छींक
काव्य साहित्य | कविता हरदीप सबरवाल15 Jan 2026 (अंक: 292, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
छींक आती है
तब माँ कहती है कि कोई याद करता होगा
और पिताजी
खिलखिला कर हँस देते हैं
जब कभी मुँडेर पर कोई कागा
शोर मचाता है
माँ कहती है कोई आने वाला है
और पिताजी मुस्कुरा देते हैं
जब भी यकायक माँ और पिताजी
कोई शब्द एकसाथ बोल उठते है
माँ कहती है कोई शुभ समाचार आएगा
और पिताजी आँखों में चमक लाते हैं
ना कभी पिता माँ की कोई बात काटते
ना माँ किसी भाव का प्रति उत्तर देती
माँ से मैंने सीखा कि कैसे
अनंत तक प्यार करे
और पिता से उस प्यार को निभाना
छींक आती है जब
तो अनायास ही तुम सामने दिखती हो
जब भी मुँडेर पर कागा बोलता है
दिल कहता है तुम आ जाओ जीवन में
एक शुभ समाचार देदो
और मुझे भी पूर्ण कर दो
जैसे माँ ने मेरे पिता को पूर्णता दी . . .
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