिर आप हर दिन हस्ताक्षर क्यों करते है?” 

बुज़ुर्ग हल्का-सा मुस्कुराए और बोले, “आदत है बेटा . . . बरसों पुरानी आदत।”

कुछ पल चुप रहने के बाद उनकी आँखें कहीं दूर टिक गईं। फिर धीमे स्वर में बोले, “पूरी ज़िंदगी बैंक के काग़ज़ों पर, ज़मीन के दस्तावेज़ों पर, मकान के रजिस्ट्री पत्रों पर . . . न जाने कितनी बार हस्ताक्षर करता रहा। हर हस्ताक्षर किसी न किसी ज़िम्मेदारी या अधिकार का प्रतीक था। लेकिन जिस दिन आख़िरी मकान भी बेटे के नाम कर दिया, उसी दिन मेरे नाम का कमरा बदल गया . . . और मैं इस वृद्धाश्रम में आ गया।”

स्वयंसेवक के पास कोई शब्द नहीं बचे। वह केवल बुज़ुर्ग के चेहरे को देखता रह गया। 

बुज़ुर्ग ने धीरे से रजिस्टर बंद किया, गहरी साँस ली और बोले, “अब यहाँ रोज़ इसलिए हस्ताक्षर करता हूँ, ताकि कम से कम एक जगह तो हर दिन यह दर्ज होता रहे कि मैं अभी ज़िन्दा हूँ . . . मेरा अस्तित्व अभी पूरी तरह मिटा नहीं है।”

यह सुनते ही रजिस्टर का वह साधारण-सा पन्ना अचानक बहुत भारी हो गया। 

उस दिन स्वयंसेवक ने पहली बार समझा—सबसे कठिन हस्ताक्षर वे नहीं होते जो संपत्ति बाँटते हैं, बल्कि वे होते हैं जो हर दिन अपने ही अस्तित्व का प्रमाण देते हैं।

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