आत्मबोध
काव्य साहित्य | कविता उमेन्द्र निराला1 Feb 2026 (अंक: 293, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
अपनों में ही गिराने की आज़माइश है,
यह जानकर सँभलना चाहिए था।
भाग कर आया है जहाँ से,
उसे तो ठहर जाना चाहिए था।
राह में हौसला-शिकन होंगे मगर,
टूटे हुए मन से लड़ना चाहिए था।
परेशान रहा यूँ ही मुसीबतों से,
हक़ीक़त जानकर मुस्कुराना चाहिए था।
इंतज़ार हो जब तुम्हारी हार का,
वहीं से जीत जाना चाहिए था।
जो बदलाव चाहते हैं दूसरों पर,
एक बार ख़ुद को बदलना चाहिए था।
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