अहसास
काव्य साहित्य | कविता उमेन्द्र निराला15 Mar 2026 (अंक: 294, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
मुस्कुरा के जो तुम
चल दिए होते,
सफ़र में धूप का
अपना मज़ा होता।
बचाती हैं घर की दीवारें
हमारे बालपन को,
कुछ पाने को सब कुछ खोया—
शायद यह पता होता।
अनजान रहे उम्र भर
अपना मानकर,
जान लेते सच तो
कोई अपना कहाँ होता।
किसी ने माँगी दौलत,
तो किसी ने ख़ुशियाँ,
माँग लेते गर माँ,
तो सारा जहाँ होता।
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