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बुंदेलखंड के लोकगीतों में राम केवल कथा नहीं, जीवन है 

 

राम नाम लोक की श्वास-प्रश्वास में रचा बसा है। यह ऐसा नाम है जिसके बिना न तो भारत की कल्पना की जा सकती है और न भारतीयता की। लोक में राम कहाँ नहीं है! हर जगह मौजूद है, कण-कण में व्याप्त हैं। बुंदेलखंड की माटी में तो पग-पग पर उनके पदचिह्न अंकित है। उनके जीवन का सबसे कठिन समय यहीं व्यतीत हुआ था। मुश्किल वक़्त में यहाँ के लोगों ने उनका भरपूर साथ दिया था। आज भी यहाँ के लोगों में उनसे वैसा ही लगाव है। वे कथा के राम से ज़्यादा लोक के राम के रूप में अधिक मान्य है।

बुंदेलखंड में रचे-बसे ऐसे नायक हैं जो हर माँ के दुलारे हैं।

लोक परंपरा में जब भी कोई बालक जन्म लेता है, वह बच्चा राम होता है और जच्चा माँ कौशल्या। सोहर गीतों में बस राम ही राम होते हैं और दुलारने वाली माँ कौशल्या। इसी सोहर गीत में ही देख लीजिए:

“जसरथ जू की रानियाँ, रामा लेंय कइयाँ
जसरथ जू की रानियाँ . . . 
कौना के रामा भए, कौना के लछमनिया
जसरथ जू की . . . 
कौशल्या के रामा भए, सुमित्रा के लछमनिया
जसरथ जू की . . .”

नरा छीनने की रस्म के समय दाई नेग के लिए मचल जाती है। उसका भी आज समय होता है। वह नेग के लिए ऐसे ठनगन करती है कि देखते बनता है। लोक की यह ख़ुशी इस सोहर में बख़ूबी व्यक्त हुई है:

“कैसी मचल रई दाई, अवध में कैसी मचल रई दाई
सुरंग चुनरी कौशल्या लेंय ठाड़ी, बई न लेबै दाई
सोने को हार कैकई ले ठाड़ी, कुली मरोर गई दाई
सोने की तिलरी सुमित्रा लेंय ठाड़ी, मुखई न बोली दाई
कैसी मचल रई दाई . . .”

लोक में राम की व्यापकता ऐसी है कि सुबह आँख खुलने से रात आँख बंद होने तक राम ही राम होते हैं। अभिवादन में राम, भवितव्य में राम, सब जगह राम ही तो है। लोक ने राम को अपने लोकगीतों में समाहित कर लिया है। उत्सव हो या ब्याह काज सभी में राम का ही पसारा है।

हर ब्याह में दूल्हा राम होता है और दुलहन सीता होती है। महिलाएँ ब्याह की सारी रस्में इन्हीं उपमाओं से पूर्ण कराती हैं। लगुन चढ़ते समय महिलाएँ इन्हीं लोकगीतों से वातावरण को राममय बना देती हैं:

“आज मोरे रामजू की लगुन चढ़त है
लगुन चढ़त है, रस बरसत है
आज मोरे रामजू की . . .
कानन में कुंडल मोरे रामजू के सोहे
मुतियन माल गरे बिलसत है
आज मोरे रामजू की . . .”

बारात लेकर दूल्हा जब दुलहन को ब्याहने जाता है तो वहाँ जनकपुर जैसा ठाठ देखने को मिलता है। भाँवर के समय के इन लोकगीतों में सीधे जनकपुर उतर आता है:

“हरे बाँस मंडप छाए, 
सिया जू खों राम ब्याहन आए।
जब सिया जू की परत भाँवरें
कासी सें पंडित आए
सिया जू खों राम . . .”

इन गीतों में ब्याह का उल्लास देखते बनता है। जेवनार में तो कन्या पक्ष की महिलाएँ बारातियों की माँ बहन का ऐसा जोड़ा मिलाकर गाती हैं कि न चाहते हुए भी मुँह पर मुस्कान छा जाती है। ये लोकगारियाँ परंपरा से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को देती चली जाती हैं। जिससे लोक हमेशा ज़िन्दा बना रहता है। इस लोकगारी को ही देख लीजिए:

“आतर परसी पातर परसी परस दई दुनिया
निबुआ परसे अथाने परसे परस दई अमियाँ
पूरी परसी कचौरी परसी, परसी मिर्जापुरिया
भर गई पातर उलंग गए दोना
खांड़ जो परसी, मुठी बगर गई . . .”

और भी-

“समधी की बहनी खों हब्सी लै गओ तो
तबै कैसौ लगो तो . . .”

इसके बाद गायिकाओं का जो मुँह खुलता है, उसके नाद सौंदर्य का तो कहना ही क्या है!

इन लोकगारियों में बड़े उतार-चढ़ाव होते हैं। जिसने सुना है वही इसका आनंद ले सकता है।

जिसने लोक के ब्याह देखे होंगे वे इन मधुर गारियों से ज़रूर अभिभूत हुए होंगे। पुनः इसे पढ़कर उनका चित्त उसी उल्लास में विचरण करने लगेगा। ये है लोक की ताक़त—गालियाँ भी हँसकर स्वीकार की जाती हैं। अनेक ब्याह शादियों में तो ये तक देखने को मिला है कि दूल्हे के विशेष संबंधी का नाम इन गालियों में नहीं आता है तो वे नाराज़ हो जाते हैं। नाराज़गी का कारण यही था कि इस शुभ अवसर पर उन्हें इन गालियों से वंचित क्यों रखा गया?

राम लोक के आदर्श हैं। उनके आनंद में वे अपना आनंद ढूँढ़ लेते हैं तो उनके दुख में दुखी भी हो जाते हैं। राम का राजतिलक होना था पर अचानक वनवास की ख़बर से लोग व्यथित हो जाते हैं। इस व्यथा को लोक ने इस गारी के माध्यम से ऐसे व्यक्त कर दिया है:

“अपने बचन पिता के मानऽ॥अपने बचन पिता के मानऽ
सीता खों लैबा खों बन खों चल भए लछमन राम

1. राजतिलक की सुनी हती, 
अरु बाजे तबल निसान रामजी, 
बाजे तबल निसान
इतने में कैकई बैरिन हो गई
माँग लए बरदान
अपने बचन पिता के मान-2

2. सूनी भई मोरी नगर अजुध्या
व्याकुल सब नर-नार राम जी
व्याकुल सब नर-नार
मूड धरै कौशल्या रोबै
सो जसरथ तज दए प्रान
अपने बचन पिता के . . .”

राम कवियों के ही नायक नहीं है। वे लोक के भी नायक है। उनका नायक भी कवियों के नायक जैसा धीरोदत्त गुणों से परिपूर्ण है। सीता की खोज के लिए हनुमान जी लंका जाते हैं। और जब वे लौटकर आते हैं तो राम हनुमान जी से लंका की ख़बर लेते हैं। दुश्मन के क़िले की ख़ासियत जानना चाहते हैं। इस ‘बिलवारी’ के माध्यम से राम हनुमान जी से पूछते हैं:

“हंस पूछत राजाराम पवनसुत, 
गढ़ लंका रे कैसी बऽ नी . . . 
अरे हाँ रे पवनसुत! 
काहे की रे लंका बऽ नी
अरे काहे के कलस कंगूर पवनसुत
गढ़ लंका रे कैसी बऽ नी . . . 
अरे हाँ जू अवधपति, 
सोने की रे लंका बऽ नी
अरे चाँदी के कलस कंगूर पवनसुत
गढ़ लंका रे कैसी बऽ नी . . .”

सभी कवियों ने सोने की लंका की बात की है पर चाँदी की बात किसी ने नहीं की है। लोक ने यहाँ सोने के साथ चाँदी के महत्त्व को भी स्वीकार किया है। सोने चाँदी का जो सामंजस्य है वह लोक कैसे भूल सकता है। ब्याह में चाहे जितना सोना चढ़ा दो पर चाँदी के ज़ेवर के बिना वह ब्याह अधूरा माना जाएगा। यही कारण है कि लोक जब सोने की लंका की बात करता है तो चाँदी के कलश कँगूरों को विस्मृत नहीं होने देता है।

लोक के लिए राम साक्षात्‌ ब्रह्म है। शत्रु भी उन्हें परम ब्रह्म मानता है। मंदोदरी अपने पति रावण को समझाती है कि सीता को ससम्मान राम को लौटा दो। वे राम साधारण मानव नहीं, पूर्ण ब्रह्म हैं। इस ‘खयाल’ छंद में ऐसा ही तो समझा रही है मंदोदरी:

“कहे मंदोदर सुन पिया रावन
यही काम करना चहिए
रामचन्द्र को, 
दे के जानकी
उनके चरन परना चहिए
हैं वे पूरन ब्रह्म रामजी
दीन-दुखी के हितकारी
नर तन धर के ध्यान जगत में
प्रभु ने लीला बिस्तारी . . . 
बड़े-बड़े राच्छसों को मारकर
करी जग्य की रखवारी
गौतम नारी श्राप सिला ती
उन्नै उसको भी तारी
कौतुक में श्रीरामचन्द्र ने
तीन खंड धनु तोर दिया
धनुष तोरकर रामचन्द्र से
तब क्यों नहीं संग्राम किया।”

और इसी के आगे वाला भाग भी देखिए, छोटे से लोकगीत में पूरा आख्यान भर दिया है:

“सूपनखा बिनु नाक कर, खर-दूषण की नास। 
एक बान सें बालि की, निकर गई तन स्वांस॥”

लोक का पूरा जीवन राम के साथ चलता है। राम उनके गभुवारे बालक है, तो किशोरावस्था में राम दूल्हा है। कठिनाइयों में उनके सहायक हैं। हर तरह से पूज्य हैं। सुखों को देने वाले ईश्वर हैं। उनके बीच के हैं, उनके अपने हैं। दुश्मनों के लिए काल हैं, भक्तों के लिए पूर्ण ब्रह्म हैं। लोक का आदर्श उन्हीं पर केंद्रित है।

अंत समय में लोक ये अनुभव कर लेता है कि दुनिया में कोई किसी का नहीं है। सब झूठी माया है। अगर कोई है तो राम है। अंत समय में लोक सब कुछ समेटकर इस बात पर आ जाता है:

“हमारें कोई नहियां रे, हमारें कोई नहियां रे
बिना राम रघुनाथ हरि के बिन कोई नहियां रे
बाग लगाए बगीचा लागे, बिच बिच लागे क्योरे राम जी
बिच बिच लागे क्योरे-ऽ
चोला में से हँस निकर गओ, लुटन लगे सब देस
हमारें कोई नहियां रे . . .”

बुंदेली माटी से उपजे लोकगीतों में श्रीराम जन-जन में बसे हुए हैं। शास्त्रों में जहाँ राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं वहीं लोक में वे मर्यादा नहीं—सम्बन्ध हैं। इन सम्बन्धों को लोक पूर्ण आस्था के साथ जीता है। यह लोक की अपनी शक्ति है जिसका प्रवाह युगों-युगों तक यूँ ही अनवरत जारी रहेगा। 

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टिप्पणियाँ

लखनलाल पाल 2026/04/10 05:55 PM

पद्मा मिश्रा जी, बढ़िया टिप्पणी के लिए धन्यवाद

पद्मा मिश्रा 2026/04/09 04:57 PM

बहुत सुंदर सार्थक संदेश देता आपका आलेख।बहुत खूब। राम का चरित्र भारतीय समाज के लिए गर्व व प्रेरणा का कारण है। बुंदेलखंड की संस्कृति राम और उनके जीवन में घटित घटनाक्रमों पर आधारित गीतों से समृद्ध रही है।बहुत बहुत बधाई सर। प्रणाम। पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर

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