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गाइड सर

 

प्रीति पीएच. डी. करना चाहती है। उसको उम्मीद है कि ऐसा करने से वह एक बेहतर रोज़गार प्राप्त कर सकेगी। देश में शिक्षा प्राप्त करने का अब एक मात्र उद्देश्य ये ही है। ‘कैम्पस सेलेक्शन’, ‘कैम्पस प्लेसमेन्ट’ जैसे चमकदार शब्दों की छटा देखते ही बनती है। चहुँ ओर इन्हीं की स्तुति में राग-रागिनियाँ गाई जा रहीं हैं। 
‘ज्ञान के लिये शिक्षा’ जैसे जंग लगे मुहावरे अब इधर-उधर धूल फाँक रहे हैं। 

प्रीति समाज शास्त्र की छात्रा है। इसलिये उसकी मजबूरी है कि इसी शास्त्र के किसी टॉपिक पर शोध करे। समाज शास्त्र की विदुषी छात्रा होने के कारण प्रीति समाज की बारीक़ियों को अब बख़ूबी समझने लगी है, इसीलिये उसे पूरा भरोसा है कि गाइड सर किसी हो चुकी ‘सर्च’ को उससे ‘री-सर्च’ करा लेंगे। गाइड सर पहले भी ऐसा कर चुके हैं। बड़े विख्यात हैं अपने क्षेत्र में। जल्दी किसी छात्र को अपन नीचे काम करने की इजाज़त नहीं देते, हाँ छात्राओं की बात अलग है। प्रीति के पास छात्रा होने का नैसर्गिक गुण है। ये अकेला गुण गाइड सर को पिघला देगा ऐसा प्रीति का दृढ़ विश्वास है। इसी दृढ़ विश्वास से लैस प्रीति ने आज गाइड सर का दरवाज़ा खट-खटाया है। नैसर्गिक गुण ने गाइड सर को मोम बना दिया है। उनकी पारखी नज़र ने प्रीति के भीतर छिपी प्रतिभा को देख लिया है, पहचान लिया है। 

आख़िर उन्होंने प्रीति को तराशने की ज़िम्मेदारी काफ़ी ना-नुकुर के बाद ले ही ली। 

गाइड सर विश्वविद्यालय में बनाई गई प्रवेश कमेटी, जाँच कमेटी, भर्ती कमेटी, शुल्क कमेटी, शोध कमेटी, छात्र विकास कमेटी, स्वच्छता कमेटी जैसी अनगिनत कमेटियों के प्रमुख और महत्त्वपूर्ण सदस्य हैं इसलिए बहुत ही व्यस्त रहते हैं। वह इतना व्यस्त रहते हैं कि कक्षा में छात्रों को पढ़ाने हफ़्ता-पन्द्रह दिन में एक-दो बार ही जा पाते हैं। उनके छात्रों को भी पता है कि सर बहुत व्यस्त रहते हैं। हफ़्ते-पन्द्रह दिन में ही सर से जो ज्ञान उन्हें मिलता है उसे ही वे भगवान का प्रसाद मान कर ग्रहण कर लेते हैं और धन्य हो जाते हैं। 

सर बराबर विदेश यात्रा पर जाते रहते हैं। पूरे विश्व में फैले अनगिनत विश्वविद्यालय भी सर की प्रतिभा का लोहा मानते हैं। सर वहाँ जाकर वही पेपर पढ़ देते हैं, जो वह पिछले अनगिनत वर्षों से, अनगिनत विश्वविद्यालयों में, अनगिनत बार पढ़ चुके हैं। और इसके बदले में वो देर तक बजती तालियों की हर्षध्वनि, बहुत-सी विदेशी मुद्रा और किसी अन्य विश्वविद्याालय में अगला पेपर पढ़ने का सस्नेह आमंत्रण ग्रहण कर लौट आते हैं। 

मगर इन व्यस्तताओं के बीच भी उनके शोधर्थियों का शोधकार्य आश्चर्यजनक रूप से सरपट दौड़ता रहता है। इसीलिये प्रीति की रिसर्च का कार्य भी तेज़ी से दौड़ रहा है। 

सर अपने विषय के उत्थान के लिए सतत प्रयत्नशील रहते हैं। इसके लिये वो न दिन देखते हैं न रात। बस विषय का उत्थान होना चाहिये। अगर विषय के उत्थान में धन सहायक हो सकता है तो उसको कहीं से भी पकड़ लाना उनके बाँये हाथ का खेल है। पिछले दिनों विषय के उत्थान के लिए तमाम कार्यशालाएँ, सेमिनार आदि कराये जाने के लिए आए धन को उन्होंने अपने भोलेपन में विश्वविद्याालय के खाते में न जमा कर अपने बैंक के बचत खाते में जमा कर लिया। ये एक बहुत ही मामूली-सा भोलापन था जो अनजाने में वो बराबर कर लेते थे। मगर इस बार विषय के उत्थान के लिए धन भेजने वाली संस्था को ये बात पंसद नहीं आयी और वो बिदक गई। चिट्ठी-पत्री, मेल-फ़ोन आदि पर उतारू हो गई। तू-तड़ाक करने लगी, लपड़-झपड़ करने लगी। और हद तो तब हो गई जब संस्था ने लेखा परीक्षकों का एक दल भेज दिया। सर ने उन सबको बहुत समझाया कि वो शिक्षक हैं, कोई वित्त विशेषज्ञ नहीं है। इस मामूली-सी बात को इतना तूल न दिया जाए, प्रतिष्ठा का प्रश्न न बनाया जाए, मामले को रफ़ा-दफ़ा किया जाए, मगर सर द्वारा पैदा की गई अविश्वसनीय गर्मी के ताप को महसूस कर भी संस्था ने पिघलने से मना कर दिया। 

जाँच बैठ गई। 

अब ऐसी जाँचों-फाँचो से वो डरे, जो डरपोक हो! सर तो खरा सोना है। उनको क्या डर, क्या भय!! सोना जितना आग में तपेगा, उतना खरा होगा, दमकेगा। 

जाँच सधे क़दमों से आगे बढ़ चली। सर ने कोई संज्ञान नहीं लिया। जाँच ने बखिया उधेड़नी शूरु की। सर फिर भी चैन की बंसी बजाते रहे। सर ख़तरों के खिलाड़ी हैं। सर जानते है ख़तरा जितना बड़ा, खिलाड़ी उतना कढ़ा। जाँच, सर के इतिहास को पंजों से कुरेदने लगी। सर जाँच को हिक़ारत से देखते रहे और मन ही मन हँसते रहे। हँसते-हँसते ही उन्होंने जाँच को ख़ूब कूदने-फाँदने दिया। उन्हें पता था कि ये मन भर कर ‘सौ सुनार की’ कर ले आख़िर में जब हम ‘एक लुहार की’ धरेंगे तो ये त्राहिमाम-त्राहिमाम करेगी। 

अन्त में चूहा-बिल्ली का खेल समाप्त हुआ। बड़े प्रयासों, उठा-पटक और तमाम हिचकोलों-झटकों के बाद राम-राम कर कुछ वर्षों में जाँच पूरी हो ही गई। 

और अचम्भा ये कि प्रचलित चलन के अनुरूप जाँच रिर्पोट दबाई न जा सकी और सार्वजानिक पटल पर प्रकट हो थिरकने लगी। चूहे-बिल्ली के इस रोमांचक खेल पर लगातार नज़रें गड़ाए, दूर बैठ कर देख रहे तमाम सजग दर्शकों ने बिना देर किये इस थिरकती रिपोर्ट को हासिल करना अपना लक्ष्य तय किया और येन-केन-प्रकारेण लक्ष्य प्राप्त कर ही चैन की साँस ली। 

सर्विदित है कि हर रिर्पोट अपने साथ हलचल लाती है चाहे वह मेडिकल रिर्पोट हो, पुलिस रिर्पोट हो, मौसम रिर्पोट हो या जाँच रिर्पोट हो। तो इस जाँच रिर्पोट ने भी शान्त परिदृश्य में हलचल पैदा कर दी। बरर्सों से छिपा-कर बोतल में रखा गया जिन्न बाहर आ गया। इतने दिनों से सरकारी काग़ज़ों के भीतर दफ़न राज़ सार्वजनिक हो गया। 

गाइड सर की डिग्री जाली निकली। 

अब क्या होगा? लोग चिन्तित हैं मगर गाइड सर बेफ़िक्र। सब जानते हैं कि गाइड सर क्राइसिस मैनेजमेन्ट यानी संकट प्रबंधन के पुरोधा हैं। इससे हज़ारों टन भारी संकटों का प्रबंधन उन्होंने चुटकियों में किया है। गाइड सर पूरे आश्वस्त हैं, भय मुक्त हैं। उनका दढ़ विश्वास है लोकतंत्र में ऐसे संकट आते-जाते रहते हैं और स्वयं व्यवस्था में ही इसको दुरुस्त करने के पुख़्ता उपाय छुपे रहते हैं। इन पुख़्ता उपायों को ढूँढ़ पाने के लिए केवल पारखी नज़रों की आवश्यकता होती है। सर की अनुभवी, पारखी नज़र तो ओट में छिपे उन बारीक़ सिद्धांतों को गहराई से कबका पहचान चुकी है जो ऐसे ऊँच–नीच को आसानी से समतल बना देते हैं। ऐसे संकटों का चुटकियों में प्रबंधन करने की अपनी मर्मज्ञता के कारण ही तो वो सबके गुरु हैं। 

ऐसे संकटों का चुटकियों में प्रबंधन करने में उनका सिद्धांत भाईचारे का है। उनके भाईचारे का सिद्धांत टिका है अपनेपन पर। अपनापन यानी अपना जाँच अधिकारी, अपना गवाह, अपनी पुलिस, अपना विधायक, अपना मंत्री आदि-आदि। ये सभी अपनेपन की एक अनकही डोर से बँधे हैं। इसके आगे बढ़े तो फिर अपना वकील हैं ही। और फिर और ऊपर अपना भगवान तो है ही। सब देख ही रहा है। 

बस, सर अब अपनी ‘एक लुहार की’ धरने जा रहे हैं। 

मगर यहाँ तो एक दूसरी उलझन फँस गई है। दरअसल गाइड सर जीवन पर्यन्त एक चलता-फिरता संस्थान रहे हैं, जिसका एक गौरवपूर्ण इतिहास रहा है। उनके मार्गदर्शन में अब तक बयालिस नौनिहाल पीएच. डी. हासिल कर चुके हैं और तमाम प्रीतियाँ उसको हासिल करने की कगार पर खड़ी हैं। और वो बयालिस सितारे देश में चारों और फैले विभिन्न विद्यालयों, महाविद्यालयों या विश्वविद्यालयों में अपने ज्ञान की रोशनी बिखेर रहे हैं, छात्रों के जीवन को आलोकित कर रहे हैं। अब उलझन ये है कि इन ज्ञान-पुंजों के ज्ञान को किस थाली में सजाया जाए? हालाँकि महान देशों के सामने उनके देशभक्त नागरिक सदा ही नई-नई चुनौतियाँ खड़ी करते ही रहते हैं और महान देश उन चुनौतियों से निपटता रहता है, नए-नए रास्ते खोजता रहता है। 

इसी बीच सर ने व्यवस्था में छुपे पुख़्ता उपायों से परिचय गाढ़ा कर लिया है। गाढ़ा परिचय मार्गदर्शक की भूमिका निभाते हुए सुगम मार्ग में बिछ गए काँटों को साफ़ करने में जी-जान से जुट गया है। उसके जी-जान से जुट जाने के कारण ही जाँच के परिणामों पर प्रश्नचिह्न लग गया है। दुबारा जाँच की संस्तुति हो गई है। इस बार की जाँच अधिक बड़े विशेषज्ञ कर रहे हैं। सर का भाईचारे वाला सिद्धांत अधिक बड़े विशेषज्ञों के साथ भी भरपूर प्रभावी है। इस बार जाँच की गति की रफ़्तार द्रुत रखी गई है ताकि फ़ैसला अति शीघ्र हो सके। और वो ही हुआ। चट-पट जाँच पूरी हुई। भगवान् की असीम कृपा, पुरखों के आशीर्वाद और बड़े विशेषज्ञों के भाईचारे के अलौकिक प्रभाव से फ़ैसला सर के पक्ष में रहा। फ़ैसले के एक दो वाक्य तो सर की शिक्षा जगत को दी गई निःस्वार्थ सेवा के सम्मान में भी थे। 

फ़ैसले ने सर की प्रतिष्ठा में तो चार चाँद लगाए ही, उन बयालीस सितारों के भविष्य को सुरक्षित कर आसन्न एक बड़े संकट से भी देश को उबार लिया। 

आख़िरकार प्रीति का परिश्रम और सर का मार्गदर्शन सफल हुआ। प्रीति को पीएच. डी. प्राप्त हुई। उच्च शिक्षा के विकास के लिए निःस्वार्थ योगदान को ध्यान में रखते हुए और भाईचारे वाले सिद्धांत को मान्यता देते हुए सर को एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के कुलपति का पद सौंपा गया है। अब असंख्य छात्र छात्राओं के भविष्य को उज्जवल बनाने की महती ज़िम्मेदारी सर के कन्धों पर आ गई है। 

सर सबका भविष्य उज्जवल बनाने के लिए कृत संकल्प हैं। 

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