अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

अमृत की खोज

जो है अनिवार्यता इस अस्तित्व की 
उसे मानने में न हम   संकोच करें 
कर विषपान कष्टों के    चषक से 
निरंतर हम अमृत की खोज   करें।

                     विष नारकी और अमृत सुरवासी 
                     यह कल्पना नहीं एक छल   है 
                     अमृत का वास भी होता वहीं पर 
                     जहाँ सदैव रहता   गरल    है।

यह निर्भर करता अन्वेषी पर 
किसको आराध्य वह बनाता है 
जो चाहता अमृत तत्व को ही
वह सदा अमृत को ही पाता है।

                       अमृत की खोज में यदि चल पड़ें 
                       तो विष का क्योंकर भय   करें?
                       अमृत स्थित हिय के भीतर ही तो 
                       क्यों इस बात पर हम संशय करें।

आत्मबल में ही निहित है अमिय
जो भी इस बात को दृढ़ हो मानेगा 
वही पुरुषार्थ के   परम  द्योतक 
एक अटल सत्य को   पहचानेगा ।

                        जहाँ दुर्बलता का होता है प्राबल्य 
                        वहीं पर विष का भी होता वास है 
                        जहाँ दुर्बलता बैठ गयी मन    में
                        वहीं होता शक्ति का भी ह्रास  है।

और पीयूष सदा शक्ति का प्रतीक 
अमृत वहीं, जहाँ रहता संबल  है 
अधरों को सुख देने वाली सुरा नहीं 
अमृत शुद्ध   पवित्र  अनल   है।

                        मानव स्वयं सुधामय, इसके सिवा 
                        और कोई भौतिक अमृत कलश नहीं 
                        मानव में ही वह तेज निवास करता 
                        जिसपर किसी और का वश   नहीं।

जो कोई भी अपने अंत:करण में 
ऐसी खोज सतत कर    पाएगा 
अमृत-तत्व को भी वही  व्यक्ति 
हृदय खंड में पूरा भर    पाएगा।

                         आत्मबल का यह अमृत उन्हीं का 
                         जिन्हें प्राप्त वीरत्व का है वरदान 
                         आस्वादन कर लिया जिसने   भी 
                         वही कहलाया अमृत की   संतान।

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

दोहे

ग़ज़ल

कविता

लघुकथा

कहानी

किशोर साहित्य कहानी

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं