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हवा

 

डोरबेल बजते ही . . . शुचिता का मधुर स्वर उभरा, “आती हूँ।”

“अरे निर्मला तू . . .? आ अंदर आ! आज मेरी याद कैसे आ गई?” 

“यादें तो आती हैं, लेकिन वक़्त ही नहीं मिलता आने का,” निर्मला एक ही साँस में कह गयी। 

“कोई बात नहीं बैठ! पर मेरी बन्नो को आज कैसे वक़्त मिल गया?” 

“बिटिया की सगाई कर दी, उसकी मिठाई लाई हूँ,” निर्मला प्रफुल्लित होते हुए बोली। 

“अरे! बिटिया तो शायद 20 वर्ष के आस पास की है, अभी से . . . ऐसी भी क्या जल्दी थी? पहले उसको पढ़-लिखकर, अपने पाँवों पर खड़ा तो होने देती।”

“शुचिता! उसको इतना पढ़ा दिया है कि मुश्किल समय का वो सामना कर सके, इतना काफ़ी है और नहीं पढ़ाना है।”

“लेकिन क्यों?” 

“जबसे लड़कियाँ ज़्यादा बाहर निकलने लगी है तबसे मर्यादाएँ भूल गयी हैं। पुरुषों से बराबरी का ये मतलब नहीं है की नारी, नारी सुलभ गुणों को ही तज दें। और मात-पिता को धोखे में रखकर लड़कों के साथ मौज-मनाती रहे।”

” क्यों परेशान होती है? अपनी बेटियाँ ऐसी नहीं है,” शुचिता आत्मविश्वास से बोली। 

“तू नहीं जानती, कब ज़माने की हवा लग जाए, पता नहीं लगता। फिर पछताने से अच्छा है, समय रहते सँभल जाओ।”

अंदर आती हुई तन्वी उन दोनों की बातें सुनते हुए, सोफ़े से टकरा गयी। 

“क्या हुआ बेटा?” शुचिता घबरायी हुई बोली। 

“कुछ नहीं, मम्मी! ध्यान भटक गया था, लेकिन सँभल गई हूँ।”

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