सवालों से बदलाव तक
शायरी | सजल उमेन्द्र निराला1 Sep 2026 (अंक: 301, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
बेज़ुबान भी लफ़्ज़ बयाँ करने लगे,
कटघरे में झूठ को सच कहने लगे।
धर्म की आड़ में जो छिपे बैठे थे,
सच के सवालों से अब डरने लगे।
तख़्त पाया जिन्होंने झूठे वादों से,
विरोध देख बयान बदलने लगे।
सत्ता जब कटघरे में खड़ी हुई,
बचाव में अख़बार निकलने लगे।
कुछ भी नहीं जिनके पास, फिर भी
अन्याय के ख़िलाफ़ लड़ने लगे।
नफ़रत के बाज़ार में मोहब्बत मिली,
लोग बदलाव की राह पर चलने लगे।
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