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राकेश खण्डेलवाल

  अपने दोषों पर पछ्तावा जो मन ही मन कर लेता हो
अपनी समाधि को जो खुद ही रह रह सँवारता छ्न्दों से
जिसके हर गूँगे उत्तर पर अक्सर सवाल हँस देते हैं
वह मैं हूँ बंधा हुआ केवल अपने स्वप्निल अनुबन्धों से
  - राकेश खण्डेलवाल
  राकेश खण्डेलवाल पिछ्ले २१ वर्षों से यू.एस. ए. में हैं। काव्य लेखन लगभग ३५ वर्षों से नियमित है। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होने के अतिरिक्त इनकी एक पुस्तक "अमावास का चाँद" प्रकाशित हुई है।
   

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