अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

ख़ूबसूरत परिन्दे

ओ परिन्दो!
तुम न उतरना धरा पर
उड़ते रहना आसमानों में
दूर...दूर...बहुत दूर
झूमते हुए, गाते हुए
ज़मीन पर खड़े लोगों की
निगाहों से दूर...उनसे परे
क्योंकि उनकी निगाह तुम पर है
क्योंकि तुम सुन्दर हो !
ख़ूबसूरत हो!


वो जकड़ना चाहते हैं तुम्हें
अपने लोहे के बेढब पिजरों में
लेना चाहते हैं वो
तुम्हारे सुन्दर पंख
अपने घर की दीवारों को 
सजाने के लिए
ताकि सुन्दर हो सके...उनका घर
वो नोंच लेना चाहते हैं
प्रकृति के इस सुन्दर घर को
अपने मन-बहलाव के लिए।


तुम मत आना नीचे
न उतरना इंसानों की बस्ती में
बस उड़ते ही जाना तुम
जब थक जाना
तो उतर आना किसी ऊँचे
पेड़ की डाल पर...और देखना
हम इंसानों को झुँझलाते हुए
ग़ुस्से से पैरों को पटकते हुए।


तुम ऐसे ही आते रहोगे
तो ख़त्म हो जाओगे एक दिन
क्या तुम्हें नहीं पता ?
तुम्हारे जैसी कितनी प्रजातियाँ
ख़त्म होती जा रही हैं
इस धरती से।


अब उनके बच्चे 
पढ़ते हैं तुम्हें किताबों में
ढूँढ़ते हैं तुम्हें
इतिहास के पन्नों में
कहते हैं 
‘तुम कभी थे, अब नहीं हो’
इस धरती में कहीं।


अब वो नहीं डरते तुमसे
अब तुम्हें डरना होगा उनसे
क्योंकि तुम ख़त्म होते जा रहे हो
कमज़ोर होते जा रहे हो
ख़त्म होती जा रही है
तुम्हारी सभ्यता
और तुम्हारी प्रजातियाँ।


ओ परिन्दो!
तुम न उतरना धरा पर।

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

किशोर साहित्य कविता

बाल साहित्य कविता

कविता

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं