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इलाज

 

छुट्टन की उल्टी ही नहीं रुकती।

हर दस मिनट पर उकड़ूँ बैठ मुँह से तरह-तरह की आवाज़ें करते हुए न मालूम कैसा लसलसा-सा पदार्थ निकाल-निकाल कर थूक रहे हैं। तबियत पस्त हो चुकी है। कल तक अच्छे भले सन्ना रहे थे, आज तो चार क़दम चलने में तीन बार लुढ़के जा रहे हैं। पत्नी सफ़ाई करते-करते हलकान हुई जा रही। पहले छुट्टन को सँभालो, उन्हें पकड़-पकड़ा कर खटिया पर लेटाओ, फिर उन्होंने जो गन्दगी फैलायी है उसे साफ़ करो, तब तक छुट्टन अगली उल्टी के लिये तैयार। कोई दूसरा काम कर ही नहीं सकती। ज़रा निगाह से दूर हुई कि छुट्टन का शोर मचाना शुरू—अरे, मर गये . . .अरे, अब नहीं बचेंगे . . . कहाँ चलीं गयी . . . अरे, जल्दी आओ . . . अररररररेरे, ये औरत तब आयेगी जब हम मर जायेंगे!!! हे भगवान!!! अरे, उठाओ!!!! . . . फिर उल्टी आयी।

पत्नी फिर पकड़-पकड़ा कर बाथरूम तक ले गयी। सुबह से अनगिनत बार ये दृश्य दोहराया जा चुका है। अब डॉक्टर को दिखाना ही पड़ेगा। वही इसकी जान बचायेंगे!!

बंगला को बुलवाया है, पास ही में रहता है। सन् ’71 की पैदाइश है। तब बंगलादेश आज़ाद हुआ था। अख़बार-रेडियो बंगलादेश-बंगलादेश का हल्ला मचाते रहते थे। माता-पिता को और कोई नाम ही न सूझा, बस बंगला रख दिया।

बंगला ने आ कर जो छुट्टन चच्चा की हालत देखी तो सन्नाटे में आ गया।

“अरे!!! एक ही दिन में ये तो कंकाल हो गये।”

घबरा कर पूछा, “अरे चच्ची, इनको हुआ क्या?”

“अब, हमें क्या मालूम, भैया!! बस हर दस मिनट में मुँह से न जाने क्या-क्या उलटे जा रहे हैं। हम तो सफ़ाई कर-कर के मर गये। अगर अब ये पलटी-पलटा एक-आध दिन और चला तो ये तो बाद में परलोक जाएँगे, इनसे पहले हम ज़रूर चले जाएँगे,” ये कह कर चच्ची वहीं धम्म से ज़मीन पर बैठ गयी।

बंगला ने सत्ते को मोबाइल मिलाया। हुक्म दिया फ़ौरन टेम्पों लेकर छुट्टन चच्चा के घर पहुँचो। सत्ते का टेम्पों आते ही चच्चा को उसमें लादा गया। चच्ची को भी बैठा, बंगला और सत्ते पास के नर्सिंग होम की तरफ़ भागे।

नर्सिंग होम में मरीज़ और तीमारदारों की भारी भीड़ बैठी है। वहीं भीड़ जो कभी ट्रैफ़िक जाम में फँसी हुई, कभी रेल की बोगी में ठुंसी हुई, कभी गंगा स्नान करती हुई, कभी मेले में चाट-पकौड़ी खाती हुई दिखती है। मतलब ये कि ज़िन्दा रहने के लिये बहुतेरे प्रयास करती हुई। वहीं भीड़ ज़िन्दा रहने के लिये एक और प्रयास करती हुई नर्सिंग होम में भी बैठी है।

उसी भीड़ में अलग से नज़र आ रहे है कुछ टाई लगाये, बैग पकड़े उत्सुक लोग। इस भीषण गर्मी में टाई लगाये बैठी इन प्रतिभाओं को जन-जन की भाषा में मेडिकल रिप्रेजेन्टेटिव कहा जाता है यानी चिकित्सा प्रतिनिधि। ये दवा बनाने वाली कम्पनी और डॉक्टर के बीच के सेतु हैं, कड़ी हैं। ये कड़ी कम्पनी का दुख डॉक्टर तक पहुँचाती है और डॉक्टर का दुख कम्पनी तक। फिर कम्पनी और डॉक्टर दोनों मिलकर एक-दूसरे का दुख दूर करने का उपाय करते हैं और सुखी हो जाते हैं।

चच्चा को पकड़-पकड़ा कर अन्दर तक पहुँचाया गया। लोगों से बहुत मिन्नत-आरज़ू करके एक बेंच पर थोड़ी सी जगह बनाकर उनको कोई तरह बैठाया गया। चच्ची को कहीं बैठने की जगह नहीं थीं, वह एक दरवाज़े का सहारा लेकर खड़ी-सी बैठ गयी। बंगला और सत्ते ने भाग-दौड़ शुरू की। फ़ीस जमा कर पर्चा बन गया। उतनी सी जगह में सिकुड़े से बैठे छुट्टन ऐंठे जा रहे थे। बंगला ने छुट्टन की हालत देख जल्दी देखने का अनुरोध किया।

रिसेप्शन पर बैठी मैडम ने दो टूक बता दिया-डॉक्टर साहब नम्बर ही से मरीज़ देखेंगे। बंगला मुँह लटका कर सत्ते के पास वापस आ गया। सत्ते ने पूछा-सरकारी अस्पताल चलें क्या? बंगला ने मायूसी से जवाब दिया—वहाँ तो पूरी मरन होगी।

अन्दर चेम्बर में डॉक्टर साहब एक दवा बनाने वाली बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनी के चिकित्सा प्रतिनिधि से नई-नई दवाओं को समझ रहे हैं। तरह-तरह के टॉनिक हैं, तरह-तरह की गोलियाँ हैं, कैप्सूल हैं। ये दवा बनाने वाली कम्पनी पूरे विश्व में लोगों की सेहत ठीक रखने और लोगों की जान बचाने के पुनीत कार्य में लगीं हुई है। डॉक्टर साहब ने चिकित्सा प्रतिनिधि से कहा, “ओ.के. आई विल डू./ठीक है, मैं करूँगा।”

जाते-जाते चिकित्सा प्रतिनिधि ने पूछा, “सर, आर.एम. साहब पूछ रहे थे आस्टेलिया टूर में कोई दिक़्क़त तो नहीं हुई?”

डॉक्टर साहब ने मुस्कुरा कर कहा, “नो, नो, इट वाज़ फ़ाईन/नहीं, नहीं, सब ठीक था।”

“सर! सिडनी टेस्ट पूरा देखा?” चिकित्सा प्रतिनिधि ने फिर पूछा।

डॉक्टर साहब ने फिर मुस्कुरा के कहा, “यस, फ़ुल फ़ाइव डेज़। यू नो, आई लव क्रिकेट/हाँ, पूरे पाँंच दिन। तुम्हें पता है, मुझे क्रिकेट से प्यार है। ”

“ओ.के. सर। गुड डे सर!/ठीक है सर। आपका दिन शुभ हो सर!” चिकित्सा प्रतिनिधि मुस्कुरा कर चेम्बर से बाहर निकल आया।

वह ख़ुश है। अब बिक्री बढ़ेगी, उसका प्रोत्साहन भुगतान बढ़ेगा। डॉक्टर साहब और उनके पत्नी-बच्चों के दस दिन के आस्ट्रेलिया टूर का कुल ख़र्च उसकी बहुराष्ट्रीय कम्पनी ने ही उठाया है।

अगला मरीज़ डॉक्टर साहब के चेम्बर में भेज दिया गया।

जब तक छुट्टन का नम्बर आया, उनकी दशा और बिगड़ गयी। बिल्कुल ही बेदम हो गये। पकड़-पकड़ा कर अन्दर चेम्बर में पहुँचाए गये। डॉक्टर साहब ने छुट्टन को देखा। समझा . . . और फिर पर्चे पर लिख दिया ‘एडमिट हिम इमीडियेटली’—यानी तुरन्त नर्सिंग होम में भर्ती करो।

छुट्टन स्ट्रेचर पर लिटा दिये गये। अब??? बंगला ने चच्ची की ओर देखा। सोचने की मोहलत ही कहा थी। वार्ड बॉय स्ट्रेचर लेकर चल पड़ा। चच्ची, बंगला और सत्ते भी उसके पीछे-पीछे लपके।

“सब पीछे-पीछे क्या चले आ रहे हो, एक आदमी जाओ मैडम को पैसा जमा कराओ,” वार्ड बॉय ने घुड़का। बंगला और सत्ते एक-दूसरे का मुँह देखने लगे। चच्ची ने एक हाथ की चूड़ी उतार कर सत्ते को पकड़ा दी और कहा, “इनसे क़ीमती नहीं है। जमा कर दो पैसा।”

सत्ते के टेम्पो में बैठ कर सुनारों के कई बच्चे स्कूल पढ़ने जाते हैं। चच्ची की चूड़ी ले कर सत्ते उन सम्बन्धों को भुनाने चला गया। इस बीच रिस्पेशन पर बैठी मैडम ने अनगिनत काग़ज़ों पर लिखा-पढ़ी की। उन अंग्रेज़ी में लिखे तमाम काग़ज़ों पर बिना पढ़े बंगला ने आड़े-तिरछे दस्तख्वत किये। थोड़ी ही देर में सत्ते पैसा ले कर आ गया। रिस्पेशन पर बैठी मैडम ने पैसा गिन कर गल्ले में भर लिया। ‘पैसा जमा हो गया है’ ये सूचना फैलते ही छुट्टन का इलाज शुरू हो गया। कई तरह की नली लगा दी गईं, ड्रिप चढ़ने लगी। कई इंजेक्शन लगाये गये। रंग-बिरंगी कई कैप्सूल खिलाई गए। मतलब ये कि इलाज शुरू हो गया। चच्ची वहीं कमरे में छुट्टन के पास बैठ गयी। बँगला और सत्ते कमरे के बाहर पड़ी कुर्सियों पर पसर कर कमर सीधी करने लगे।

नर्सिंग होम के डॉक्टर साहब डबल एमडी है। एक उपाधि से उनका डॉक्टर ऑफ़ मेडिसिन होने का सम्मान मिलता है और दूसरे से नर्सिंग होम के मैनेजिंग डायरेक्टर होने का रुत्बा।

डॉक्टर साहब अब दो हिस्सों में बँट गये हैं। एक हिस्सा डॉक्टर की भूमिका अदा करता है तो दूसरा हिस्सा व्यापारी की। इन दोनों भूमिकाओं को साधने में डॉक्टर साहब रस्सी पर चलने वाले नट जैसी एकाग्रचित्तता दिखाते हैं। मरीज़ देखते हुए डॉक्टर साहब के भीतर छिपा व्यापारी बार-बार अपना फन उठाता है। इसलिये मरीज़ का पर्चा तैयार करते समय वह व्यापारी का भी ख़्याल रखते हैं। कई अवसर ऐसे भी आए कि उन्होंने सिर्फ़ व्यापारी का ही ख़्याल रखा है।

बदलते समय को पहचानते हुए अब डॉक्टर साहब बड़े फलक से भी जुड़ गये है। यानी वो अब फ़ेसबुक पर पोस्ट लिखते हैं, देश-दुनिया से जुड़े तमाम मुद्दों पर ट्वीट करते हैं, इंस्टाग्राम पर रोज़ नयी शानदार, चमकदार तस्वीरों को भेजते हैं और यूट्यूब पर मेडिकल वीडियो अपलोड करते हैं। इस नये अवतार में भी उन्होंने अपना परचम लहरा दिया है। उनके प्रशंसकों और अनुयायियों की संख्या तूफ़ानी गति से बढ़ रही है।

वही डॉक्टर साहब इस आड़े वक़्त में छुट्टन के भगवान हैं। उनके मुँह से निकला एक-एक शब्द इस दुर्योग काल में चच्ची, बंगला और सत्ते के लिये देव वाणी है, अमृत वचन है, वेद वाक्य है। वह जो कह दें, वह जो पर्चे पर लिख दें, चच्ची, बंगला और सत्ते की टीम उसे भक्तिभाव से पूरा करने के लिये जुट जाती है। सबका लक्ष्य बस एक है—छुट्टन को निरोगी बनाना।

पहले दिन तो लगा कि उनका स्वास्थ्य कुछ सुधर रहा है, कुछ खाने-पीने का भी उनका मन किया, मगर आज तीसरा दिन हो गया है वह आशा की लौ कुछ धीमी पड़ती जा रही है। इस बीच शहर में अलग-अलग स्थानों पर विराजमान कई भीमकाय मशीनों ने भी छुट्टन को जाँच-परख लिया है। गरुण विमान सरीखी नर्सिंग होम की एम्बूलेन्स ही छुट्टन को उन शहर भर में स्थापित प्राणों की रक्षक मशीनों से मिलवा लायी है। चच्ची के आभूषण जवानी में भी इतने काम नहीं आये थे, जितने अब आ रहे हैं। आ चुकी रिपोर्टें छुट्टन की अस्पताली फ़ाइल को तो मोटा बना रहीं हैं मगर उनको निरोगी नहीं।

हतोत्साहित होती चच्ची अब पथराने सी लगी है। बंगला और सत्ते का मनोबल भी जवाब दे रहा है। ऊहा-पोह की स्थिति प्रबल हो चली है। क्या करें-क्या न करें की तलवार हर क्षण दिमाग़ को कुंद करे दे रही। आँख बन्द कर जैसे ही बंगला ‘अब क्या करें’ सोचना शुरू करता है वार्ड बॉय नये फ़रमान के साथ हाज़िर हो जाता है। वार्ड बॉय का नया फ़रमान मतलब चच्ची के एक और आभूषण की बलि।

चच्ची के आभूषण अब ख़त्म हो चले है। थे ही कितने? अब आगे क्या होगा? ये यक्ष प्रश्न चच्ची और बंगला को खाये जा रहा है। ‘कौन उधार देगा’ इस पर धीमी चर्चा शुरू हो गयी है। क्या कोई नाते-रिश्तेदार इस स्थिति में दिख रहा, जो कुछ आर्थिक बोझ अपने कंधे पर ले ले? नर्सिंग होम में चच्चा को देखने आने वाले अपने और चच्चा दोनों तरफ़ के नाते-रिश्तेदारों से चच्ची ने इस गहरे विषय पर हल्की-फुल्की चर्चा की। मगर सबके लटके चेहरों और अनगिनत बहानो ने चच्ची को स्पष्ट कर दिया उनको अपनी लड़ाई अपने ही दम पर लड़नी है।

बीमा-वीमा कराने का भी बताओ कभी ख़्याल ही नहीं आया। सरकारी अस्पताल, सरकारी कल्याणकारी योजनाओं पर भी अब मंथन शुरू हुआ है। मगर सिर्फ़ मंथन करने से लड़ाइयाँ नहीं जीती जातीं। उसके लिये तो रणभूमि में कूदना पड़ता है। और रणभूमि में कूदने से पहले तैयार होती है व्यूह रचना। और ये टोली अभी व्यूह रचना की रूप रेखा ही नहीं बना पा रही यानी सरकारी अस्पताल में भर्ती के लिये कोई तगड़ा जुगाड़ या सोर्स ही नहीं ढूँढ़ पा रही। और बग़ैर तगड़े जुगाड़ या सोर्स के सरकारी अस्पताल जा कर भर्ती हो जाना ही मौत को हराने के बराबर है। और उसी मौत को तो हराने की लड़ाई यहाँ भी चल रही है।

चच्ची तो रात-दिन नर्सिग होम में ही बनी रहती है। बंगला और सत्ते बारी-बारी से आते-जाते रहते हैं। यहाँ आये आज चौथा दिन हो गया है। छुट्टन सुबह से कुछ ठीक दिख रहे हैं। चच्ची को भरोसा है कि छुट्टन ने मुस्कुरा कर एक-दो बार आज उनको देखा भी है। ये ज़िक्र उन्होंने कई बार बंगला से किया है। बंगला को भी लग रहा कि चलो चच्चा अच्छे हो रहे हैं। मगर साँझ ढलते-ढलते चच्चा ने फिर उल्टियों की बरसात शुरू कर दी और इस बार तो उल्टियों का रंग लाल था। उसको देखकर चच्ची तो दहाड़ मार कर विलाप करने लगीं। मौक़े पर मौजूद नर्स के हाथ-पाँंव फूल गये। सत्ते डॉक्टर साहब को बुलाने दौड़ा। उनकी ग़ैर हाज़िरी में मौजूद छोटे डॉक्टर को ही पकड़ लाया। उन्होंने जल्दी-जल्दी ताबड़तोड़ कई इंजेक्शन लगाने का आदेश नर्स को दे डाला। नर्स ने तड़-पड़ आदेश का पालन किया। कई गोलियाँ भी छुट्टन के मुँह में ढकेली गयीं मगर वह तो चच्ची के अंतिम आभूषण के विदा होने से पहले ही इस दुनियाँ से विदा हो गए।

चच्ची की चीत्कार नर्सिंग होम में गूँज उठी। रोते हुए बंगला और सत्ते ने चच्ची को सँभाला। फिर तीनों एक दूसरे से लिपट कर सामूहिक विलाप करने लगे।

तभी वार्ड बॉय प्रकट हुआ और बंगला को समझाते हुए बोला, “अरे, ये रोना-धोना घर जाकर कर लेना। अभी तो चल कर ‘डेथ सर्टिफिकेट’ ले लो नहीं तो डॉक्टर साहब निकल जायेंगे, फिर टापते रहना।” बंगला रिसेप्शन वाली मैडम के पाँस पहुँच गया। ‘डेथ सर्टिफिकेट’ देने से पहले उन्होंने बंगला को एक मोटा और शायद आख़िरी बिल पकड़ाया। इस आख़िरी बिल की उदरपूति के लिये चच्ची के आख़िरी आभूषण की बलि चढ़ाने रोता हुआ सत्ते नर्सिंग होम से निकल गया।

अगले दिन का सूरज निकल आया है। निकलना ही था। बंगला और सत्ते मिलकर चच्चा के मुर्दे शरीर को किसी तरह टेम्पो में ठूँस रहे है। अपना सुहाग और उसके सारे चिह्न गगँवाकर पथरायी और लुटी-पिटी चच्ची नर्सिंग होम की सीढ़ियों पर बैठी सी पसरी है। कुछ मुँह लटकाए रिश्तेदार उनको सँभालने का प्रयास कर रहे है।

नर्सिंग होम की ऊपरी मंज़िल पर ही रहने वाले डॉक्टर साहब ने कॉफ़ी सिप करते हुए, सुबह की गुनगुनी-चमकीली धूप को कमरे में आमंत्रित करने के लिए चौड़ी-ऊँची शीशे की खिड़की पर लगे भारी परदे सरकाए। नर्सिंग होम के गेट पर नीचे दिखे बंगला, सत्ते और रिश्तेदार जो पथरायी चच्ची को टेम्पों में एडजस्ट कर रहे थे। धुआँ उड़ाता टेम्पो रवाना हो रहा था। कुछ ही क्षणों में धुआँ उड़ाता टेम्पो आँखों से ओझल हो गया।

तभी डॉक्टर साहब के स्मार्टफोन पर मैसेज आने की आवाज़ आयी। डॉक्टर साहब की कल लिखी फ़ेसबुक पोस्ट पर तमाम प्रतिक्रियाएँ आने लगीं थींं। किसी ने लिखा था ‘वाऊ/बहुत ख़ूब’, किसी ने लिखा था ‘ऑसम/बहुत बढ़िया’, किसी ने ‘थम्स-अप’ वाले ढेरों अँगूठे भेजे थे और किसी ने लिखा था ‘यूँ आर जीनियस डॉक्टर/डॉक्टर आप प्रतिभावान है’। एक नामचीन संस्था ने डॉक्टर साहब को बुलावा भेजा है सेमिनार में पर्चा पढ़ने के लिये। सेमिनार का विषय है ‘रोल एन्ड रेस्पोंसबिल्टीज़ आफ़ डॉक्टरज़ इन चेन्जिंग इन्डियन सोसाईंटी‘ यानी ‘बदलते भारतीय समाज में डॉक्टरों की भूमिका और ज़िम्मेदारियाँ’।

डॉक्टर साहब ने मुस्कुराते हुए सबको पढ़ा और अगली पोस्ट लिखनी शुरू कर दी। 

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