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औक़ात

"आज तो हम इस में खीर बना कर पार्टी करेंगे," नाचते हुए पीतल की हाँड़ी ने उस अनजानी नई-नवेली चमकीले हाँड़ी को देख कहा।

"हाँ हाँ, क्यों नहीं। तुम्हारे साथ रह कर, मैं भी कुछ नया सीख पाऊँगी।''

बाक़ी के बरतन नाच-कूद कर पार्टी मना रहे थे। वह भी नाचते-कूदते हुए चूल्हे पर चढ़ गई।

"ओह! आज तो दूध, चावल, शक्कर, मावा-मिश्री को खा-खा कर, इन का मज़ा लूँगी," कहते हुए वह तेज़ी से उछलने लगी तो पीतल की हाँड़ी बोली, "पहले तू खीर बना ले। उस के बाद हमारे साथ नाच-कूद कर पार्टी के मज़े लेना।''

"हाँ, यह ठीक रहेगा," कहने के साथ वह उछलने लगी। मगर, थोड़ी देर उछलने के बाद, वह धीर-धीरे बदसूरत होने लगी, "अरे! यह क्या हो रहा है। मैं तो जल रही हूँ," कहते हुए वह चिल्ला पड़ी।

लकड़ी की आँच तेज़ हो गई थी तो वह चीखी, "अरे! यह क्या कर रही हो! मुझे जला कर मार डालोगी क्या?''

"ओह! यह तो काठ की हाँड़ी है," हाँड़ी के पैंदे से निकले दूध से नहाती हुई लकड़ी बोली, "ये अपनी औक़ात जाने बिना धातु के बरतन की नक़ल करने चली थी।''

काठ की हाँडी अपनी वास्तविकता जान चुकी थी, "हाँ बहन, तुम ठीक कहती हो। इसी लिए लोग कहते हैं कि काठ की हाँड़ी दोबारा चूल्हे नहीं चढ़ती है," कहते हुए काठ की हाँड़ी चुप हो गई।

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