अश्लील कविता
काव्य साहित्य | कविता हरदीप सबरवाल15 Jan 2026 (अंक: 292, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
जब जन्म लेती है कोई कविता
तब वह नंगी ही होती है,
किसी सोच में उघड़ते नग्न विचारों सी,
फिर भी ना जाने क्यों
हमें कविताओं को आवरणों में
ढकने की आदत हो गई है,
सुना है
नग्नता या तो कलात्मक नज़र आती है,
या फिर अश्लील
पर कहाँ होता है कुछ कलात्मक सा
भूखे पेट का क़िस्सा कहती कविता में,
कि भ्रष्टाचार की बात करती कविता
नहीं दंभ भरती किसी कलाकारी का,
कविताएँ जब न्याय माँगने आगे आती हैं
तब वो अन्याय सी ही नंग-धड़ग
किसी लाचार दलित उत्पीड़न सी
दौड़ती हैं सड़क के बीचों-बीच
नारी के नंगे जिस्म से शुरू होकर
पुरुष की नंगी सोच तक सिमटती हैं
लिंग भेद की कथा कहती कविता,
रहने दीजिए
इस कविता को एक अश्लील कविता ही,
कि क्रांतियाँ ना कभी कलात्मक हुई
ना होगी . . .
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