काँच जैसे ख़्वाब
काव्य साहित्य | कविता मधुलिका मिश्रा1 Jan 2026 (अंक: 291, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
कभी वो दिन थे
जब मिट्टी के
बरतन थे,
और काँच से भी
ज़्यादा नाज़ुक
सपने थे।
हथेलियों में नहीं,
आँखों में
सहेज कर रखे जाते थे,
नींद से पहले
डर लगता था
कहीं टूट न जाएँ
ख़्वाबों की दीवारों से
टकरा कर।
तब सपने
छोटे थे,
पर दिल में
पूरा आसमान
समाया रहता था।
एक हल्की सी ठेस
आँसू बन जाती थी,
और आँसू
दुआ बन जाया करते थे।
आज हाथों में
मज़बूत चीज़ें हैं,
पर आँखें
अक्सर ख़ाली हैं।
सपने हैं तो सही,
पर वो
जो दिल को
काँपने पर मजबूर
नहीं करते . . .
कहिए, क्या यही
बड़े होने की क़ीमत है—
कि मिट्टी छूट जाए
और काँच जैसे
ख़्वाब भी . . .?
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टिप्पणियाँ
cjhalpe@gmail.com 2025/12/21 10:15 PM
Bahut sundar bahut khubsurat!
नरेन्द्र सिंह 2025/12/21 06:52 PM
बहुत सुन्दर रचना।
कृपया टिप्पणी दें
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Lucky malhotra 2025/12/21 11:08 PM
Beautiful nd awesome....