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कैसे लिखूँ प्रेम गीत मैं

अनय अधर्म का वर्चस्व चतुर्दिक
प्रबल हो रहे अन्याय अत्याचार हैं
कवि! कैसे मान लूँ तेरे कहने पर
प्रेममय यह मानव का संसार है?


पशुत्व पूजित किया जा रहा अब
मानवता आज त्रस्त व भयभीत है
सेवा करना छोड़ उस मानवता की
बता तू ही कैसे लिखूँ प्रेम गीत मैं?


सदाचार - नैतिकता बातें विगत
अब एकमेव सत्य तो धनबल है
सज्जनता हो गयी अब मूर्खता
पग पग पर कपट और छल है।


न्याय और धर्म बिकते हैं बाज़ार में
होते सुवर्णमुद्राओं पर वे क्रीत हैं
आवाज़ उठाने के स्थान पर अब
बता तू ही कैसे लिखूँ प्रेम गीत मैं?


कायर होकर सोते हैं मेरे देशवासी
हर ओर निराशा का गहन अँधेरा
तुझसे ही पूछता हूँ हे प्रेम पुजारी!
कहाँ है वह दिव्य सा प्रेमलोक तेरा?


कल्पना करूँ किसी सुंदरी की क्यों?
सोचता अपने देश भारत की जीत मैं
बजाय सुनने को पुकार भारत माँ की 
बता तू ही, कैसे लिखूँ प्रेम गीत मैं?


पुरुषार्थ मानव की शक्ति होती सदैव
झूठा तेरा यह प्रणय विरह का गाना
फूल नहीं अँगारे चाहिएँ शौर्यवानों को
व्यर्थ कुसुमों के लिए तेरा अकुलाना।


जीवन नहीं होता है प्रणयलोक सुंदर
क्यों व्यर्थ करूँ ऐसे समय व्यतीत मैं?
उठकर सुनाना है जागृति संदेश मुझे
बता तू ही, कैसे लिखूँ प्रेम गीत मैं?

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