अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा वृत्तांत डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

आज अनुभूतियाँ शब्द बनने लगीं

 

आँख की वादियों में फिसल कह गये
बात मन की, दो आँसू लरजते हुए
शब्द थे लड़खड़ाते हुए रह गये
होंठ की पपड़ियों पर अटकते हुए
साथ, तय कर लिया सुर ने देना नहीं
इसलिये गूँज पाई नहीं सिसकियाँ
कुछ लगा है गले में रुका रह गया
फिर भी आ न सकीं एक दो हिचकियाँ
 
जो न चाहा कहें, वो उजागर हुआ
सारी अनुभूतियाँ शब्द बनने लगीं
 
मन की संदूकची में रखे थे हुए
भाव सहसा निकल इस तरह से बहे
कोई भाषा की उँगली को पकड़े बिना
बोल बिन, थरथराते अधर ने कहे
एक पल में समाहित सभी कुछ हुआ
नभ का विस्तार, सारी चराचर धरा
एक ही अर्थ में सब निहित हो गया
शून्य की मुट्ठियाँ, थाल मोती भरा
 
स्वप्न सी आँख में पल रही हर घड़ी
आज बीता हुआ वक़्त बनने लगी
 
पंथ में जो उठे थे क़दम वे सभी
लौट कर भोर की आये दहलीज़ पर
नीड़ पाथेय की पोटली को उठा
ले गया था सहज आँख को मींच कर
राह थक सो गयी ओढ़ कर चादरें
और गंतव्य ने अर्थ बदले सभी
जो अभी है, नहीं वो कभी था हुआ
और शायद न हो पाये आगे कभी
 
भोर आते हुए सूर्य से हो विमुख
साँझ बनती हुई आज ढलने लगी

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

अंतहीन टकराहट
|

इस संवेदनशील शहर में, रहना किंतु सँभलकर…

अंतिम गीत लिखे जाता हूँ
|

विदित नहीं लेखनी उँगलियों का कल साथ निभाये…

अखिल विश्व के स्वामी राम
|

  अखिल विश्व के स्वामी राम भक्तों के…

अच्युत माधव
|

अच्युत माधव कृष्ण कन्हैया कैसे तुमको याद…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

गीत-नवगीत

कविता - क्षणिका

कविता

नज़्म

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं