समकालीन हिंदी कविता 2025: एक सिंहावलोकन
आलेख | साहित्यिक आलेख दीपक गिरकर1 Jan 2026 (अंक: 291, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
समकालीन हिंदी कविता की मूल पहचान जनपक्षधरता और सामाजिक बोध है। यह कविता मानव जीवन को उसकी सम्पूर्णता में स्वीकार कर सत्ता, अस्मिता और लोकतंत्र से जुड़े प्रश्नों पर सक्रिय हस्तक्षेप करती है। समकालीन हिंदी कविता अपने समय, समाज और राजनीति से गहराई से जुड़ी आत्मचेतस और जनपक्षधर अभिव्यक्ति है। यह कविता जीवन के अन्तर्विरोधों, संघर्षों और परिवर्तनशील यथार्थ को वास्तविक मनुष्य के अनुभवों के माध्यम से सामने लाती है। स्त्री, दलित और आदिवासी विमर्शों के ज़रिए अस्मिता, अधिकार, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय के प्रश्नों को उठाते हुए समकालीन कविता सत्ता, हिंसा और शोषण का प्रतिरोध करती है। ‘मैं’ से ‘हम’ की ओर बढ़ती यह कविता आम जन के संघर्ष, पीड़ा और उम्मीदों की सशक्त अभिव्यक्ति है, जो उसे निरंतर जीवंत और गतिशील बनाती है। प्रमुख समकालीन कवि जैसे मुक्तिबोध, त्रिलोचन, नागार्जुन, शमशेर, रघुवीर सहाय, धूमिल, श्रीकांत वर्मा, सर्वेश्वर, मंगलेश डबराल, लीलाधर जगूड़ी, केदारनाथ सिंह, कुँवर नारायण, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, आलोक धन्वा, अरुण कमल, ओमप्रकाश वाल्मीकि, विनोद कुमार शुक्ल, कुमार विकल, अशोक चक्रधर, अनिल जनविजय, लक्ष्मीनाथ गोस्वामी, दिवाकर, रमेश शुक्ल, डॉ. निरंजन श्रोत्रिय, राजेश जोशी, विष्णु नागर, आशुतोष दुबे, प्रदीप मिश्र, उत्पल बैनर्जी, कुमार अम्बुज, राजकुमार कुम्भज, ब्रजेश कानूनगो, उदय प्रकाश, चरण सिंह अमी, अशोक कुमार पांडेय, शैलजा पाठक, लाल्टू, अंचित, राकेश कुमार मिश्र, अनामिका, प्रीति चौधरी, बाबुषा कोहली, श्रुति कुशवाहा, पंकज चौधरी, दुर्गा प्रसाद झाला, बिमल सहगल आदि ने अपनी कविताओं के माध्यम से समकालीन जीवन की यथार्थता और मानवीय संवेदनाओं को उभारते हुए समकालीन हिंदी कविता साहित्य को समृद्ध किया है।
वर्ष 2025 में प्रकाशित समकालीन हिंदी कविता जो मेरे द्वारा पढ़ी गयी:
इस वर्ष राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित अशोक कुमार पांडेय का कविता संग्रह “आवाज़-बेआवाज़” पढ़ा। “आवाज़-बेआवाज़” की कविताएँ मानवीय और राजनीतिक सरोकारों का सघन संसार रचती हैं। कश्मीर से फिलिस्तीन, प्रेम से व्यर्थताबोध तक फैली ये रचनाएँ समकालीन सत्ता, जनतंत्र और मनुष्यता के संकट को निडरता से उजागर करती हैं, जिनके तीक्ष्ण बिम्ब और आन्तरिक तनाव देर तक स्मृति में बने रहते हैं। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित श्रुति कुशवाहा का कविता संग्रह “सुख को भी दुख होता है” पढ़ा। श्रुति की कविता जीवन की बुझती आग को संतुलन और करुणा से सुलगाए रखने का प्रयत्न है। वैयक्तिक नैतिकता, आचरणगत परिवर्तन और सूक्ष्म प्रज्ञा में आस्था रखती ये कविताएँ प्रकृति, प्रेम और आत्मसंयम के माध्यम से गहरे मानवीय सत्य उजागर करती हैं, जिनमें वाक्-संयम और अन्तःपाठीय संवाद एक विशिष्ट खनक रचते हैं। सेतु प्रकाशन समूह से प्रकाशित “किस-किस से लड़ोगे” पंकज चौधरी का नवीन कविता संग्रह है, जिसमें कवि जीवन और समाज के उन पहलुओं को बेबाक़ी से सामने लाते हैं, जिनसे अधिकांश कवि परहेज़ करते हैं या टालते रहे हैं। उनकी कविताएँ साहसपूर्वक वास्तविकता और संघर्ष की गहराइयों में उतरती हैं, यही उनकी अनूठी पहचान है। सेतु प्रकाशन समूह से प्रकाशित युवा कवि वसु गंधर्व का कविता संग्रह “वीतराग” स्मृति की मोहक आभा लिए हुए है। उनकी रचनाएँ अनंत, प्राचीन अनुभवों और जीवन के सूक्ष्म पक्षों को समेटती हैं, जिसमें संग-साथ और निस्संगता दोनों हैं। भाषा की चमक इन कविताओं की प्रमुख विशेषता है। सेतु प्रकाशन समूह से प्रकाशित राजेंद्र टोकी का “लम्हों की नदी” कविता संग्रह की कविताएँ जीवन के क्षणों और अनुभूतियों को बहते हुए प्रस्तुत कराती हैं। सरल और प्रभावशाली भाषा पाठक को अनुभवों की धारा में डुबो देती है और अपने जीवन के लम्हों को महसूस करने का अवसर देती है। न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन से प्रकाशित विद्या भंडारी के कविता संग्रह “स्त्री स्लेट पर लिखा शब्द नहीं” की कविताएँ स्त्री-केंद्रित कविताएँ हैं जो जीवन के विविध रंगों और नारी शक्ति का चित्रण करती हैं। हर गोविन्द पुरी का कविता संग्रह “दो शब्दों के बीच में छूटी हुई जगह” जीवन और भाषा के सूक्ष्म अन्तरालों की अभिव्यक्ति करता है। अक्टूबर 2025 में न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित यह संग्रह भाव, संवेदना और मौन के बीच के टूटते-बनते रिश्तों को प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत करता है। शिवना प्रकाशन से प्रकाशित पंकज सुबीर का कविता संग्रह “उम्मीद की तरह लौटना तुम” 109 कविताओं का संवेदनशील संकलन है, जिसमें पिता की स्मृति और उनके जाने का शोक, प्रेम, प्रकृति और सामाजिक भावनाएँ मार्मिक रूप से उभरती हैं। कवि ने पिता-पुत्र के रिश्ते की जटिलताएँ, असहमति, पश्चात्ताप और प्रेम की गहराई को सहज भाषा में व्यक्त किया है। संग्रह की कविताएँ व्यक्तिगत पीड़ा के साथ-साथ सार्वभौमिक अनुभव का रूप लेती हैं। संग्रह में प्रेम, परिवार, प्रकृति और सामाजिक विडंबनाओं को संवेदनशीलता और कथ्यात्मक सहजता के साथ प्रस्तुत किया गया है। नवल जानी का कविता संग्रह “अनकही बातें” (बोधि प्रकाशन, जयपुर) प्रेम, सौंदर्य, प्रकृति और जीवन के विविध पक्षों को सरल एवं प्रवाहमयी भाषा में प्रस्तुत करता है। संग्रह में सूक्ष्म भावनाओं और मार्मिक बिंबों का सुंदर प्रयोग है, जो पाठक को सहज ही कविताओं की दुनिया में डुबो देता है और जीवन के अनुभवों को नए दृष्टिकोण से महसूस कराता है। शिवना प्रकाशन से प्रकाशित ज्योति जैन के कविता संग्रह “दुनिया काठ की” में ज्योति जैन जिस संवेदनशीलता के साथ लकड़ी, जंगल, औज़ार और मेहनतकश जीवन को कविता में उतारती हैं, वह उसे सिर्फ़ विषय नहीं रहने देता, बल्कि जीवनानुभव बना देता है। उनकी कविताओं की भाषा में बनावट नहीं है, वह लोक-स्मृति, श्रम की गंध और रोज़मर्रा के संघर्ष से उपजी सादगी है। यह सादगी ही संग्रह की सबसे बड़ी ताक़त है। कविताएँ न तो शिल्प का दिखावा करती हैं और न ही बौद्धिक जटिलता का भार उठाती हैं। लोक-संस्कृति यहाँ सजावट नहीं, बल्कि जीवन की स्वाभाविक लय के रूप में आती है। औज़ार सिर्फ़ वस्तु नहीं रह जाते, वे हाथों की थकान, पीढ़ियों की मेहनत और सामूहिक स्मृति के प्रतीक बन जाते हैं। इसी कारण ये कविताएँ पढ़ी नहीं जातीं, बल्कि अनुभूत होती हैं और चुपचाप पाठक के मन में जगह बना लेती हैं।
सेतु प्रकाशन से प्रकाशित समकालीन हिन्दी कविताओं की प्रमुख हस्ताक्षर स्मिता सिन्हा के कविता संग्रह “रुंधे कंठ की अभ्यर्थना” स्त्री विमर्श, सामाजिक न्याय और मानवीय संवेदनाओं का सशक्त दस्तावेज़ है। संग्रह में स्त्रियों की व्यक्तिगत और सामाजिक चुनौतियों, प्रेम, स्वतंत्रता, आत्मसम्मान, पितृसत्ता और अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध की आवाज़ प्रमुख है। कविताएँ युद्ध, जातिवाद, शहरीकरण, पर्यावरण और बच्चों की संवेदनशीलता जैसे समकालीन मुद्दों को भी उजागर करती हैं। स्मिता की भाषा सरल और प्रवाहमयी है, बिंबों में ताज़गी और संवेदनाओं की गहराई है। प्रेम, विरह, संघर्ष और स्मृति की कविताएँ व्यक्तिगत अनुभवों को सार्वभौमिक रूप देती हैं। यह संग्रह भावनाओं, सोच और सामाजिक चेतना का मिश्रण प्रस्तुत करता है, जो पाठक को सोचने, महसूस करने और संवेदनशील बनने के लिए प्रेरित करता है। यह हिंदी कविता में स्त्री आवाज़ और सामाजिक जागरूकता का महत्त्वपूर्ण योगदान है। अंतिका प्रकाशन से प्रकाशित दुर्गा प्रसाद झाला का कविता संग्रह “समय से जूझता समय” जीवन और समय के बीच के संघर्ष का मार्मिक दस्तावेज़ है। यह संग्रह न केवल व्यक्तिगत अनुभवों का प्रतिबिंब है, बल्कि सामाजिक और दार्शनिक चिंतन का भी उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है। दुर्गाप्रसाद झाला ने कविताओं में समय, मानव मन और जीवन के विविध पहलुओं को इतनी संवेदनशीलता और स्पष्टता के साथ चित्रित किया है कि यह संग्रह हिंदी कविता के समकालीन परिदृश्य में एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। काव्य प्रकाशन से प्रकाशित चरण सिंह ‘अमी’ का कविता संग्रह “डूबते गाँव एवं अन्य कविताएँ” ग्रामीण जीवन की वास्तविकता, मानवीय संवेदनाएँ और समकालीन सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों को मार्मिक रूप में प्रस्तुत करता है। यह संग्रह गाँवों के बदलते परिदृश्य और वहाँ के लोगों के संघर्षों को सजीवता और गंभीरता के साथ उकेरता है। इसमें गाँवों के जलते और डूबते यथार्थ, समय की राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक व्यथाएँ, और मानवीय संवेदनाओं की मार्मिक प्रस्तुति मिलती है। हर कविता सीधे पाठक के दिल को छूती है और जीवन की वास्तविक झलक पेश करती है। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित कवि कृष्ण मोहन झा का कविता संग्रह “तारों की धूल” समकालीन हिंदी कविता की संवेदनशील और सशक्त प्रस्तुति है। यह संग्रह न केवल व्यक्तिगत स्मृतियों और प्रेम की दास्तान कहता है, बल्कि समय, समाज और सत्ता पर स्पष्ट दृष्टि प्रस्तुत करता है। कवि अपने अनुभवों, प्रकृति, मिट्टी और तारों के प्रतीकों के माध्यम से पाठक को भीतर तक झकझोरने वाला काव्य संसार गढ़ते हैं। कृष्णमोहन झा की कविताएँ स्मृति जीविता और वर्तमान अनुभव के बीच संतुलन बनाती हैं। वह समाज में शोषण, असमानता और अन्याय के ख़िलाफ़ सच बोलते हैं, और पाठक को सवाल पूछने तथा सोचने के लिए प्रेरित करती हैं। प्रेम, प्रकृति और मानवीय संवेदनाओं का मिश्रण इसे गहन और मननीय काव्य संग्रह बनाता है। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित शान्ति नायर के कविता संग्रह “ज्यामिति” आधुनिक हिंदी कविता में सामाजिक जागरूकता, मानवीय संवेदनाएँ और स्त्री-पुरुष संबंधों की यथार्थपरक प्रस्तुति का उत्कृष्ट उदाहरण है। कविताएँ अपने विषय, भाषा और प्रतीकों के माध्यम से पाठक को भीतर तक झकझोरती हैं। प्रमुख कविताएँ जैसे “जाले”, “ज्यामिति” और “मुनिवर और इडली” जीवन की असमानताओं, पितृसत्ता और प्रेम-संबंधों के जटिल सच को उद्घाटित करती हैं। यह संकलन केवल कविताओं का संग्रह नहीं, बल्कि सोचने और सवाल करने की प्रेरणा देने वाला काव्य दस्तावेज़ है।
समकालीन प्रमुख कवि कुमार अम्बुज की 2025 में प्रकाशित कविताएँ:
पराकाष्ठा
क्रूरता का चरम है/ जब सब कुछ खँडहर हो जाता है/ उजाड़ दिया जाता है सब कुछ/ तो एक आदमी आकर कहता है/ अब हम विजयी हुए।
तारीख़
अन्याय बिना तारीख़ लगाए रोज़ होता है/ न्याय के लिए लगाई जाती है तारीख़/ तब पता चलता है/ वह तारीख़ दरअसल/ बचे-खुचे अन्याय के लिए लगाई गई थी।
एक पत्र
इधर हालात ऐसे हैं अगर किसी से पूछो/ क्या आप कोई कट्टरपंथी हैं/ तो वह संतोषपूर्वक गर्वीला कहता है कि हाँ हूँ/ और इसके लिए मैंने/ बचपन से मेहनत की है/ यही था मेरा सपना इसी पर दसवीं कक्षा में/ लिखकर आया था निबंध/ अगर किसी आरोपी से पूछो/ क्या तुमने लोगों को मारा है/ तो वह वीडियो दिखाता है कहता है—हाँ/ लेकिन मारा नहीं वध किया है/ और यह जितना साहस का काम है/ उससे ज़्यादा आस्था का/ इधर कोई नहीं कहता मैं कवि पत्रकार शिक्षक चित्रकार/ लेखक या संगीतज्ञ बनना चाहता हूँ/ सब गर्वीले कहते हैं कि स्नातक स्नातकोत्तर पीएचडी करने के बाद वे बनना चाहते हैं आततायी/ या चाहते हैं किसी उच्चतर आततायी की नौकरी/ यही तरीक़ा है सुख से जीवन जीने का/ यही रह गया है भरोसे का रोज़गार/ जो ऐसा नहीं चाहते वे सब/ नज़रबंद हैं या एकदम चुप/ या यकायक लापता/ अब इधर जिससे भी पूछो/ उसका नाम/ तो वह पहले जाति बताता है/ कहता है नाम में क्या रखा है/ सारी पहचान सारी सुरक्षा सारी शक्ति/ सारी एकता सिमट आई है जाति में/ सारी आफ़त सारा प्रेम सारी घृणा/ सारा झंझट जाति से है/ इस तरफ़ जातिविहीन आदमी की कोई प्रजाति नहीं/ यहाँ जिसकी कोई जाति नहीं वह पूरा नागरिक नहीं/ अगर है तो इस महादेश के भूगोल में नहीं/ स्मृति में नहीं, परंपरा में नहीं/ उसका कोई भविष्य नहीं/ बस वह कभी-कभार किसी नाशुक्रे के मक़्ते में है/ तख़ल्लुस में है मगर पहचान-पत्र में नहीं।
समकालीन प्रमुख कवि कुमार अम्बुज कविताएँ आधुनिक समय की संख्या, एल्गोरिद्म और तकनीकी नियंत्रण जैसी चिंताओं को कविता के माध्यम से उजागर करती हैं। उनकी कविताओं में राजनीति, धर्म, व्यवस्था और बाज़ार की हिंसा के साथ-साथ मनुष्यता की असहायता की गहरी संवेदना झलकती है। अम्बुज की भाषा सूक्ष्म, नुकीली और अर्थपूर्ण है, जो पाठक को नग्न वर्तमान के सामने खड़ा कर देती है। ये कविताएँ सिर्फ़ अनुभव नहीं करातीं, बल्कि सोचने, सवाल करने और प्रतिरोध की प्रेरणा भी देती हैं। संक्षेप में, कुमार अम्बुज की कविताएँ समकालीन यथार्थ के प्रति सचेत, भावनात्मक और बौद्धिक रूप से चुनौतीपूर्ण हैं।
समकालीन कवि ब्रजेश कानूनगो की 2025 में प्रकाशित कविता:
कठिन सवाल
दीपक की लौ से प्रकाश का घेरा बना है/ उजाले में आठवीं कक्षा के गणित की किताब खोले/ हल कर रहा है प्रश्न चुटकियों में वह/ झोपड़ी के बाहर पहाड़ियों के ऊपर अपने पंखों को लहराती/ हवाओं से संघर्ष करती दैत्याकार पवन चक्कियाँ/ जुटी हुई हैं रोशनी के इंतज़ाम में/ तलहटी में बसा है उसका गाँव/ गाँव में धड़कता है जीवन/ जीवन में उम्मीद का चिराग़ जलाए/ वह सपनों को बुन रहा अँधेरों में/ तेज हवा का झोंका दीपक की लौ को विचलित करने को लगातार आतुर/ और वह है कि अपनी हथेलियों की ओट कर/ अपने हिस्से की रोशनी को बचाते हुए संघर्षरत/ परीक्षा की तैयारी में जुटा है/ गणित में निपुण बालक को एक कठिन सवाल का जवाब मिल नहीं पा रहा/ उसकी पहाड़ी, उसके गाँव की हवा से बनती बिजली से/ रोशन क्यों नहीं उसकी झोपड़ी/ उसका जीवन।
ब्रजेश कानूनगो की कविता किसी निश्चित छंद या तुकांत में नहीं बँधी है। विचारों की स्वाभाविक गति के अनुसार पंक्तियाँ आगे बढ़ती हैं। यह समकालीन कविता का प्रमुख शिल्पगत गुण है। पूरी कविता एक दृश्य की तरह आगे बढ़ती है। कविता में ग्रामीण जीवन की वास्तविक स्थिति, अभाव, ग़रीबी और असमान विकास का सजीव चित्रण है। कुल मिलाकर, यह कविता एक बच्चे के माध्यम से पूरे समाज से सवाल करती है-क्या विकास सच में वहाँ तक पहुँचा है, जहाँ उसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है?
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