प्रकृति से सीख
काव्य साहित्य | कविता उमेन्द्र निराला15 Mar 2026 (अंक: 294, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
नदियाँ बहती हैं,
निरंतर बहती हैं।
चट्टानों को भी काटकर,
मंज़िल पाने को बहती हैं।
पर्वत खड़े हैं,
सदियों से खड़े हैं।
सब कुछ सहकर भी अडिग,
ऊँचाई छूने को खड़े हैं।
सूर्य निकलता है,
हर रोज़ निकलता है।
डूबकर भी वह बिना घबराए,
फिर लालिमा लेकर निकलता है।
और इन सबमें आदमी को
सीखना होगा प्रकृति से—
जीवन में श्रेष्ठता पाने के लिए,
सच्चा मानव बनने के लिए।
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