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मैं और तुम

 

मैं नदी-सा चंचल, 
तू समंदर-सी शांत, प्रिये। 
मुझे पसंद आवारा सफ़र, 
तुझे पसंद एकांत, प्रिये। 
 
मैं पर्वत की गोद छोड़, 
निकल पड़ा अनजान, प्रिये। 
मुझे प्राणों की चिंता क्या? 
है तू मेरे प्राण, प्रिये। 
 
तेरे तट पे मैं पहुँचा हूँ, 
लाँघ कर हर इक बाँध, प्रिये। 
अब बहना भी मेरा कर्म नहीं, 
है तू ही मेरा धाम, प्रिये। 
 
मैं सूर्य की तपती गर्मी-सा, 
तू शीतल चाँद की छाँव, प्रिये। 
मैं रेगिस्तान की जलती धूल, 
तू पहली बारिश का भाव, प्रिये। 
 
मैं कवि की उलझी कल्पना, 
तू कविता का संगीत, प्रिये। 
मैं बिखरा-सा एक राग कोई, 
तू ही मेरा सम्पूर्ण गीत, प्रिये। 
 
मैं सागर का हूँ घोर तूफ़ान, 
तू साहिल का आराम, प्रिये। 
भटक रहा था मैं हर दिशा, 
तू ही मेरा विश्राम, प्रिये। 
 
मैं भटका हुआ-सा एक राही, 
तू मंज़िल की पुकार, प्रिये। 
ये दुनिया भटका दे मुझको, 
पर तू ही जीवन का सार, प्रिये। 
 
मैं पत्र का कोरा काग़ज़, 
तू शब्दों का संसार, प्रिये। 
मैं मौन में लिपटा रहता हूँ, 
तू मेरा मधुर इज़हार, प्रिये। 

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